बीमा और पेंशन में एफडीआई के फायदे और अड़चनें

बीमा और पेंशन में एफडीआई के फायदे और अड़चनें

By: | Updated: 04 Oct 2012 09:50 PM


नई दिल्ली: देश की फाइव
स्टार एयरलाइंस कंपनी
किंगफिशर पर मौत का सन्नाटा
पसरा हुआ तो सरकार आर्थिक
सुधार के रास्ते पर फर्राटा
दौड़ रही है.




पेंशन में 49 फीसदी विदेशी
निवेश को कैबिनेट ने मंजूरी
दे दी है. इंश्योरेंस में भी
विदेशी निवेश की सीमा को 26 से
बढ़ाकर 49 फीसदी कर दिया गया
है. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि
आर्थिक सुधार के लिए लिए गए
सरकार के इन फ़ैसलों पर क्या
संसद में मुहर लग पाएगी.




हालांकि, शेयर बाज़ार ने
सरकार के इन सुधार के कदमों
सराहा और इसी का नतीजा रहा है
कि बाज़ार में उछाल दिखा.




शेयर बाजार में आई बहार




पंद्रह महीने बाद सेंसेक्स
पहुंचा 19 हजार के पार, बाजार
में शानदार बढ़त की वजह है
यूपीए सरकार से सुधारों की
उम्मीद. सुधारों को लेकर इन
दिनों फॉर्म में है यूपीए
सरकार. सरकार के सुधारों में
सबसे ऊपर है बीमा क्षेत्र में
विदेशी निवेश की सीमा 26 फीसदी
से 49 फीसदी करना और पेंशन
सेक्टर में विदेशी निवेश
लाना.




लेकिन सवाल उठता है कि इन
सुधारों से क्या होगा? किसको
फायदा पहुँचेगा?




बीमा क्षेत्र में निवेश
बढ़ाने से क्या होगा?





सरकार का मानना है कि बीमा
में विदेशी निवेश की बेहद
सख्त जरूरत है. बीमा पर नजर
रखने वाली संस्था आईआरडीए का
मानना है कि अगले 5 साल में
बीमा कंपनियों को 61 हजार 200
करोड़ रुपये की जरूरत होगी.
ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों
का बीमा हो सके. अभी देश में
हजार लोगों की आबादी पर 5
लोगों का बीमा है. जो विकसित
देशों के मुकाबले काफी कम है.




संसदीय कमेटी से भी आईआरडीए
ने यही कहा था कि बीते 10 साल
में बीमा कंपनियों ने 21 हजार
करोड़ रुपये लगाए लेकिन अब तक
कोई डिविडेंड नहीं मिला और ये
उम्मीद करना बेमानी है कि वो
और पैसे लगाएंगी. 42 में से 13
बीमा कंपनियां बैंकों की है
जो पहले ही दबाव में हैं.




पेंशन में विदेशी निवेश से
क्या होगा?





पेंशन सुधार के लिए सरकार कदम
उठा रही है. पेंशन सुधार का
मतलब होगा निजी कंपनियां और
विदेशी कंपनियां भारत के
बाजार में आ सकेंगी. अभी तक इस
क्षेत्र पर सरकार का
नियंत्रण है, लेकिन बीजेपी
लेफ्ट और ममता बनर्जी की
पार्टी टीएमसी लगातार पेंशन
में विदेशी निवेश का विरोध कर
रही है.




इनका कहना है कि जो लोग पेंशन
फंड में निवेश करे उन्हें तय
रिटर्न का भरोसा दिलाया जाए.




विपक्ष की ये भी मांग है कि
पेंशन फंड में पैसा लगाने
वालों को जब चाहे पैसे
निकालने की आजादी दी जाए,
जबकि जानकारों का मानना है कि
पेंशन फंड में लॉकइन इसलिए
होता है क्योंकि पैसे लगाने
वाला अपने रिटारयरमेंट के
लिए कुछ बचा सके. अगर वो पैसे
निकाल लेगा तो रिटायरमेंट के
लिए कुछ नहीं बचेगा.




सरकार ने विदेशी किराना और
सब्सिडी कम करने के जो फैसले
लिए वो सिर्फ एक आदेश जारी
करने से हो गए. लेकिन अब ऐसा
नहीं होगा. पेंशन और बीमा में
विदेशी निवेश के लिए सरकार को
संसद की मुहर की जरूरत होगी.




बिल पास कराने में अड़चन




जाहिर है कैबिनेट से पास होने
के बाद इन बिलों को शीतकालीन
सत्र में संसद में रखा जाएगा.
तब सरकार के सामने मायावती और
मुलायम सिंह यादव के रूप में
दो अड़चनें होंगी.




इन बिलों को पास कराना है तो
संसद में इन दोनों को साथ
रखना होगा. अब तो बीजेडी ने भी
कह दिया है कि वो इन बिलों का
समर्थन नहीं करेगी.




अगर माया और मुलायम ने इन
बिलों के बहाने साथ छोड़ा तो
सरकार के लिए शर्मनाक स्थिति
पैदा हो जाएगी.




बहुमत का आंकड़ा




फिलहाल यूपीए सरकार को
मायावती और मुलायम का बाहर से
समर्थन मिला हुआ है. यूपीए के
पास फिलहाल अपने 254 सांसद हैं
जबकि समाजवादी पार्टी के 22,
बीएसपी के 21, आरजेडी के चार और
जेडीएस के 3 सांसदों के साथ
सरकार बहुमत के जादुई आंकड़े
271 से काफी ऊपर यानी 304 पर
बिल्कुल सुरक्षित है.




लेकिन मुलायम और माया ने संसद
में बिल का विरोध किया तो ये
आंकड़ा घटकर 261 रह जाएगा. यानी
बिल तो लटकेगा ही सरकार की
इज्जत पर भी बन आएगी.
ऐसे
में सरकार चाहेगी कि बिल को
संसद में रखने से पहले
मायावती और मुलायम को मना कर
रखें.




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