न झूले न लोकगीत,सावन में पसरा सन्नाटा

By: | Last Updated: Friday, 9 August 2013 4:47 AM
न झूले न लोकगीत,सावन में पसरा सन्नाटा

बांदा:
‘झूला तो पड़ गयो अमवा की डार
मा…’ सावन का महीना आते ही
बुंदेलखंड के हर बगीचे में
झूले पड़ जाया करते थे और
बुंदेली महिलाएं ‘ढोल-मंजीरे’
की थाप में इस तरह के सावन के
गीत सुनाई दिया करते थे.
लेकिन,अब सावन में सन्नाटा
पसरा नजर आता है.एक तो
बाग-बगीचे ही नहीं बचे और जो
थोड़े-बहुत हैं भी वहां
महिलाएं खुद ही जाने से
घबराती हैं.

बुंदेलखंड पुरानी परम्पराओं
व रिवाजों का गढ़ रहा है.सावन
का महीना आते ही बाग-बगीचों
में झूले पड़ जाया करते थे और
महिलाएं ‘ढोल-मंजीरे’ की थाप
के बीच सावन के गीत गातीं
थीं.लोकगीतों की इन्हीं स्वर
लहरियों के बीच ससुराल से
नैहर आईं बेटियां झूलों
में’पींग’भरती थीं.लेकिन अब
ये गुजरे जमाने की बात हो गई
है.

लोग अपने खेत बेचकर हरे-भरे
आम के बागों को खत्म कर रहे
हैं. इससे न तो झूले डालने की
गुंजाइश बची है और न ही
महिलाएं गीत गाती नजर आती
हैं.रही बात राष्ट्रीय पक्षी
मोर की तो अवैध शिकार के चलते
वो भी कभी-कभार ही दिखाई देते
हैं.

बांदा जिले के तेन्दुरा गांव
की बुजुर्ग महिला सुरतिया
कहती हैं कि एक दशक पहले तक इस
गांव के चारो तरफ बस्ती से
लगे हुए आम के कई बगीचे थे,
जहां सावन महीने में झूले लगा
करते थे.

इसी गांव के एक अन्य बुजुर्ग
देउवा माली ने बताया कि पहले
हर किसी के मन में बेटियों के
प्रति सम्मान हुआ करता था.अब
तो राह चलते छेड़छाड़ की
घटनाएं हो रही हैं. आपसी
सामंजस्य और भाईचारा भी नहीं
रह गया. अब तो बेटियों को
दूर-दराज के बगीचों में भेजने
से डर लगता है.

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Web Title: न झूले न लोकगीत,सावन में पसरा सन्नाटा
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