दो दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुलझा 'बड़ौदा रियासत' के वारिसों के बीच संपत्ति का विवाद

By: | Last Updated: Thursday, 24 October 2013 10:42 AM
दो दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुलझा ‘बड़ौदा रियासत’ के वारिसों के बीच संपत्ति का विवाद

<p style=”text-align: justify;”>

</p>
<p style=”text-align: justify;”>
कभी देश की बड़ी रियासतों में
से एक रही बड़ौदा के राजसी
परिवार की पचीस हजार करोड़
रुपये से भी अधिक की संपत्ति
का हो गया है बंटवारा. वो
बंटवारा, जिसके लिए राजसी
परिवार के अंदर पिछले दो दशक
से भी अधिक समय से था विवाद और
इसके कारण कोर्ट में चल रहे
थे आधे दर्जन से भी अधिक
मुकद्दमे.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
वडोदरा के उसी ‘लाल कोर्ट’
में बुधवार के दिन राजसी
परिवार के सदस्यों के बीच
समझौते को कानूनी जामा पहना
दिया गया, जिस कोर्ट का
निर्माण बड़ौदा रियासत के
सबसे मशहूर शासक रहे महाराजा
सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के
समय हुआ था. ‘लाल कोर्ट’ में
राजसी परिवार के तमाम सदस्य
आए. इन्हीं में से एक थीं
प्रियदर्शिनी
ज्योतिरादित्य सिंधिया.
पूरा नाम लिखने से अंदाजा तो
लग ही गया होगा कि ये एक समय की
बड़ी देसी रियासत ग्वालियर
के मौजूदा वारिस और कांग्रेस
नेता व केंद्रीय मंत्री
ज्योतिरादित्य सिंधिया की
पत्नी हैं और बड़ौदा राजसी
परिवार के सदस्य
संग्रामसिंह गायकवाड़ की
बेटी.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
समझौते के तहत ‘बड़ौदा
रियासत’ के मौजूदा
‘महाराजा’ समरजीतसिंह
गायकवाड़ के खाते में वडोदरा
की सबसे मशहूर इमारत
‘लक्ष्मी विलास पैलेस’ गई है,
साथ में कई और महल, अमूल्य
पेंटिग्स, हीरे-जवाहरात और
गहने. अब आप कहेंगे कि
‘डेमोक्रेटिक’ भारत में भला
कौन ‘रियासत’ और कौन
‘महाराजा’. कानूनी तौर पर
तत्कालीन प्रधानमंत्री
इंदिरा गांधी ने भले ही 1971 में
प्रीवी पर्स खत्म कर
राजाओं-महाराजाओं को
‘डी-रिकोग्नाइज’ कर दिया,
लेकिन पूर्व रियासतों के
शासक रहे परिवारों में आज भी
उत्तराधिकार और एक
‘महाराजा’ के मरने के बाद
दूसरे ‘महाराजा’ के
सत्तारोहण की सांकेतिक ही
सही, लेकिन परंपरा निभाई जाती
है.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
पिछले साल ही वडोदरा में ये
देखने को मिला जब तत्कालीन
‘महाराजा’ रंजीतसिंह
गायकवाड़ की मौत के बाद उनके
बेटे समरजीत सिंह को लक्ष्मी
विलास पैलेस के अंदर
पारंपरिक समारोह में
गद्दीरुढ़ किया गया, वो तमाम
परंपराएं निभाई गई, जो असली
रियासतों के दौर में निभाई
जाती थीं.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
<b>बंटवारे की कहानी</b>
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
जहां तक
बंटवारे का सवाल है, वो हुआ है
‘महाराजा’ समरजीतसिंह
गायकवाड़, उनके चाचा
संग्रामसिंह गायकवाड़ और
समरजीतसिंह की फूफियों के
बीच. देश के सबसे बड़े राजसी
बंटवारे के बारे में विस्तार
से बताने के पहले ये बता देना
लाजिमी होगा कि आखिर इसकी
नौबत क्यों आई.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
दरअसल हैदराबाद के निजाम के
बाद देश का दूसरा सबसे समृद्ध
राजसी घराना रहा है गायकवाड़
घराना. इस घराने के सोलह
राजाओं ने बड़ौदा रियासत पर
शासन किया. रियासत की स्थापना
की दामजीराव प्रथम ने और इसके
सबसे प्रतापी शासक हुए
महाराजा सयाजीराव तृतीय.
सयाजीराव वर्ष 1875 में बड़ौदा
की राजगद्दी पर बैठे और महज 18
साल की उम्र में वर्ष 1881 में
शासन की बागडोर संभाल ली.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
सयाजीराव तृतीय का राज काफी
लंबा चला, 58 वर्षों तक
उन्होंने शासन किया. इस दौरान
बड़ौदा रियासत शिक्षा से
लेकर सामाजिक सुधारों तक, हर
मामले में देश की अग्रणी
रियासतों में तब्दील हुई.
अपने समय के सबसे
‘प्रोग्रेसिव’ शासक साबित
हुए सयाजीराव तृतीय. देश में
जब कोई महिला शिक्षा के बारे
में सोचता नहीं था, उस वक्त
उन्होंने अपनी रियासत में
कन्या शिक्षा को ‘अनिवार्य’
बना डाला.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
सयाजीराव तृतीय के लंबे शासन
के दौरान बड़ौदा रियासत
आर्थिक तौर पर भी काफी समृद्ध
बनी. इसका अंदाजा लगाने के
लिए एक छोटा सा उदाहरण ही
काफी होगा. एडवर्ड सप्तम को
जब ग्रेट ब्रिटेन के राजा के
साथ ही भारत का ‘सम्राट’
घोषित किया गया, तो जनवरी 1903
में ‘दिल्ली दरबार’ का आयोजन
हुआ. तत्कालीन वायसराय लॉर्ड
कर्जन की तरफ से इस दरबार का
आयोजन भारतीय रियासती
शासकों की ब्रिटिश सम्राट और
उसके ‘प्रतिनिधि’ के प्रति
‘निष्ठा’ के सार्वजनिक
प्रदर्शन के लिए किया गया था.
लेकिन ये मौका देसी रियासतों
के वैभव के सार्वजनिक
प्रदर्शन का अवसर भी बन गया.
इस दरबार में महाराजा
सयाजीराव तृतीय ने ‘पर्ल
कार्पेट’ का प्रदर्शन किया
था. बहुमूल्य मोतियों और
जवाहरातों से बनी इस कार्पेट
की कीमत उस समय ही थी एक करोड़
रुपये. अंदाजा लगाइए 1903 के एक
करोड़ रुपये की आज क्या
‘वैल्यु’ हो सकती है. बाद में
ये बेशकीमती कार्पेट देश के
बाहर चली गई, 1989 में जब इसका
आखिरी मूल्यांकन हुआ था, तो
इसकी कीमत लगी थी तीन करोड़
दस लाख अमेरिकी डॉलर.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
<a
href=”http://www.abpnews.newsbullet.in/blogtest/74-more/53597-2013-09-11-09-08-45″>अखिलेश
को लिखे गए एक खुल पत्र के
बहाने जाने सयाजीराव
गायकवाड़ को</a><br />
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
सयाजीराव गायकवाड़ के 1939 में
निधन के बाद उन्हीं की इच्छा
के मुताबिक बड़ौदा रियासत की
गद्दी उनके पोते
प्रतापसिंहराव गायकवाड़ को
मिली. जब देश ‘आजाद’ हुआ, तो
प्रतापसिंहराव गायकवाड़ ही
बड़ौदा रियासत के शासक थे.
लेकिन शासन के प्रति उनकी
उदासीनता और आर्थिक
अनियमितता की बढ़ती
शिकायतों के बाद 1951 में
उन्हें ‘गद्दी’ से हटाया गया
और उनके ज्येष्ठ बेटे
फतेसिंहराव गायकवाड़ को नये
‘महाराजा’ के तौर पर मान्यता
दी गई.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
दरअसल प्रतापसिंहराव ने
सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के
बनाए नियमों के उलट जाकर एक
‘तलाकशुदा’ महिला सीता देवी
से शादी कर ली थी और सीता देवी
के चक्कर में ही आखिर उनकी
गद्दी भी गई. जिस बेशकीमती
‘पर्ल कार्पेट’ की बात ऊपर की
जा रही थी, वो प्रतापसिंहराव
गायकवाड़ सीता देवी के कहने
पर ही देश के बाहर ले गये थे.
आज ये कार्पेट कहां है, इसका
ठीक ठीक अंदाजा किसी को नहीं.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
जहां तक प्रतापसिंहराव
गायकवाड़ की पहली शादी यानी
महारानी शांतादेवी गायकवाड़
से पैदा हुई संतानों का सवाल
है, उनमें फतेसिंहराव के
अलावा दो बेटे और पांच
बेटियां रहीं.
प्रतापसिंहराव गायकवाड़ को
जब तत्कालीन केंद्र सरकार ने
‘पदच्युत’ करने का फैसला
किया, तो फतेसिंहराव को बतौर
‘महाराजा’ मान्यता दी गई.
फतेसिंहराव क्रिकेट से लेकर
राजनीति तक कई मोर्चों पर
सक्रिय रहे. वड़ोदरा के सांसद
तो रहे ही, अपने समय के अच्छे
क्रिकेटर भी थे. बाद में
क्रिकेट के कुशल प्रशासक और
यहां तक कि ‘एक्सपर्ट’
कमेंटेटेर के तौर पर भी
उन्हें जाना गया. भारतीय
राजसी महलों पर भी उन्होंने
एक शानदार किताब लिखी.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
<b>क्यों शुरू हुई बंटवारे की
लड़ाई</b>
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
इन्हीं फतेसिंहराव गायकवाड़
की एक सितंबर, 1988 को हुई मौत के
बाद उनके छोटे भाई और
प्रतापसिंहराव गायकवाड़ के
दूसरे बेटे रंजीतसिंह
गायकवाड़ को सांकेतिक और
रस्मी ही सही, बड़ौदा की
राजगद्दी पर बिठाया गया.
हालांकि 1971 में ‘प्रीवी पर्स’
समाप्त किये जाने और देसी
राजाओं को ‘डी-रिकोग्नाइज’
किये जाने के बाद इनके
सत्तारोहण या महाराजा की
परंपरा को निभाये जाने का कोई
कानूनी या वैधानिक मतलब नहीं
रह गया था.  ऐसे में रंजीतसिंह
गायकवाड़ के सत्तारोहण के
साथ ही राजसी परिवार के अंदर
संपत्ति के बंटवारे को लेकर
लड़ाई शुरु हो गई.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
रंजीतसिंह गायकवाड़ के छोटे
भाई संग्रामसिंह गायकवाड़
ने 1991 में पहला केस दाखिल किया.
उसके बाद से एक के बाद एक
दोनों तरफ से आधे दर्जन से
अधिक केस अलग-अलग अदालतों में
दायर किये गये. रंजीतसिंह
गायकवाड़ की जिंदगी में
दोनों भाइयो के बीच कोई
समाधान नहीं हो सका, हालांकि
कोशिशें कई बार हुईं.
रंजीतसिंह गायकवाड़ वडोदरा
शहर के अंदर आने वाली कोई भी
संपत्ति अपने भाई
संग्रामसिंह को देने को
तैयार नहीं थे. पांचों  बहनें
भी मोटे तौर पर रंजीतसिंह के
साथ ही खड़ी रहीं. इसी दौरान
वर्ष 2002 में इनकी मां यानी
‘राजमाता’ शांतादेवी
गायकवाड़ की मौत हो गई.
कानूनी तौर पर आखिरी
‘रिकोग्नाइज्ड’ महाराजा
फतेसिंहराव गायकवाड़ की मौत
के बाद राजसी परिवार की पूरी
संपत्ति मां शांतादेवी के
पास चली गई थी. शांतादेवी
रंजीतसिंह के साथ रहती थीं और
उन्होंने अपनी ‘वसीयत’ भी
बनाई थी. लेकिन जब ‘वसीयत’ को
कार्यान्वित करने का समय आया,
तो संग्रामसिंह ने घपले का
आरोप लगाते हुए इसे चुनौती दे
डाली.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
इस विवाद के बीच ही रंजीतसिंह
गायकवाड़ की पिछले साल 10 मई को
मौत हो गई. इसके बाद उनके एक
मात्र बेटे समरजीत सिंह
गायकवाड़ को बड़ौदा की
‘राजगद्दी’ पर बतौर महाराजा
बिठाने की सांकेतिक रस्म 22
जून 2012 को निभाई गई.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
<b>लड़ाई खत्म करने की कोशिश</b>
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
सूत्रों के मुताबिक,
समरजीत के हाथ में कमान आ
जाने के बाद से परिवार में
संपत्ति के बंटवारे को लेकर
हो रहे घमासान को खत्म करने
की कोशिश तेज हुई. पिछले छह
महीने में दोनों पक्षों के
वार्ताकारों की तरफ से
दर्जनों बार बैठकें हुई और
मंगलवार की देर शाम समझौते की
शर्तों को आखिरी शक्ल दे दी
गई. इसी के आधार पर बुधवार के
दिन बड़ौदा राजसी परिवार के
सभी संबंधित सदस्य लालकोर्ट
पहुंचे, जहां सयाजीराव
गायकवाड़ तृतीय के शासन में
रियासत की प्रजा के कानूनी
विवाद सुलझाए जाते थे. शाम
साढ़े पांच से रात आठ बजे के
बीच सीनियर सिविल जज एमएच
शर्मा के सामने कुल अठाइस
व्यक्तियों के बीच संपत्ति
के बंटवारे से जुड़े समझौता
पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये
गये और इस तरह बड़ौदा राजसी
परिवार के अंदर पिछले बाइस
वर्षों से चले आ रहे विवाद का
अंत आ गया.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
समझौता पत्र पर हस्ताक्षर
करने वालों में समरजीतसिंह
गायकवाड़ और उनके चाचा
संग्रामसिंह गायकवाड़ और
उनके परिवार के सदस्यों के
अलावा संग्रामसिंह की बहनों
और उनके परिवार के सदस्य भी
रहे. समझौते पर हस्ताक्षर
करने से पहले उन सभी मामलों
को अदालत से वापस ले लिया गया,
जो संपत्ति विवाद के कारण
दोनों पक्षों की तरफ से दायर
किये गये थे.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
<b>बंटवारे में किसको क्या
मिला</b>
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
सवाल उठता है कि समझौते में
किसको क्या मिला. अगर मोटे
तौर पर कहें तो राजसी परिवार
की चल-अचल संपत्ति का बड़ा
हिस्सा ‘मौजूदा महाराजा’
समरजीतसिंह गायकवाड़ के हाथ
में गया, जबकि उनके चाचा को
अपेक्षाकृत कम संपत्ति के
साथ ही संतोष करना पड़ा. जहां
तक समरजीतसिंह की फूफियों या
फिर यूं कहें कि संग्रामसिंह
की बहनों का सवाल है, उन्हें
भी वडोदरा के अंदर जमीनें और
मुंबई के अंदर रिहाइशी
संपत्ति दी गई.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
जहां तक बड़ौदा राजसी परिवार
से जुड़ी इमारतों का सवाल है,
उनमें से सबसे बड़ी और मशहूर
इमारत, जो ‘लक्ष्मी विलास
पैलेस’ के तौर पर जानी जाती
है, वो गई समरजीतसिंह
गायकवाड़ के खाते में. न
सिर्फ ये पैलेस, बल्कि इसके
साथ लगी करीब छह सौ एकड़ जमीन
भी. इसके अलावा मोतीबाग
पैलेस, चिमनाबाग पैलेस,
विश्रामबाग पैलेस, कुसुम
विलास पैसेल, राजमहल ग्राउंड,
एक्जीविशन ग्राउंड,
रेसकोर्स भवन, राजा रवि वर्मा
स्टूडियो और फतेसिंहराव
म्यूजियम जैसी इमारतें और
बड़े मैदान भी समरजीतसिंह के
हिस्से में गये. इसके साथ ही
बड़ौदा रियासत के समय के सभी
बेशकीमती हीरे, जवाहरात या
फिर पेंटिंग्स भी समरजीत
सिंह के पास गई. चांदी की तोप
और सोने की बग्गी भी उन्हीं
के पास रही. ‘देवस्थान
ट्रस्ट’ के अंदर आने वाली सभी
संपत्तियां और इमारतें भी
समरजीतसिंह के खाते में ही आई
हैं.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
यहां ये बताते चलें कि बीसवीं
सदी के मशहूर पेंटर राजा रवि
वर्मा लंबे समय तक वडोदरा में
रहे थे और दर्जनों की तादाद
में नायाब पेंटिंग्स बनाई और
तत्कालीन महाराजा को सौंपी.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
जहां तक संग्रामसिंह
गायकवाड़ के हिस्से आई
संपत्ति का सवाल है, उसमें
प्रमुख तौर पर वडोदरा के अंदर
आने वाली इमारतें- मकरपुरा
पैलेस, नजरबाग पैलेस, इंदुमति
पैलेस, बग्गीखाना, अशोक बंगलो
और बकुल बंगलो तो है ही,
‘अलौकिक ट्रेडिंग
कॉरपोरेशन’, ‘गायकवाड़
इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन’ और
‘बड़ौदा रेयन’ नामक
कंपनियों की वड़ोदरा और सूरत
सहित देश के कई हिस्सों में
मौजूद परिसंपत्तियां भी
शामिल हैं. इसके अलावा
संग्रामसिंह को मुंबई में
भूलाभाई देसाई रोड पर मौजूद
‘फ्लावरमीड’ नामक इमारत का
एक तिहाई हिस्सा और मरीन
ड्राइव पर मौजूद ‘सैट्यू
मरीन’ नामक इमारत का 1/9 हिस्सा
भी दिया गया है. इसी इमारत के 7/9
हिस्सों को पांच भागों में
बांट कर संग्रामसिंह
गायकवाड़ की चार जीवित बहनों
– मृणालिनीदेवी,
प्रमिलाराजे, सत्वशीलाराजे
और वसुंधराराजे के अलावा
पांचवी बहन स्वर्गीय
ललितादेवी के परिवार वालों
को दिया गया है.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
<b>‘बड़ौदा हाउस’ के बंटवारे
पर भी हुआ समझौता</b>
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
खास बात ये है कि दिल्ली
में उत्तर रेलवे का जो
मुख्यालय ‘बड़ौदा हाउस’ के
तौर पर जाना जाता है या फिर
उसके बगल की करीब छह एकड़
जमीन जो ‘सिरमूर प्लॉट’ के
तौर पर जानी जाती है, उसके
बंटवारे की योजना भी समझौते
में बना ली गई है. इन दोनों
संपत्तियों पर फिलहाल
केंद्र सरकार का कब्जा है,
लेकिन असल में ये महाराजा
सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के
समय में खरीदी गई संपत्तियां
हैं.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
सयाजीराव तृतीय ने जहां 1920
में करीब आठ एकड़ में फैली
‘बड़ौदा हाउस’ वाली संपत्ति
खरीदी थी, वही 1936 में ‘सिरमूर
प्लॉट’ वाली. गायकवाड़
परिवार केंद्र सरकार से लंबे
समय से इस बात की लड़ाई लड़
रहा है कि या तो ये
संपत्तियां उसे लौटा दी जाएं
या फिर इनके बदले में कोई और
संपत्ति दी जाए. जब भी इस मसले
का हल निकलेगा, संबंधित
संपत्ति को समरजीत सिंह और
संग्रामसिंह गायकवाड़ के
बीच बराबर-बराबर बांट लिया
जाएगा.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
<b>इन संपत्तियों का मूल्य
क्या </b>
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
सवाल उठता है कि आखिर इन
संपत्तियों का असली मूल्य आज
की तारीख में है क्या, शायद ही
कोई इसका सही अंदाजा दे सके.
संकेत के लिए इतना बता दें कि
लक्ष्मी विलास पैलेस की तीन
मंजिला इमारत में कुल मिलाकर
169 कमरें हैं, जिसमें से 76 तो
गाउंड फ्लोर पर ही हैं. इस
पैलेस के साथ करीब सात सौ
एकड़ जमीन है, जिसमें एक
भरा-पूरा गोल्फ कोर्स तक बना
हुआ है, जहां वडोदरा के
रसूखदार लोग गोल्फ खेलते हैं.
</p>
<p style=”text-align: justify;”>
शाही परिवार में संपत्ति का
विवाद खत्म होने और कानूनी
तौर पर समाधान हो जाने के बाद
अब वो दिन दूर नहीं, जब बड़ौदा
राजसी परिवार के स्वामित्व
वाली कई इमारतें ‘हेरिटेज’
होटल में तब्दील हो जाएं. साल
भर बाद ‘लक्ष्मी विलास
पैलेस’ में आप शायद चाय की
चुस्की भी लगा पाएं,
‘हेरिटेज’ होटल के नये अवतार
में. तब जाकर देश के आम आदमी को
समझ में आएगा कि आखिर
‘गायकवाड़ी विरासत’ की
भव्यता कैसी है. बस इंतजार
कीजिए.<br />
</p>

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Web Title: दो दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुलझा ‘बड़ौदा रियासत’ के वारिसों के बीच संपत्ति का विवाद
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