ब्लॉग: मायावती का 'बैलेंस आफ पॉवर' और अल्पसंख्यकों पर नया दांव

By: | Last Updated: Thursday, 16 January 2014 5:45 AM

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में जातिगत राजनीति के दो ध्रुवों में से एक मायावती ने 15 जनवरी को अपने जन्मदिन के साथ ही लोकसभा चुनावों का बिगुल भी फूंक दिया. फिलहाल मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. बीएसपी के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में 80 सीटें जबकि लोकसभा में 21 सीटें हैं. 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद पहली बार है जब मायावती ने इतनी बड़ी रैली को संबोधित किया हो. हालांकि मायावती हर साल अपने जन्मदिन पर लखनऊ के रमाबाई मैदान में रैलियां करती रही हैं.

 

मायावती के जन्मदिन को लेकर हमेशा विवाद रहा है. साल 2007 से लेकर 2012 तक जब वो सत्ता रहीं तो उनके जन्मदिन पर पार्टी के नेता से लेकर कार्यकर्ता तक उन्हें लाखों रुपये उपहार में देते थे. उनको नोटों का हार पहनाया जाता था. लेकिन इस बार हालात बदले हुए थे. ना तो प्रदेश में उनकी सरकार थी और ना ही इस बार उन्हें नोटों का हार पहनाया गया. लेकिन हर बार की तरह रैली में उनके समर्थकों की भारी भीड़ जरूर थी. मायावती की रैलियों में जो सबसे खास बात होती है वो यह कि लाखों लोगों की भीड़ होने के बावजूद रैली अनुशासित होती है.

 

मायावती ने अपने 1 घंटे से ज्यादा के भाषण में मेरे हिसाब से जो सबसे अहम बात कहीं वो थी ‘बैलेंस आफ पॉवर’ की. बसपा सुप्रीमो मायावती ने जनता से कहा कि आप हमारी पार्टी को केंद्र में ‘बैलेंस आफ पॉवर’ बनाइयें. ‘बैलेंस आफ पॉवर’ यानी की सीधे तौर पर मायावती केंद्र में सत्ता के केंद्र पर पहुंचना चाहती हैं. मायावती को पता है कि अगले लोकसभा चुनाव में यूपीए या एनडीए में से किसी को भी पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा. ऐसी परिस्थिति में सत्ता की चाभी छोटे दलों या क्षेत्रिय दलों के पास होगी. यानी की गठबंधन की स्थिति में मायावती कोई बड़ी जिम्मेदारी ले सकती हैं.

 

फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस और बीजेपी के बाद देश की दूसरी बड़ी पार्टी है जिसका सबसे ज्यादा वोट बैंक है. ऐसे में मायावती की कोशिश है कि यूपी में कम से कम 30 सीटें जीतकर वो केंद्र में ‘बैलेंस आफ पॉवर’ की स्थिति में आ जाएं.

 

अगले लोकसभा चुनाव में यदि मायावती 30 सीटों तक जीत लें और 2014 के लोकसभा चुनाव में यदि एनडीए या यूपीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो ऐसे स्थिति में मायावती किंग मेकर की स्थिति में होंगी और यूपीए या एनडीए में से किसी के साथ भी आसानी से गठजोड़ कर सकती हैं. और सत्ता की चाभी अपने पास रख सकती हैं.

 

हालांकि उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीति स्थिति को देखते हुए मायावती का बैलेंस आफ पॉवर का सपना सच होते नहीं दिख रहा है. पिछले एक दशक में यह पहली बार है कि उत्तर प्रदेश की जनता सपा और बसपा को छोड़कर किसी तीसरे विकल्प की तलाश कर रही है.

 

इसकी दो प्रमुख वजह है, पहली ये की वर्तमान सपा सरकार के शासन में प्रदेश में व्याप्त अराजकता और ध्वस्त हो चुकी कानून व्यवस्था से लोगों के मन में सरकार के प्रति काफी रोष है. दूसरा मायावती का आम लोगों से कट कर रहना एक प्रमुख वजह है. 2012 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा की हार का एक प्रमुख वजह मायावती का आम जनता से दूर होना और शासन की बागडोर पूरी तरह नौकरशाहों के हाथ में होना था.

 

प्रदेश में बीजेपी और मोदी की बढ़त को समझते हुए ही मायावती ने पहली बार मोदी पर खुलकर निशाना साधा. मायावती समान्यत: मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी पर ही निशाना साधती रही हैं. मायावती ने मोदी के गुजरात प्रेम का भी जिक्र किया मायावती ने कहा कि मोदी सिर्फ गुजरात की बात करते हैं. मायावती ने कहा कि जो इंसान 6 करोड़ की आबादी वाले गुजरात में दंगे नहीं रोक सकता वो देश की बागडोर क्या संभालेगा. मायावती ने मोदी को रोकने के लिए सीधे अल्पसंख्यकों से अपील की वो अपने वोट को ना बांटे, वा एकजुट होकर मोदी के विरोध में बीएसपी को वोट करें. जिससे एनडीए मोदी को आसानी से प्रधानमंत्री ना बना पाए. यानी की मायावती उत्तर प्रदेश में मोदी की गूंज को साफ तौर पर महसूस कर रही हैं.

 

बीजेपी और मोदी को निशाने पर लेने की एक प्रमुख वजह  यह है कि मायावती की सोशल आसमोसिस थ्योरी जिसके दम पर वो 2007 में सत्ता के शीर्ष तक पहुंची थी उसकी प्रमुख वजह बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक ही थे. जो बीजेपी की निष्क्रियता की वजह से बीएसपी में चले गए थे. लेकिन इस बार मोदी सक्रियता ने बाजी पूरी तरह पलट दी  है. इसलिए मायावती ने इस बार दलितों के साथ अल्पसंख्यकों पर भी निशाना साधा. दंगों को लेकर अल्पसंख्यक सपा और कांग्रेस से नाराज है और बीजेपी से उनकी दूरी जग जाहिर है ऐसे में मायावती को लगता है कि वो अल्पसंख्यकों को पार्टी की तरफ खींचकर हिंदू अपर कास्ट के वोटों की भरपाई कर लेंगी जो मोदी की वजह से फिर बीजेपी की तरफ जाता दिख रहा है.

 

फिलहाल अगर जमीनी हकीकत की बात की जाए तो प्रदेश में मोदी की 6 रैलियों ने जनता को सोचने पर मजूबर जरूर  कर दिया है. CSDS के आकड़ों के अनुसार बीएसपी को 2012 के चुनाव में 19 प्रतिशत ब्राह्म्णों ने, 14 प्रतिशत ठाकुरों ने, 15 प्रतिशत वैश्यों ने वोट किया था जो इस बार मोदी की मौजूदगी और बीजेपी की सक्रियता से वो बीएसपी से खिसकता दिख रहा है. ऐसे स्थिति मे इस नुकसान की भरपाई बीएसपी अल्पसंख्यकों को जोड़कर कितना कर पाएगी यह तो समय ही बताएगा?

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