देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ इंसाफ नहीं हुआ तो देश के आम लोगों को इंसाफ कैसे मिलेगा?  

By: | Last Updated: Wednesday, 19 February 2014 1:05 PM
देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ इंसाफ नहीं हुआ तो देश के आम लोगों को इंसाफ कैसे मिलेगा?  

नई दिल्ली: देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या भी आखीरकार चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ गई. पहले कांग्रेस राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर लंबे वक्त तक तमिल राजनीति में अपना नफा-नुकसान परखती रही. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद तो पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को रिहा करवाने और इसका श्रेय लूटने के लिए एक शर्मनाक होड़ शुरू हो गई. डीएमके और एआईएडीएमके इन हत्यारों को इस तरह से पेश कर रहे हैं मानो वो तमिलनाडु के नायक हों. इस सब तमाशे के बीच देश के लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि देश की राजनीति के लिए क्या हत्या कोई जुर्म नहीं रहा? अगर देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ इंसाफ नहीं हुआ तो देश के आम लोगों को इंसाफ कैसे मिलेगा? 

 

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तमिलनाडु में राजीव गांधी के हत्यारों की तरफदारी को लेकर डीएमके और एआईएडीएमके में होड़ सी मची हुई है. मंगलवार को राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही डीएमके के करुणानिधि ने कहा था कि वे इस फैसले का स्वागत करते हैं, अगर अब इनकी रिहाई हो जाए तो उन्हें और भी ज्यादा खुशी होगी. इसके एक दिन बाद ही बुधवार को तमिलनाडु सरकार ने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए इन हत्यारों की रिहाई का फैसला भी ले लिया.

 

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राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर तमिलनाडु में शतरंज की बाजी सी बिछी हुई है. जिसमें एक ओर है सत्तारूढ़ एआईएडीएमके और दूसरी ओर है विपक्षी डीएमके. इस चुनावी बाजी में एक तीसरा पक्ष भी है, कांग्रेस जो इन दोनों का खेल बिगाड़ने की भूमिका में है. जयललिता सरकार के हत्यारों की रिहायी के फैसले से तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस बेचैन हो उठी. नतीजतन शाम होते-होते केंद्रीय गृहमंत्रालय ने तमिलनाडु सरकार के फैसले पर आपत्ति जता दी. गृह मंत्रालय ने कहा है कि तमिलनाडु की जयललिता सरकार को राजीव गांधी के हत्यारों को जेल से रिहा करने का अधिकार नहीं है. 

 

तमिलनाडु के नजरिए से देखें तो राजीव गांधी के हत्यारों का मामला केंद्र के बजाय एलटीटीई से कहीं ज्यादा जुड़ा है. इस फैसले ने तमिलों को एक बार फिर प्रभाकरन की याद दिला दी है. बाकी बचा काम राजनीतिक दल कर रहे हैं जो वोटों की राजनीति के स्वार्थ के चलते अब तक एलटीटीई की निशानियों को सहेजे हुए हैं. चाहे सत्तारूढ़ एआईएडीएमके हो या फिर डीएमके ये दोनों दल हमेशा से तमिल भावनाओं की राजनीति करते रहे हैं. आने वाले लोकसभा चुनावों के मौके पर इन्हें तमिल भावनाओं को वोट में बदलने का बैठे-बिठाये एक अनोखा फार्मूला हाथ लग गया है.

 

वोटों की राजनीति और सत्ता की चाहत में कांग्रेस ने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों सजा दिलवाने में अक्षम्य लापरवाही बरती. हत्यारों की दया याचिका राष्ट्रपति के पास 11 साल तक लंबित पड़ी रही. केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद गृहमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका की फाइल पर अपनी राय राष्ट्रपति को भेजने में नाकाम रहे. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका निपटाने में देरी के पीछे तमिल सियासत की अहम भूमिका रही है. फांसी में हुई देरी केवल सरकार की लापरवाही नहीं, बल्कि तमिल सियासत से जुड़ी मजबूरी थी.

 

माना जा रहा है कि इस भावनात्मक मुद्दे पर सबसे ज्यादा फायदा डीएमके को मिलेगा. यूपीए-एक सरकार में पूरे समय और यूपीए-दो सरकार में तीन साल तक कांग्रेस के साझीदार रहे डीएमके के एम. करुणानिधि को तमिलनाडु की सियासत में इस मुद्दे पर फिर खड़े होने का मौका मिल जाएगा. इसके साथ ही कांग्रेस को भी तमिलनाडु में कुछ फायदा हो सकता है. हालांकि, कांग्रेस ने इस मामले को अदालत का फैसला बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया. लेकिन हमेशा पार्टी की लाइन से अलग राय जाहिर करने वाले राजीव गांधी के बेटे और कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने इस फैसले पर दुख जताते हुए कहा है कि जब एक पीएम के हत्‍यारों को रिहा किया जा रहा है तो आम आदमी न्‍याय की क्‍या उम्‍मीद कर सकता है.

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