पाठा में आज भी चलती है 'दुस्यु सरकार'

पाठा में आज भी चलती है 'दुस्यु सरकार'

By: | Updated: 27 Apr 2014 05:45 AM

नई दिल्ली: मीलों दूर तक फैला बियावान बीहड़, विशाल वन क्षेत्र और ऊंची-ऊंची पर्वत श्रंखलाएं, जिन्हें देखते ही अपने आप खौफ का एहसास होने लगता है और सिरहन पैदा होती है. उत्तर प्रदेश के बांदा-चित्रकूट और मध्य प्रदेश के सतना व रीवा के इस इलाके को पाठा के नाम से जाना जाता है. पाठा, जिसकी पहचान खाकी की फाइलों में खूंखार दस्यु गिरोहों की आरामगाह के रूप में होती आई है.

 

चुनावी बयार आते ही सरकार और प्रशासन के लाख दावों के बीच दस्युओं की हरकत तेज हो जाती है और उनके फरमान जारी होने लगते हैं. ये सिलसिला वर्षो से चला आ रहा है और अब भी बदस्तूर जारी है.

 

दरअसल, सरकार से इतर अगर पाठा में दस्युओं की हुकूमत पर गौर करें, जहां से वे अपना बेरोकटोक साम्राज्य चलाते हैं और सियासत में भी दखलअंदाजी करते हैं तो मालूम पड़ता है कि खाकी की तमाम कोशिशों के बावजूद दस्यु यहां अजेय बने हुए हैं. दशकों से पाठा के जंगल पुलिस सर्च ऑपरेशन व दस्युओं से मुठभेड़ के गवाह बनते आए हैं और आम आदमी के बीच आज भी पाठा दहशत का दूसरा नाम है. जहां एक डकैत मरता है तो उसकी जगह दूसरे दस्यु रक्तबीज की तरह पैदा हो जाते हैं.

 

वर्ष 1970 के दशक से पाठा के बीहड़ों में कुख्यात डकैतों के पनपने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक जारी है. शिव कुमार पटेल उर्फ ददुआ, अम्बिका पटेल उर्फ ठोकिया, सुरेंद्र पटेल उर्फ रागिया के खात्मे के बाद अब इस कड़ी में एक और खूंखार नाम जुड़ गया है. दस्यु सुदेश पटेल उर्फ बलखड़िया का. ददुआ की मौत के बाद पहले ठोकिया गैंग में शामिल होने और फिर ठोकिया के सफाए के बाद रागिया और रागिया की मौत के बाद खुद गैंग का सरगना बनते हुए बलखड़िया की एक और पहचान आज पुलिस रिकार्ड में आईएस 262 के नाम से भी है.

 

उत्तर प्रदेश सरकार से पांच लाख और मध्य प्रदेश सरकार से एक लाख के इनामी घोषित दस्यु बलखड़िया पाठा में जुर्म की नई इबारतें लिख रहा है. पाठा की आबो-हवा में आज बलखड़िया नाम की दहशत ऐसे घुल चुकी है कि लोग न चाहकर भी उसका सहयोग करने को मजबूर हैं.

 

सूत्रों की मानें तो खाकी से बचने के लिए बलखड़िया और उसका गिरोह स्थानीय लोगों से धमकी के बल पर मदद हासिल करता आया है. इस वजह से खाकी के लिए उसकी तलाश अब तक बेहद मुश्किल साबित हुई है. हालांकि पुलिस रिकार्ड में बलखड़िया की तलाश में चलने वाले ऑपरेशनों की भी कमी नहीं है. हथियारों से लैस जवान पाठा के जंगलों में बलखड़िया की दहशत की भनक लगते ही उसका खात्मा करने के लिए निकल पड़ते हैं, लेकिन बलखड़िया बचकर निकलता रहता है.

 

दरअसल पाठा के बीहड़ों में पांच दशकों से चला आया डकैतों का आतंक कभी खत्म ही नहीं हुआ, बल्कि वक्त गुजरने के साथ-साथ सिर्फ आतंक के चेहरे बदलते रहे हैं. जब तक पाठा में दस्यु बनने की वजह का जबतक खात्मा नहीं किया जाता तब तक कानून को बार-बार ऐसी ही चुनौती मिलती रहेगी.

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