दया शंकर: जिसकी देखरेख में सुधरना चाहता था दाऊद

By: | Last Updated: Friday, 17 August 2012 3:34 AM

नई दिल्‍ली: दया शंकर नहीं
रहे. अस्सी और नब्बे के दशक
में कस्टम के जिस अधिकारी का
नाम मुंबई से लेकर वलसाड़ और
दमण से लेकर गोवा तक के
स्मगलरों की रीढ़ की
हड्डियों में सिहरन पैदा कर
देता था, वो अधिकारी अब नहीं
रहा.

जी हां, दया शंकर की
इसी रविवार यानी 12 अगस्त, 2012 को
आस्ट्रेलियाई स्थानीय समय
के हिसाब से सुबह सात बजकर
चालीस मिनट पर मेलबोर्न में
मौत हो गई. हालांकि दुर्भाग्य
की बात ये है कि दया शंकर की
मौत भारत में न तो ज्यादातर
राष्ट्रीय अखबारों की
सुर्खियां बन सकीं और न ही
चौबीस घंटे के चैनलों की.

वो
भी उस दौर में जब अन्ना हजारे
और स्वामी रामदेव की अगुआई
में पिछले कुछ महीनों में हुए
आंदोलनों ने कालेधन और
भ्रष्टाचार के मुद्दे को
चर्चा के केंद्र में ला दिया
है.

अखबार और टीवी चैनल जब
इन आंदोलनों की लंबी-चौड़ी
कवरेज कर रहे थे, दया शंकर मौत
की आगोश में सो गए. लेकिन
भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी
लड़ाई, ईमानदारी और
कामयाबियों की फेरहिश्त
इतनी लंबी है कि वो ध्रुव
तारे की तरह चमकते रहेंगे.

ईमानदार
और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों
को ढूंढने के लिए अब जहां
चिराग लेकर चलने की जरूरत
पड़ती है, दया शंकर एक
लाइटहाउस की तरह दूर से नजर
आते हैं. आखिर कौन थे दया शंकर?
क्यों उनके विभागीय
सहयोगियों से लेकर दाउद
इब्राहिम और लल्लू जोगी जैसे
कुख्यात स्मगलर और
अंडरवर्ल्ड डॉन भी उन्हें
भगवान की तरह सम्मान देते थे?

ये जानने के लिए हमे जाना
पड़ेगा अस्सी और नब्बे के दशक
में. दया शंकर से निजी तौर पर
मैं कभी नहीं मिल पाया था,
लेकिन उनकी ईमानदारी,
बहादुरी, सादगी और
कर्तव्यनिष्ठा की इतनी
कहानियां सुनी कि मैं उनका मन
ही मन फैन हो गया.

रिकॉर्ड
के लिए इतना बना दूं कि दया
शंकर का जन्म बिहार के पटना
में 21 फरवरी 1952 को हुआ था. वो
पटना साइंस कॉलेज के छात्र
रहे. 1978 में आईआरएस यानी
भारतीय राजस्व सेवा ज्वाइन
की.

फील्ड ट्रेनिंग के
सिलसिले में जब वो कलकत्ता
कस्टम्स हाउस पहुंचे थे, तभी
उनके वरिष्ठ अधिकारियों को
ये लग गया था कि ये युवा
अधिकारी लीक से अलग हटकर है.
दया शंकर की शोहरत तब फैली, जब
वो अस्सी और नब्बे के दशक में
देश के पश्चिमी हिस्से में
तैनात रहे.

मुंबई, दमण और
गोवा में बतौर कस्टम या
डीआरआई ऑफिसर जो उन्होंने
काम किये. वो विभाग के इतिहास
और उपलब्धियों के स्वर्णिम
पृष्ठ बन गये. ये वो दौर था, जब
अर्थव्यवस्था का उदारीकरण
हुआ नहीं था, सोने-चांदी से
लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामानों
की स्मगलिंग काफी मुनाफे
वाला काम था.

सौराष्ट्र
से लेकर गोवा के समुद्री
किनारों पर स्मगलिंग बड़े
पैमाने पर हो रही थी. यही नहीं,
कस्टम अधिकारियों की
मिलीभगत से विदेशों से हवाई
जहाज के जरिये भी स्मगलिंग चल
रही थी. ऐसे में दया शंकर एक
ऐसे अधिकारी के तौर पर उभरे,
जिन्होंने वन मैन आर्मी के
तौर पर स्मगलिंग के धंधे की
कमर तोड़ दी.

वो भी तब जब
उनके पास न तो कोई आधुनिक
उपकरण थे और न ही लंबी-चौड़ी
फौज. उनका हथियार महज उनकी
अतिशय ईमानदारी और मौत को गले
लगाने तक वाली हिम्मत थी.
इतनी ही मशहूर थी उनकी सादगी
भी.

कहा जाता है कि सिर्फ
पारले बिस्कुट पर वो कई दिनों
तक अपने एंटी स्मगलिंग
ऑपरेशन को अंजाम दिया करते
थे. दया शंकर के मशहूर होने की
शुरूआत मुंबई एयरपोर्ट पर
बतौर असिस्टेंट
कमिश्नर-कस्टम के तौर पर उनकी
तैनाती से हुई.

अपनी
तैनाती के साथ ही उन्‍होंने
छुपाकर लाये जा रहे सोने और
चांदी के बड़े-बड़े
कंसाइनमेंट को सीज किया. कुछ
ही दिनों के अंदर उनकी
ईमानदारी का ऐसा डंका बजा कि
दुबई से लेकर सिंगापुर और
हांगकांग तक के स्मगलर उन
हवाई उड़ानों में बैठने से
घबराने लगे, जो दया शंकर की
ड्यूटी के वक्त मुंबई
एयरपोर्ट पर पहुंचती थी.

हालात
तो ये थे कि कई विमान
कंपनियों ने अपनी उड़ानों को
भी ऐसे समय पर मुंबई में
उतारना शेड्यूल करना शुरू कर
दिया. जिस वक्त दया शंकर की
ड्यूटी एयरपोर्ट पर नहीं हुआ
करती थी, उनकी उड़ानें खाली
रह जाने का खौफ रहता था. आखिर
स्मगलरों की दया शंकर के रहते
मुंबई एयरपोर्ट पर उतरने की
हिम्मत जो नहीं थी.

कहते
हैं कि हालात तो ऐसे बन गये थे
कि दुबई में सोने के व्यापारी
स्मगलरों को सोने के साथ ही
मुबंई एयरपोर्ट पर तैनात
कस्टम अधिकारियों के ड्यूटी
शेडयूल तक मुहैया कराने लगे
थे, ताकि दया शंकर के ऑफ डे के
बारे में जानकर ही वो मुंबई
आने की अपनी टिकट बुक करा
सकें.

मुंबई के बाद कस्टम
विभाग ने दया शंकर की सेवाओं
का इस्तेमाल समुद्री तट से
होने वाली स्मगलिंग पर काबू
पाने के लिए भी किया. ये वो दौर
था, जब हाजी मस्तान से लेकर
सुकर नारायण बखिया और लल्लू
जोगी जैसे स्मगलिंग की
दुनिया के बड़े नाम
सौराष्ट्र तट से लेकर दमण और
वलसाड़ तक अपने माल की
लैंडिंग समुद्र तटों पर करते
थे.

दया शंकर को कस्टम
डिपार्टमेंट ने दमण में
पोस्ट किया. दमण उस वक्त
केंद्र शासित प्रदेश गोवा,
दमण व दीव का हिस्सा था और
फिलहाल दमण-दीव का मुख्यालय
है. दया शंकर ने यहां भी अपना
जलवा दिखाया. मोटे तौर पर
दुबई से जहाजों या फिर
बड़ी-बड़ी नावों में भरकर
सोने-चांदी से लेकर
इलेक्ट्रॉनिक सामानों तक की
जो खेप लाई जाती थी, उन पर धावा
बोलना शुरु कर दिया दया शंकर
ने.

किनारे पर तो ठीक, बीच
समंदर में भी स्मलगरों और
उनकी नावों का सैकड़ों बार
पीछा किया दया शंकर ने और
बड़े-बड़े कंसाइनमेंट को
पकड़ा. वो भी तब जब इस बात का
बराबर डर था कि स्मगलर उनकी
जान ले सकते थे. हालांकि
अपराध की दुनिया का एक पुराना
उसूल दया शंकर के हक में था.
अपराधी अमूमन ईमानदार
अधिकारियों की पकड़ से तो
अपने को बचाने की कोशिश करते
थे, लेकिन उनकी जान लेने से
परहेज करते थे. दो ऐसे किस्से
हैं, जो इसकी मिसाल हैं.

2010
के जनवरी महीने में इन
पंक्तियों का लेखक अपने समय
के कुख्यात स्मगलर लल्लू
जोगी से मिलने गुजरात के
उदवाड़ा गया था. उदवाड़ा
पारसी समुदाय का अत्यंत
महत्वपूर्ण धार्मिक तीर्थ
है, जहां उनकी अगियारी है. इस
अगियारी के पीछे लल्लू का
अपना विशाल फार्महाउस है,
जहां उससे मुलाकात हुई.

करीब
अस्सी वर्ष के हो चुके लल्लू
जोगी ने अपने स्मगलिंग दिनों
का वो किस्सा सुनाया, जो दया
शंकर से ताल्लुक रखता है.
लल्लू जोगी अपने साथियों के
साथ दमण के समुद्र तट पर रात
के वक्त चांदी की सिल्लियां
उतारने में लगा हुआ था, जब
अचानक दया शंकर ने छापा मारा.
माल के साथ खुद को बचाने की
कोशिश के तहत लल्लू जोगी ने
अपनी कार्बाइन सामने खड़े
दया शंकर पर तानी और उन्हें
वहां से चले जाने को कहा.
लेकिन दया शंकर कहां मानने
वाले थे, वो बिना डरे लल्लू
जोगी की तरफ बढ़ने लगे.

लल्लू
के सामने दुविधा थी, वो करे तो
क्या करे. एक तरफ जहां वो
चांदी और अपने माल को बचाना
चाह रहा था, वही वो दया शंकर
जैसे ईमानदार अधिकारी के खून
से अपने हाथ भी नहीं रंगना
चाह रहा था. ऐसे में उसे एक
तरीका ही सूझा. उसने दया शंकर
के दाएं-बाएं फायरिंग की और
पीछे की तरफ भागता चला गया. वो
चाहता तो दया शंकर को मार
सकता था, लेकिन उसके दिल ने
उसे रोक दिया. बाद में
आखिरकार दया शंकर ने लल्लू
जोगी को किसी और मामले में
पकड़ा और पूछा कि चांदी की
इतनी बड़ी खेप पकड़ी जाने के
बाद भी उसने जानलेवा हमला
क्यों नहीं किया, लल्लू के
शब्द थे – शेर शेर का शिकार
नहीं करता. ये किस्सा मैंने
दया शंकर से भी ईमेल के जरिये
कंफर्म किया था.

दया शंकर
का ऐसा ही एक मशहूर किस्सा
दाउद इब्राहिम से भी जुड़ा
हुआ है. दमण में सुकर नारायण
बखिया और लल्लू जोगी के
स्मगलिंग नेटवर्क को तहस-नहस
करने और उन्हें जेल की सलाखों
के पीछे पहुंचाने के बाद दया
शंकर एक बार फिर मुबंई पहुंच
गये थे. इस बार उनकी तैनाती
कस्टम विभाग के मरीन एंड
प्रीवेंटिव विंग में
असिस्टेंट कलेक्टर के तौर पर
हुई थी. 1985 में यहां उन्होंने
दाउद के भाई अनीस इब्राहिम को
एक कार में जाते हुए देख लिया
था और उसके पीछे-पीछे वो दाउद
के ठिकाने पानकोड़िया
स्ट्रीट तक पहुंच गये थे,
जहां शादी हो रही थी उसके भाई
नूरा की. अनीस ने जब कार से उतर
कर भागने की कोशिश की, तो दया
शंकर उसके पीछ लपक लिये. ये
देखकर दाउद गैंग के बाकी
सदस्य दया शंकर को घेरकर खड़े
हो गये. लेकिन दया शंकर को
पहचानते ही सब पीछे हट गये और
वो अनीस को लेकर अपने ऑफिस आ
गये. बाद में दाउद ने किसी से
कहा कि मैं साहब यानी दया
शंकर का कुछ भी बुरा नहीं कर
सकता था, हम तो उन्हें उनकी
ईमानदारी के लिए पूजते हैं,
अगर कोई और अधिकारी होता, जो
जिंदा नहीं जा पाता.

दाउद
ने 1988 में इलस्ट्रेटेड वीकली
को जो अपना इंटरव्यू दिया था,
उसमें भी उसने कहा था कि अगर
उसे सुधरने का मौका दिया जाए,
तो वो दया शंकर के नीचे
इंस्पेक्टर के तौर पर काम
करने को तैयार है. ये शख्सियत
थी दया शंकर की. दोस्त तो
दोस्त, दुश्मन भी सम्मान से
हमेशा उनका नाम लिया करते थे.

मुंबई के अलावा गोवा में
भी अपनी अमिट छाप छोड़ी दया
शंकर ने. यहां का तो एक किस्सा
गोवा के तत्कालीन
मुख्यमंत्री चर्चिल अलेमाओ
से ही जुड़ा हुआ है. यहां दया
शंकर के एक मातहत इंस्पेक्टर
कोस्टो फर्नांडीस ने 1991 में
एक मुठभेड़ और हाथापाई के
दौरान मुख्यमंत्री के भाई
अल्वेरनाज को तब मार डाला, जब
वो स्मगलिंग का सोना लेकर भाग
रहा था. इस मामले में सीबीआई
और स्थानीय कोर्ट दोनों ने ही
फर्नांडीस को हत्या का दोषी
माना. लेकिन दया शंकर अपने
मातहत का साथ देते हुए इस
मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले
गये और आखिरकार सुप्रीम
कोर्ट से राहत दिलवाई
फर्नांडीस को. यही नहीं
फर्नांडीस को बहादुरी के लिए
प्रेसिंडेट मेडल भी दिलवाया.

खुद चर्चिल अलेमाओ के
खिलाफ भी दया शंकर ने
स्मगलिंग निरोधी कानून
कोफेपोसा के तहत मामला दर्ज
किया. डीआरआई मुंबई में अपनी
पोस्टिंग के दौरान दया शंकर
ने अंडरवर्ल्ड के सभी बड़े
नामों करीमलाला, हाजी मस्तान,
युसूफ पटेल, दाउद इब्राहिम,
एक के बाद एक सबको अपने
शिकंजे में लिया. हालात ये थे
कि इन सभी स्मगलरों को भारत
में अपना माल उतारना मुश्किल
हो गया था. दया शंकर का अपना
खुफिया नेटवर्क इतना मजबूत
था कि कंसाइमेंट रवाना होने
के साथ ही दया शंकर को उसकी
सूचना लग जाती थी. दया शंकर को
मिली टिप कभी गलत साबित हुई
हो, ऐसा हुआ नहीं. यही नहीं,
मुंबई पुलिस ने भी
अंडरवर्ल्ड के खिलाफ अपने कई
ऑपरेशन दया शंकर से मिली
पक्की टिप के आधार पर पूरा
किया. हालांकि करीब दो दशक तक
स्मगलरों और अंडरवर्ल्ड के
खिलाफ मजबूत अभियान छेड़कर
लीजेंड बन चुके दया शंकर से
ईर्ष्या रखने वाले लोगों की
कमी भी नहीं थी. खुद विभाग के
अंदर भी एक बड़ा तबका ऐसा था,
जो उनकी शोहरत से जलता था.

एक
तरफ जहां वो अपने विभाग के
सबसे बड़े पोस्टर ब्वॉय थे,
वही उनको अब घुटन भी महसूस
होने लगी थी. उनको बैक करने
वाले अधिकारी एक के बाद एक
रिटायर होते जा रहे थे और
अधिकारियों के नये समूह में
सबके साथ उनकी ट्यूनिंग भी
नहीं जम पाती थी. यही नहीं, दया
शंकर की जान पर भी खतरा बना
हुआ था, क्योंकि अपराध की
दुनिया के सैकड़ों लोगों को
उन्होंने अपने साहसिक
अभियानों के जरिये अपना
दुश्मन भी बना रखा था. इस
मिले-जुले हालात में वो 1999 में
आस्ट्रेलिया एक साल के स्टडी
लीव पर गये. बौद्धिक संपदा
कानून यानी आईपीआर पर अध्ययय
करने. उनका इस विषय में मन लग
गया. स्टडी लीव पूरा करने के
बाद वो भारत वापस लौटे भी,
लेकिन कुछ समय बाद वापस
आस्टेलिया चले गये और वहां
अपनी अधूरी पीएचडी को पूरा
किया.

2005 में दया शंकर ने
भारतीय राजस्व सेवा से
स्वैच्छिक सेवानिवृति ले
लेने का मन बनाया और विभाग को
अपने इरादे की खबर की. लेकिन
इस पर जल्दी कोई कार्रवाई
नहीं हुई, उल्टे उनके सामने
विभागीय जांच शुरू हो गई.
जांच इस बात पर कि उन्होंने
आस्ट्रेलिया जाते समय
छुट्टी के लिए विभागीय आवेदन
प्रक्रिया का पालन नहीं किया
था. छह साल तक दया शंकर की ये
फाइल विभाग में पड़ी रही और
आखिरकार पिछले साल यानी 2011
में तत्कालीन वित्त मंत्री
और मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब
मुखर्जी ने उनकी वीआरएस की
दरख्वास्त मंजूर कर ली और
फाइल पर डाली ये टिप्पणी – वे
एक अद्वितीय, बेहतरीन और
ईमानदार अधिकारी हैं.

दया
शंकर वाकई कई मायनों में
अद्वितीय थे। अपने कैरियर के
दौरान उन्होंने अरबों रूपये
का स्मगलिंग का माल पकड़ा.
अगर वे चाहते तो विभाग के
नियमों के मुताबिक, करोड़ो
रुपये ईनाम के तौर पर कमा
सकते थे. लेकिन कभी उन्होने
खुद एक रुपये का ईनाम लेना
स्वीकार नहीं किया. बावजूद
इसके अब भी सरकारी खातों में
उनके हिस्से के लाखों रुपये
की ईनाम की राशि अब भी पड़ी
हुई है.
 
आस्ट्रेलिया में
अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद
वही के डीकीन यूनिवर्सिटी
में प्राध्यापक बन गये दया
शंकर. सवाल ये उठता है कि जिस
आदमी की दिलेरी, ईमानदारी और
कर्तव्यनिष्ठा के किस्से न
सिर्फ कस्टम की सैकड़ों
फाइलों और कई किताबों में
दर्ज हैं, आखिर वो क्यों छोड़
गया उसी विभाग को? उनको करीब
से जानने वाले बताते हैं कि
विभाग में भ्रष्टाचार के
बढ़ते सिलसिले और ईमानदार
अधिकारियों का साथ देने की
जगह उनसे किनारा कर लेने की
प्रवृति से अंदर से दुखी हो
चुके थे दया शंकर.

यही
नहीं, कई बड़े राजनेताओं और
मंत्रियों को भी अपनी न झुकने
वाली प्रकृति के कारण नाराज
कर चुके थे, किसी की भी गलत बात
सुनना उनके स्वभाव में नहीं
था. अंदर और बाहर दोनों जगह
लड़ते-लड़ते थकने लगे थे दया
शंकर. शायद यही कारण थे कि न
सिर्फ विभाग, बल्कि भारत
छोड़कर आस्ट्रेलिया में
रहना मंजूर किया दया शंकर ने.
इन पंक्तियों के लेखक ने दया
शंकर से उनके अतीत और खास तौर
पर आईआरएस की नौकरी छोड़ने के
बारे में ईमेल के जरिये जाना
चाहा था, लेकिन बड़ी विनम्रता
से उन्होंने इस बारे में
चर्चा करना ठुकरा दिया.

शायद
जिन परिस्थितियों में अपनी
सरकारी नौकरी छोड़कर शिक्षण
में जाना मंजूर किया दया शंकर
ने, उसकी कड़वाहट इतनी रही कि
उस पर चर्चा करना उनको कुछ
खास मंजूर नहीं था. खैर साठ
साल की उम्र में कैंसर की वजह
से दुनिया को अलविदा तो कह
दिया दया शंकर ने, लेकिन उनकी
याद मिटेगी नहीं, वो भी तब जब
बात चलेगी ईमानदार, दिलेर और
कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों
की. अमर रहें दया शंकर.

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