देसी इलाज के नाम पर स्वमूत्र पान कितना जायज़ है?

देसी इलाज के नाम पर स्वमूत्र पान कितना जायज़ है?

By: | Updated: 11 Jul 2012 07:32 AM


नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल
के शांति निकेतन में दस साल
की बच्ची को उसी का पेशाब
पिलाने के आरोपी वार्डन के
समर्थन में आए हैं स्वामी
अग्निवेश.




सामाजिक कार्यकर्ता
अग्निवेश ने ये कहते हुए
वार्डन का बचाव किया है कि
बच्ची के साथ उमा ने न तो
ज़बरदस्ती की, न ही कुछ गलत
किया. दूसरी तरफ बच्ची घटना
के बाद से सदमे में है और देश
भर में इस घटना का विरोध हुआ
है.




सवाल ये है कि देसी इलाज के
नाम पर ऐसा बर्ताव क्या सही
है.




बच्ची का कहना है, मैंने जिस
चादर पर पेशाब किया था. उस
चादर पर नमक डाला. फिर मुझे
पीने के लिए मजबूर किया.




दस साल की मासूम के साथ जो हुआ
उसने पूरे देश को झकझोर कर रख
दिया. पश्चिम बंगाल के वीरभूम
जिले में शांति निकेतन के
पाथा भवन स्कूल में शनिवार को
बच्ची को पेशाब पिलाने की
घटना के बाद पूरे देश में
हंगामा मच गया.




अब घटना के चार दिन बाद जागे
अग्निवेश स्कूल के वार्डन के
समर्थन में उतर पड़े हैं जिन
पर बच्ची को पेशाब पिलाने का
आरोप है.




अग्निवेश का कहना है, जहां तक
वार्डन का सवाल है, उस गरीब सी
महिला पर सारा देश ऐसे टूटकर
पड़ रहा है जैसे उसको फांसी
पर लटका देंगे. बहुत बड़ा
जघन्य अपराध कर दिया. उसने
पहले भी लड़कियों को कहा था
कि ये देसी इलाज है तो उसने
कहा होगा कि तुम भी पी लो भई.




मतलब साफ है अग्निवेश ये भी
नहीं जानते कि वार्डन ने उस
बच्ची के साथ ज़बरदस्ती की थी
या नहीं लेकिन हर मसले पर
अपनी राय रखने वाले अग्निवेश
वार्डन के समर्थन में कूद
पड़े और तो और उन्होंने खुद
की मिसाल दे दी कि पेशाब पीना
तो देसी इलाज है और इसमें कुछ
भी बुरा नहीं.




अग्निवेश ने आगे कहा, "मुझे
खुद शिकायत थी. मैं बिस्तर
में पेशाब कर देता था, तो जो
स्वास्थ्य संबंधी किताबें
हैं उसमें मैंने स्वमूत्र
चिकित्सा की किताब पढ़ी.
इमरजेंसी के दिनों में जेल
में था. किताबें पढ़ीं तो लगा
कि ये इलाज तो मेरे पास है."




दलील पर दलील





पेशाब के सेवन
से शरीर को कितना फायदा होता
है इस पर बहस हो सकती है लेकिन
दस साल की बच्ची को उसकी
मर्जी के बगैर पेशाब पिलाने
की वकालत करना क्या सही है.
काश अग्निवेश ने भी सुन ली
होती बच्ची की आपबीती.




पीड़ित महिला का कहना है, "मैं
रोज बिस्तर पर पेशाब कर देती
थी. वो लोग मुझे धमकाते थे कि
एक दिन तुम्हें पेशाब पिलाया
जाएगा. उस दिन सुबह में
उन्होंने सच में ही मुझे
पेशाब पिला दिया."




शनिवार की रात हुई घटना के
बाद रविवार को बच्ची के
माता-पिता ने वार्डन के खिलाफ
मामला दर्ज करवाया.




शांति निकेतन प्रशासन की तरफ
से भी बच्ची के माता-पिता पर
होस्टल में हंगामा करने के
आरोप लगा. वॉर्डन और बच्ची के
माता-पिता की गिरफ्तारी भी
हुई लेकिन सबको जमानत पर छोड़
दिया गया.




पीड़ित बच्ची को बिस्तर गीला
करने की आदत थी लेकिन शनिवार
की सुबह जब वॉर्डन को पता चला
तो वो पेशाब पिलाने वहां
पहुंच गई. उसने पेशाब में नमक
मिलाया और फिर उसे पीने को
कहा.




बच्ची के मुताबिक वो वार्डन
के सामने रोई-गिड़गिड़ाई थी
लेकिन उसे दूसरी लड़कियों की
मौजूदगी में ज़बरदस्त पिला
दिया. वाकये के बाद सहमी
बच्ची ने अपने घरवालों को ये
बात बताई तब जाकर वारदात सबके
सामने आई. घटना के बाद से
बच्ची अभी भी सदमे में है.




पीड़ित बच्ची का कहना है,
"पिछले तीन दिनों से मैं सदमे
से बाहर निकलने की कोशिश कर
रही हूं. मुझे हमेशा उल्टी आ
रही है. जब भी मैं खाने का
निवाला मुंह में लेती हूं
मुझे पेशाब की दुर्गंध आती
है. मुझे लगता है जैसे किसी ने
मेरे सोने में पेशाब और नमक
मिला दिया है."




बच्ची अब खुद को उस अहसास से
बाहर निकालने के लिए पेंटिंग
बना रही है लेकिन फिर भी उस
घटना से बाहर नहीं निकल पा
रही है.




शांति निकेतन के विश्व भारती
विश्वविद्यालय प्रशासन की
तरफ से घटना की जांच के लिए
चार सदस्यों की जांच कमेटी
बनाई गई थी जिसने प्राथमिक
रिपोर्ट वीसी को सौंपी है
जिसके मुताबिक वार्डन ने
बच्ची को यूरीन पीने का
निर्देश तो दिया था लेकिन
बच्ची ने नहीं पीया. फिलहाल
वार्डन उमा पोद्दार सस्पेंड
हैं.




पांचवीं क्लास में पढ़ने
वाली बच्ची के साथ जो घटना
हुई उसका हर जगह विरोध हो रहा
है और बड़ा सवाल ये है कि देसी
इलाज के नाम पर ज़बरदस्त ऐसी
हरकत करना कितना जायज़ है.





http://www.youtube.com/watch?v=jaZEtDrGGNQ




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