नीतीश कुमार की नैतिकता या नौटंकी?

By: | Last Updated: Sunday, 18 May 2014 3:11 PM

नई दिल्ली. नीतीश कुमार को मनाने के लिए करीब ढाई घंटे तक चली बैठक का नतीजा यही निकला कि सोमवार को दोबारा जेडीयू विधायक बैठेंगे. नरेंद्र मोदी की विराट जीत के बाद नैतिकता की दुहाई देते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे चुके नीतीश कुमार ने अब एक दिन का वक्त मांगा है. मोदी की जीत से उत्साहित बीजेपी अब कह रही है कि अगर जेडीयू दोबारा दावा करे तो राज्यपाल को हर विधायक से राय पूछनी चाहिए.

 

इससे पहले बैठक के दौरान नीतीश कुमार ने लंबा भाषण दिया और दोबारा सत्ता संभालने से इनकार कर दिया. पार्टी अध्यक्ष शरद यादव भी कह चुके हैं कि नीतीश दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. हालांकि सुबह से ही शरद यादव को नीतीश समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ा है.

 

नीतीश के विरोधी माने जाने वाले रमई राम का भी बैठक के बाद विरोध हुआ. नीतीश के घर जब बैठक होने वाली थी तब भी नीतीश समर्थक हर विधायक को घेरकर नीतीश जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे.

 

दिन भर चले घटनाक्रम से ये साफ हो गया है कि अगर नीतीश फिर से नेता चुने गए तो पार्टी में उनकी पकड़ मजबूत होगी और विरोधियों के मुंह बंद हो जाएंगे. अगर ऐसा नहीं हुआ और नेता उनकी मर्जी के खिलाफ चुना गया तो पार्टी के लिए आने वाले दिन अच्छे नहीं रहने वाले .

 

अध्यक्ष भले ही शरद यादव हैं लेकिन लोकसभा चुनाव में उनकी एक नहीं चली थी. खुद मधेपुरा से हार भी चुके हैं. और पार्टी पर कोई खास पकड़ भी नहीं है. ऐसे में इनकी कितनी सुनी जाएगी कहा नहीं जा सकता.

 

ये नैतिकता की दुहाई थी या सियासी शतरंज पर खुद को मजबूत करने की चाल. शुक्रवार को लोकसभा के नतीजे आए और शनिवार को नीतीश ने बहुमत वाली सरकार के मुखिया का पद छोड़ दिया. 2005 से नीतीश लगातार बिहार के मुख्यमंत्री थे. लोकसभा चुनाव में पार्टी बीस से सीधे दो सीट पर पहुंच गई तो नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने से पहले ही नीतीश ने इस्तीफा दे दिया.

 

जिस सेक्युलरिज्म की चादर ओढकर नीतीश इस चुनाव की नैया पार करना चाह रहे थे वही दांव उन पर उल्टा पड़ गया. कहां तो नीतीश बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद पीएम पद के दावेदार तक बने हुए थे.

 

लेकिन नतीजों ने नीतीश की राजनीति का रुख ही मोड़ दिया और वह पार्टी के भीतर अपना रास्ता दोबारा तलाश रहे हैं.

बीस साल पहले 1994 में जनता दल छोड़कर नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी का गठन किया था. 1996 में नीतीश ने बीजेपी से समझौता किया और तब से पिछले साल तक बिहार में दोनों का गठबंधन था . लेकिन धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पर जैसे ही बीजेपी ने पिछले साल नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव प्रचार का जिम्मा सौंपा नीतीश ने सत्रह साल पुराना नाता तोड़ लिया .

 

नीतीश तब से लेकर चुनाव नतीजों तक सेक्युलरिज्म की दुहाई देते रहे लेकिन आखिरकार उनको मुंह की खानी पड़ी. जिस गुजरात दंगे को लेकर नीतीश ने नरेंद्र मोदी से दूरी बनाई उन दंगों के वक्त नीतीश केंद्र में मंत्री रह चुके हैं. तब गुजरात जाकर नीतीश ने एक कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी की तारीफ तक की थी . जिसका वीडियो दोनों के अलग होने पर पिछले साल बीजेपी ने जारी किया था.

 

लेकिन जब नीतीश 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने धर्मनिरपेक्ष का कार्ड खेला और 2010 के बिहार चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रचार तक नहीं करने दिया.

 

इससे पहले 2008 में कोसी नदी में आए बाढ़ के बाद नीतीश कुमार ने बाढ़ राहत के लिए गुजरात सरकार का भेजा पैसा लौटा दिया था. 2009 में लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए की महारैली में नीतीश और मोदी गले मिले थे लेकिन उसके बाद यही तस्वीर 2010 चुनाव से ठीक पहले जब पटना में अखबारों में छपे थे तो नीतीश ने मोदी के साथ होने वाले भोज को रद्द कर दिया था. और जब रिश्ते तल्ख हुए तो हमले पर हमले होते चले गए.

 

बिहार के पटना इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर की शुरुआत 1977 में हुई थी. इस साल नीतीश ने जनता पार्टी के टिकट पर पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और 1985 में पहली बार विधायक बने. 1989 में जनता दल के महासचिव चुने गए और फिर दिल्ली की राह पकड़ी. 1989 में ही नीतीश ने पहली बार लोकसभा चुनाव जीता. वीपी सिंह सरकार में नीतीश कृषि राज्य मंत्री बनाए गए. 1994 में समता पार्टी बनी तो नीतीश ने लालू से नाता तोड़ा.

 

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में नीतीश रेल मंत्री बने. नीतीश ही इंटरनेट बुकिंग और तत्काल सेवा जैसी सुविधाएं लेकर आए. आखिरकार 2005 में लालू की पार्टी को हराकर नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने. दोबारा 2010 में भी सत्ता मिली लेकिन नीतीश के मंसूबों ने उनकी मोदी विरोधी छवि को ही देश के सामने रख दिया.

 

जैसे जैसे चुनाव करीब आते गए नीतीश के हमले तल्ख होते गए. जवाब मोदी ने भी दिया लेकिन ताजा हमले से मोदी बचते रहे. कभी लालू के जंगलराज से बिहार को मुक्ति दिलाने वाले नीतीश अब सिर्फ मोदी का विरोध करने में जुटे थे. बिहार में भी विकास की जमीन खिसकी क्योंकि विरोधी भी मानते थे कि नीतीश के राज में बिहार में सड़क, कानून व्यवस्था से लेकर अस्पताल और स्कूलों की हालत बेहतर हुई. कल के सुशासन बाबू मोदी विरोध की लहर में ऐसे खो गये कि आज पार्टी अध्यक्ष उनके समर्थकों को डांटकर भगा रहे हैं.

 

भले ही आज राजनीति तौर पर नीतीश कुमार का बुरा वक्त चल रहा हो लेकिन बिहार में नीतीश के सुशासन को भी भूला नहीं जा सकता. जंगलराज से तरक्की के रास्ते पर लाकर नीतीश ने बिहार को सुर्खियों में ला दिया था और बिहार की जनता उन्हें इसी तौर पर याद रखना चाहेगी न कि उनके राजनीतिक फैसलों के लिए.

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