तेजाबी हमले की शिकार लक्ष्मी की जिंदगी में खुशियों की दस्तक

By: | Last Updated: Wednesday, 5 February 2014 2:07 PM
तेजाबी हमले की शिकार लक्ष्मी की जिंदगी में खुशियों की दस्तक

दिल्ली: भयंकर तेजाब हमले का शिकार रही 24 वर्षीय लक्ष्मी की जिंदगी में खुशियों ने दस्तक दी है. लंबी शारीरिक और मानसिक वेदना झेलने के बाद लक्ष्मी को आलोक दीक्षित के रूप में सच्चा हमसफर मिल गया है. लक्ष्मी और आलोक दोनों ही तेजाबी हमले की शिकार महिलाओं के हक के लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं और लक्ष्मी इस आंदोलन का चेहरा बन चुकी है.

 

बात 2005 की है, लक्ष्मी तब महज 15 साल की थी और 7 वीं कक्षा में पढ़ती थी. उसकी उम्र के दोगुने से भी बड़े उम्र (32 वर्ष) के एक व्‍यक्ति ने उसे शादी के लिये प्रपोज किया. लक्ष्‍मी ने उसे इंकार कर दिया. लक्ष्‍मी ने बताया कि 22 अप्रैल 2005 की सुबह लगभग 10 बजकर 45 पर वो दिल्‍ली के भीड़-भाड़ वाले इलाके खान मार्केट में एक बुक स्‍टोर पर जा रही थी कि तभी वो आदमी अपने छोटे भाई की गर्लफ्रेंड के साथ आया और उसे धक्‍का दे दिया. धक्‍का लगते ही लक्ष्‍मी सड़क पर गिर गई और उसके चेहरे पर तेजाब फेंक कर वो आदमी भाग गया.

 

लक्ष्‍मी ने बताया कि पहले तो मुझे ठंडा सा लगा है फिर मेरा शरीर तेजी से जलने लगा था. कुछ ही सेकेंड में मेरे चेहरे और कान के हिस्सों से मांस जलकर जमीन पर गिरने लगा. इस भयंकर हमले के बाद 2 महीने से भी ज्यादा समय तक लक्ष्मी राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल में भर्ती रहीं. लेकिन करीब आधा दर्जन ऑपरेशन के बावजूद लक्ष्मी अपना चेहरा दोबारा नहीं पा सकी.

लक्ष्‍मी ने बताया कि लंबे समय तक वो पुरुषों से नफरत करती रही. लेकिन आलोक दीक्षित से मिलने के बाद जिंदगी को लेकर उनका नजरिया ही बदल गया.

 

तेजाब हमलों को रोकने की एक मुहिम के दौरान लक्ष्मी की मुलाकात आलोक दीक्षित से हुई. और फिर उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया. अब ये दोनों दिल्ली के पास एक इलाके में रहते हैं और अपने छोटे से दफ्तर से मिल कर तेजाब हमलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं. उनकी इस मुहिम से तेजाब हमलों की लगभग 50 पीड़िताएं जुड़ी हुई हैं.

 

लक्ष्मी इस मुहिम का चेहरा है जो एसिड अटैक की पीड़ितों को मदद और आर्थिक सहायता मुहैया कराती है. लक्ष्‍मी का कहना है कि आलोक उनके लिये ताजा हवा के झोंके की तरह थे. लक्ष्‍मी ने बताया कि मैं बहुत घुटन और बोझ महसूस कर रही थी और मैने महसूस किया कि वो मेरे साथ इस बोझ को मिलकर उठाने के लिये तैयार हैं. आलोक की उम्र 26 साल है और वो अपनी नौकरी छोड़ कर इस मुहिम से जुड़े हैं.

 

लक्ष्‍मी के बारे में आलोक का कहना है लक्ष्‍मी ने दूसरी पीड़ित महिलाओं को भी आत्मविश्वास दिया है जो उन्हें उम्मीद की किरण के तौर पर देखती हैं.

 

 पिछले साल उनकी तरफ़ से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वो तेजाब की बिक्री के लिए नीति तैयार करें. लक्ष्मी कहती हैं कि मैं तेज़ाब हमले की अन्य पीड़ितों के संपर्क में आई. मैंने सोचा कि ये ठीक नहीं है कि तेज़ाब यूं ही कहीं भी उपलब्ध हो. कोई भी इसे खरीद सकता है. इससे तो महिलाओं के लिए खतरा पैदा होता है.

 

अब आलोक दीक्षित और अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर लक्ष्मी ने लोगों में जागरुकता पैदा करने के लिए एक मुहिम स्‍टॉप एसिड अटैक  छेड़ी है ताकि हमले की स्थिति में वो हस्तक्षेप कर उससे बेहतर तरीके से निपट सकें.

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Web Title: तेजाबी हमले की शिकार लक्ष्मी की जिंदगी में खुशियों की दस्तक
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