फतवा लोगों पर थोपा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

By: | Last Updated: Wednesday, 26 February 2014 6:39 AM

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय द्वारा संचालित शरियत अदालतों में हस्तक्षेप करने के प्रति अपना संकोच व्यक्त करते हुये आज कहा कि मुस्लिम धर्मगुरूओं द्वारा जारी फतवा लोगों पर थोपा नहीं जा सकता और सरकार को ऐसे व्यक्तियों को संरक्षण देना चाहिए जिन्हें इस तरह के निर्देशों का पालन नहीं करने के कारण परेशान किया जाता है.

 

न्यायमूर्ति सी के प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि फतवा स्वीकार करना या नहीं करना लोगों की इच्छा पर निर्भर करता है. न्यायालय ने कहा कि दारूल कजा और दारूल-इफ्ता जैसी संस्थाओं का संचालन धार्मिक मसला है और अदालतों को सिर्फ उसी स्थिति में हस्तक्षेप करना चाहिए जब उनके फैसले से किसी के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो.

 

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘हम लोगों को उनकी परेशानियों से संरक्षण दे सकते हैं. जब एक पुजारी दशहरे की तारीख देता है तो वह किसी को उसी दिन त्यौहार मनाने के लिये बाध्य नहीं कर सकता. यदि कोई आपको बाध्य करता है तो हम आपको संरक्षण दे सकते हैं.’’ अधिवक्ता विश्व लोचन मदन ने शरियत अदालतों की संवैधानिक वैधानिकता को चुनौती देते हुये जनहित याचिका में कहा था कि ये देश में कथित रूप से समानांतर न्यायिक प्रणाली चला रहे हैं.

 

न्यायालय ने कहा कि धर्मगुरूओं द्वारा फतवा जारी करने या पंडितों द्वारा भविष्यवाणी करने से किसी कानून का उल्लंघन नहीं होता है और इसलिए अदालतों को इसमें हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए.

 

न्यायाधीशों ने सवाल किया, ‘‘कौन सा कानून फतवा जारी करने का अधिकार देता है और कौन का कानून पंडित को जन्मपत्री बनाने का अधिकार देता है? अदालत सिर्फ यही कह सकती है कि यदि किसी को फतवा के कारण परेशान किया जा रहा है तो सरकार लोगों को संरक्षण देगी. न्यायालय ने कहा कि ये राजनीतिक और धार्मिक मुद्दे हैं और हम इसमें पड़ना नहीं चाहते हैं.

 

अखिल भारतीय पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि फतवा लोगों के लिये बाध्यकारी नहीं है और यह सिर्फ मुफ्ती की राय है तथा उसे इसे लागू कराने का कोई अधिकार नहीं है.

 

बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की इच्छा के खिलाफ उस पर फतवा लागू किया जाता है तो वह ऐसी स्थिति में अदालत जा सकता है.

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Web Title: फतवा लोगों पर थोपा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
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