ब्लॉग: लेफ्ट और ममता के गढ़ में बीजेपी के लिए संभावनाएं

By: | Last Updated: Thursday, 6 February 2014 4:55 AM

नई दिल्ली: एक तरफ देश की लेफ्ट पार्टियां कुछ क्षेत्रिय दलों को साथ लेकर तीसरे मोर्चे की कवायद में लगी थीं तो दूसरी तरफ बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ममता बनर्जी और लेफ्ट के गढ़ पश्चिम बंगाल में लेफ्ट को ललकार रहे थे. मोदी ने कोलकाता की रैली में लेफ्ट और थर्ड फ्रंट की कवायद में लगे नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि इस इस भीड़ को देखों थर्ड फ्रंट के नेताओं… हवा का रूख क्या है? वर्तमान में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की सहयोगी रही तृणमूल कांग्रेस की सरकार है. ममता की तृणमूल कांग्रेस 1999 में गठित एनडीए की सरकार का हिस्सा भी रही हैं.

 

295 सीटों वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा में ममता के तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है. यहां साल 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल को 184, कांग्रेस को 42 तो 32 सालों से ज्यादा समय तक सत्ता में रहे लेफ्ट को मात्र 40 सीटें ही मिलीं. बीजेपी ने हालांकि 289 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसके खाते में एक भी सीट नहीं आई. बीजेपी को सिर्फ 4 प्रतिशत ही वोट मिले. सबसे ज्यादा वोट प्रतिशत तृणमूल को मिले ममता की तृणमूल कांग्रेस को करीब 39 प्रतिशत वोट मिले थे. सीटों के लिहाज के भले ही लेफ्ट कम रही हो लेकिन लेफ्ट को भी 30 प्रतिशत वोट मिले. यानि की पश्चिम बंगाल में जहां ममता की धमक है वहीं लेफ्ट ने भी कोई बड़ा जनाधार नहीं खोया है. पश्चिं बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं जिनमें से 19 अकेले तृणमूल के पास ही हैं.

 

ऐसे में दो मजबूत दलों के सामने पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए क्या संभावनाएं हैं. यह जानना रोचक होगा. जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल के ही थे. एक वक्त बंगाल की दो लोकसभा सीटों पर बीजेपी की कब्जा भी था. लेकिन बेहद ही कमजोर क्षेत्रिय संगठन और संप्रादायिकता के मुद्दे पर वाम दलों का जबर्दस्त हमले ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी को कमजोर कर दिया. अब लोकसभा चुनाव महज 3 महीने की दूरी पर हैं तो एक बार फिर बीजेपी पश्चिम बंगाल में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है.

 

इसी लिहाज से पश्चिम बंगाल में बुधवार हुई बीजेपी की रैली काफी अहम मानी जा सकती है. बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने भी पश्चिम बंगाल का रुख भांपते हुए अपना रूख ममता के प्रति जहां नरम रखा वहीं लेफ्ट पर जमकर निशाना साधा. अपनी हर रैली की तरह मोदी ने बंगाल को सीधे गुजरात की धरती से जोड़ा. मोदी ने कहा कि गुरू रविंद्रनाथ टैगोर के भाई अहमदाबाद में ही रहे.

 

नरेंद्र मोदी ने बंगाल की नब्ज को भांपते हुए स्वामी विवेकानंद का नाम नहीं लेना भूले. आरएसएस और बीजेपी में नरेंद्र मोदी को राष्ट्र नायक के रूप में सामने रखा जाता है. स्वामी विवेकानंद पश्चिम बंगाल से ही थे. काली मठ, बेल्लूर मठ, रामकृष्ण मिशन पश्चिम बंगाल में ही है. बंगाल संस्कृति, आस्था और कला का केंद्र है. मोदी ने कहा कि भारत तब विश्वगुरू था जब बंगाल राष्ट्र गुरू था. मोदी ने कोलकाता की रैली में भावनात्मक तरीके से मुद्दों को छुआ.

 

मोदी ने बंगाल के लोगों की उस दुखती रग पर एक बार फिर हाथ रख दिया था. जिसके कारण एक बार प्रणव मुखर्जी कांग्रेस छोड़ चुके थे. मोदी ने इंदिरा गांधी की हत्या से लेकर साल 2004 के चुनावों तक को सामने रखा, मोदी ने कहा कि साल 2004 में प्रणव दा पार्टी में सबसे वरिष्ठ नेता थे पार्टी ने उनको पीएम क्यों नहीं बनाया. कांग्रेस ने बंगाल के साथ धोखा किया है.

 

बंगाल में मुस्लिम आबादी अच्छी संख्या में है. मोदी इस बात को जानते हैं कि बंगाल में बीजेपी की दुर्दशा में मुसलमान फैक्टर भी अहम है. इसलिए मोदी ने बंगाल के मुसलमानों पर हज यात्रा का शूगूफा छोड़ दिया. मोदी ने गुजरात से तुलना करते  हुए कहा कि गुजरात में बंगाल के मुकाबले हज के लिए अप्लाई करने वाले ज्यादा हैं. यानी की बंगाल के मुकाबले गुजरात के मुसलमान ज्यादा समंपन्न हैं.

 

मोदी ने मुसलमानों को रिझाते हुए कहा कि कांग्रेस और सेक्युलरवाद का नारा बुलंद करने वाले लेफ्ट ने मुसलमानों को भारतीय  माना ही नहीं. इन्होंने मुसलमानों को सिर्फ वोट माना है यही कारण है कि देश में मुसलमानों का विकास नहीं हुआ.

 

मोदी ने बिजली जैसे मुद्दे भी उठाए, लेकिन पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की अपेक्षा बंगाल में बिजली की व्यवस्था काफी अच्छी है.

 

मोदी ने ज्यादातर हमला लेफ्ट और कांग्रेस पर किया, मोदी को पता है कि बंगाल में दबदबा तृणमूल का ही ज्यादा रहेगा. इसलिए भविष्य में ममता के साथ फिर से गठबंधन की जरूरत पड़ सकती है. मोदी ने कहा कि सिर्फ ममता को लाने से काम नहीं चलेगा. यानी की ममता का आना मोदी की नजर में सकारात्मक बदलाव है. यानी मोदी ने कोलकाता रैली में ममता के साथ गठबंधन का रास्ता खुला रखा है.

 

मोदी की इस रैली से एक बात तो साफ है कि लेफ्ट और ममता के गढ़ वाले कोलकाता के युवाओं में मोदी को लेकर आकर्षण तो है. लेकिन यह आकर्षण वोट में कितना बदल पाएगा यह तो वक्त ही बताएगा.

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