देश की राजनीतिक पार्टियों के नाम मतदाता का घोषणा-पत्र

By: | Last Updated: Wednesday, 2 April 2014 3:48 PM

नई दिल्ली: देश भर के गांधीवादियों की संस्था, राष्ट्रीय गांधी स्मारक निधि ने आम चुनाव से पूर्व देश के मतदाताओं और राजनीतिक दलों को संबोधित एक ‘मतदाता का घोषणा-पत्र’ जारी किया है, जिसे यहां मूल रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है-

 

चुनाव का आना किसी भी संसदीय लोकतंत्र की सबसे स्वाभाविक और सरल घटना होनी चाहिए. लेकिन हमारा दुर्भाग्य यह है कि यहां चुनाव का मतलब होता है निजी और सार्वजनिक जीवन की सारी क्षुद्रताओं और कमजोरियों का उभर आना.

 

 हम देख ही रहे हैं कि जैसे-जैसे लोकसभा के चुनाव निकट आ रहे हैं, राजनीतिक व सामाजिक जीवन में कटुता बढ़ती जा रही है. आचार्य विनोबा भावे ने कभी चुनावी मानसिकता का विवरण देते हुए कहा था: हमारे यहां चुनाव आत्म-प्रशंसा, परनिंदा और मिथ्या भाषण का अवसर होता है.

 

चुनाव से ठीक पहले मतदाता का यह घोषणा-पत्र जारी करते हुए हम गांधीजन सभी राजनीतिक दलों से, उनके कार्यकर्ताओं-समर्थकों से सबसे पहली अपील तो यही करना चाहते हैं कि सार्वजनिक जीवन और व्यवहार का स्तर इतना नीचा मत गिराइए कि चुनाव के बाद अपने मुहल्ले-समाज में सिर उठा कर चलने की जगह ही न बचे!

 

 समाज का नैतिक व व्यावहारिक स्तर बना कर रखना इसके हर सदस्य की जिम्मेवारी है. हम सब याद रखें कि इस समाज में हमारे राजनीतिक विरोधी ही नहीं रहते हैं, हमारे बच्चे और हमारा परिवार भी इसी समाज में जीता व सांस लेता है. उसे जहरीला बनाना अपने पांव पर आप ही कुल्हाड़ी मारने जैसा या जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने जैसी मूढ़ता है. हम सब इससे बचें और अपने समाज को बचाएं.

 

आज हम राजनीतिक दलों के ऐसे जंगल में रहते हैं जहां संख्या पर बहुत जोर है, गुणवत्ता पर नहीं! राजनीतिक व्यवहार व दिशा के स्तर पर, कार्यक्रमों व नीतियों के स्तर पर, प्रशासन व कानून-व्यवस्था के स्तर पर किसी राजनीतिक दल में हमें कोई फर्क दिखाई नहीं देता है. लंबे समय से सत्ता के खेल में शामिल रहने के कारण इन सबमें एक-सी दिशाहीनता व जड़ता ने जगह बना ली है.

 

 547 सीटों वाली हमारी लोकसभा जैसे एक खास सुविधाप्राप्त वर्ग का आरामगाह बन गई है; जहां म्यूजिकल चेयर की तरह सत्ता का खेल चलता है. पार्टी, पैसा, परिवार आदि से सम्पन्न लोग इसमें भागीदारी करते हैं और एक-दूसरे की मदद करते हुए, सदा सत्ता-वर्ग में बने रहते हैं.

 

अगर आम मतदाता आज की तरह ही असंगठित और उदासीन रहा तो पूरी संभावना है कि आदर्श व मूल्यविहीन हमारा सत्ताधारी वर्ग इन्हें भी अपने रंग में रंग ले. इसलिए हमें यह जरूरी लगता है कि अपने-अपने क्षेत्र में, उम्मीदवारों की गहरी पड़ताल करें और जहां-जहां भी हम इन्हें बेहतर व भरोसे के लायक पाएं, वहां-वहां इनकी सफलता सुनिश्चित करें.

 

आज देश के सार्वजनिक जीवन पर राजनेताओं-पूंजीपतियों-नौकरशाहों के सबसे भ्रष्ट तत्वों का कब्जा बना हुआ है. नीतियां बनाने से लेकर उनके कार्यान्वयन तक, सब कुछ जैसे इनके ही हाथों में गिरवी है. कभी लोकतंत्र की परिभाषा हुआ करती थी – जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन! आज यह परिभाषा पूरी तरह बदल गई है. आज लोकतंत्र के नाम पर यही लोकविहीन भष्ट तंत्र भर बचा है. इसलिए हम कहते हैं कि यह चुनाव हमें लोकतंत्र को बचाने और बनाने का भी संभवत: आखिरी मौका देता है.

 

 आप सावधान रहें और सावधानी से परखें कि जो कुख्यात भ्रष्ट है; शराबी है या शराब का धंधा करता है; सरकारी योजनाओं-परियोजनाओं को अपनी या अपने परिजनों की मुट्ठी में रखता है; जातीय या सांप्रदायिक नारे के बल पर अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाता है; गुंडों का आतंक फैला कर हमारा वोट हड़पना चाहता है – ऐसा व्यक्ति किसी भी पार्टी से टिकट लेकर क्यों न सामने आ जाए, उसे हमारा वोट नहीं मिलना चाहिए, ऐसे लोगों को वोट देकर लोकसभा में भेजना आत्महत्या के बराबर है.

 

हम ऊंची व साफ आवाज में सबसे कहना चाहते हैं कि हमें भी विकास चाहिए, वादों वाला विकास नहीं, धरती पर उतरने वाला पूरा विकास चाहिए और आज ही चाहिए! जो प्यासा है, उसकी प्यास आज ही बुझनी चाहिए; जो बेघर है उसे आज ही छत मिलनी चाहिए; जो बीमार है उसे दवा और जो पढ़ना चाहता है उसे स्कूल मिलना चाहिए, किताबें मिलनी चाहिए, शिक्षक मिलना चाहिए और ऐसा स्कूल मिलना चाहिए जहां अनुशासन हो, स्नेह हो, पढ़ाई हो.

 

जब राशन की दूकान पर राशन नहीं मिलता हो; नलों में पानी नहीं आता हो; बिजली के खंभे भर हों पर बिजली न हों; सड़कों में गड्ढे न हों बल्कि गड्ढों में सड़कें हों; जब पुलिस अपराध को रोकने मंे सुस्त लेकिन अपराधियों को बचाने में सक्रिय हो; जब महिलाओं की इज्जत सुरक्षित न हो और महिलाओं के लिए आगे बढ़ने के अवसर सुरक्षित न हों; जब परमाण्विक बम पहले बनाए जाते हों लेकिन सीमा पर खड़े जवानों को बुनियादी हथियार न मिलते हों; जब निजी वाहनों की संख्या पर रोक लगाना व सार्वजनिक वाहनों को आरामदेह, सुरक्षित व समय का पाबंद बनाना किसी की प्राथमिकता में न हो – तब यह सवाल पूछना जरूरी हो जाता है कि यह कैसा विकास है जो आपके यहां तो चमकता है, दोनों हाथों लूटा जाता है लेकिन जो हमारे यहां विनाश बन कर घुमड़ता है और हमें लूट कर चला जाता है. इस चुनाव में उन्हें वोट हर्गिज न दें जिन्होंने हमारे इन हालातों को बदलने के लिए अब तक कुछ भी ठोस नहीं किया है.

 

चुनाव लोकतंत्र की एक ठोस प्रक्रिया तभी बनता है जब वह जनता के अंकुश में रहता है. इसलिए मतदाताओं से हमारी अपील है कि वे अपनी-अपनी जगह पर मतदाता मंडलों का गठन कर लें और चुनाव में क्या करना है, खुली चर्चा में इसका निर्धारण करे. यही जनता की राजनीति है जिसे खोजना, बनाना और सक्रियता से लागू करना है. वोट हमारी सम्पत्ति है जिसे हम अपनी समझ व मर्जी से जिसे उचित समझेंगे, उसे देंगे. इसलिए सारे उम्मीदावारों से कहिए: शांति से आइए, अपनी बात समझाइए और जाइए. हम अपना फैसला आप करेंगे.

 

इस चुनाव के साथ चुनाव का भी और हम मतदाताओं का चेहरा भी हमेशा के लिए बदल जाए, यही आज हमारे इस घोषणा-पत्र का मुख्य बिंदु है.

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Web Title: देश की राजनीतिक पार्टियों के नाम मतदाता का घोषणा-पत्र
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