ब्लॉग: लोकतंत्र के महापर्व की खूनी शुरुआत

By: | Last Updated: Thursday, 6 March 2014 4:31 AM
ब्लॉग: लोकतंत्र के महापर्व की खूनी शुरुआत

नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनावों के लिए तारीखों का एलान किया तो शाम ढ़लते ढ़लते लोकतंत्र के महापर्व की खूनी राजनीति के साथ शुरुआत भी हो गई. किसी के सिर फूटे तो किसी का हाथ टूटा. और यह सब हुआ दिल्ली में बीजेपी के दफ्तर के सामने. आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और बीजेपी के कार्यकर्ताओं में पहले तो गाली गलौज तक बात गई फिर बात इतनी बढ़ी की जमकर पथराव हुआ और दोनों ही तरफ के लोगों को चोटें आईं. मामला यही नहीं रुका, दिल्ली की चिंगारी को यूपी पहुंचने में देर नहीं लगी. यूपी की राजधानी लखनऊ में भी दोनों ही पार्टिओं के कार्यकर्ता भिड़े और वहां भी जमकर मारपीट हुई. लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये सब हुआ क्यों ?

 

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल यूपी दौरे के बाद गुजरात में नरेंद्र मोदी का विकास मॉडल चेक करने गए थे. वो देखना चाहते थे कि जिस विकसित गुजरात की बात नरेंद्र मोदी करते हैं क्या वो वाकई उतना विकसित हैं. आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल करीब 20 गाड़ियों के काफिले के साथ गुजरात के पाटण में पहुंचे जहां वो रोड शो कर रहे थे लेकिन कुछ समय पहले ही चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों का एलान कर दिया था. यानी की देशभर में आचार संहिता लग चुकी थी. यानी की कानूनी तौर पर अरविंद केजरीवाल का रोड शो और 20 गाड़ियों का काफिला आचार संहिता का उंल्लघन था.

 

न्यूज चैनलों के पास जो वीडियो आए उससे साफ हो गया की पुलिस ने पहले अरविंद केजरीवाल से निवेदन किया की वो रोड शो ना करें और आचार संहिता का उल्लघंन ना करें लेकिन केजरीवाल नहीं माने जिसके बाद पुलिस को उन्हें रोकना पड़ा. इस मामले पर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा रहे हैं की सब कुछ उनके इशारे पर हुआ. जबकि इस मामले पर चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार केजी राव का कहना है कि अगर चुनावों के एलान के बाद कोई रोड शो करता है तो उसको इसकी इजाजत लेनी पड़ती है. अगर ऐसा नहीं होता है तो ये आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है. गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में रोड शो करने के लिए इजाजत नहीं ली थी. यानी की गुजरात पुलिस अपनी जगह पर सही थी.

 

लेकिन आम आदमी पार्टी के नेता गुजरात पुलिस के इस कदम को मोदी के इशारे पर किया गया काम बता रहे हैं. और इसी बात का विरोध करने के लिए आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आशुतोष और शाजिया इल्मी के नेतृत्व में दिल्ली बीजेपी के दफ्तर के सामने पहले तो प्रदर्शन करने गए लेकिन फिर वो बीजेपी के दफ्तर के अंदर घुसने की कोशिश करने लगे जिसके बाद बीजेपी ऑफिस के अंदर से पथराव हुआ जिसके बाद आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी जमकर पथराव किया. पुलिस पहले तो कुछ देर तक मूक दर्शक बनी रही लेकिन  बाद में वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया. लेकिन तबतक दोनों ही तरफ के कुछ कार्यकर्ताओं को चोटें आ चुकी थी.

 

इस दौरान महात्मा गांधी जी के पौत्र राजमोहन गांधी भी मौजूद थे. उन्होंने बस इतना कहा कि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओँ को पथराव नहीं करना चाहिए. लेकिन पत्थर फेंकने के मामले में  बीजेपी ने अपने कार्यकर्ताओं के कदम को सही ठहरा दिया.

 

जिसके बाद लखनऊ में भी आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता बीजेपी दफ्तर के सामने  प्रदर्शन करने गए. वहां भी दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्ताओं में झड़प हुई. कुछ देर बाद यूपी के इलाहाबाद में भी आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी का पूतला फूंकने निकले. जिसके बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं ने उनसे उनकी टोपियां छीन लीं और उनकी टोपियां जला दी.

 

यानी की भारतीय लोकतंत्र के इस महापर्व का आगाज तो नि:संदेह खूनी है.

 

लेकिन अब सवाल उठता है कि आचार संहिता लगने के बाद भी अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में इतना हंगामा क्यों किया? क्या दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं का बीजेपी दफ्तर के अंदर घुसकर विरोध करना जायज है? इस सबसे आखिर केजरीवाल एंड टीम को क्या हासिल होगा?

 

अगर पिछले कुछ दिनों के हालात देखें और चुनावी सर्वे देखें तो देश का मूड थोड़ा बदला है. खास तौर पर देशभर में आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट आई है. आम आदमी पार्टी के गढ़ दिल्ली में भी केजरीवाल की लोकप्रियता में कमी आई है. और धीरे धीरे नेशनल मीडिया में भी केजरीवाल की उपस्थिति कम हुई है. जो की आम आदमी पार्टी के प्रचार अभियान का सेंटर प्वाइंट था. और कहीं ना कहीं अरविंद केजरीवाल और उनके सिपह सलाहकार इस बात को लेकर चिंतित हैं. और इसी दौरान पीएम पद के बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है. यानी की मोदी की विरोध ही एक ऐसी चीज है जो आम आदमी पार्टी को फिर से मीडिया में और लोगों की जुबान पर ला सकता है. और फिलहाल अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के नेता यही कर रहे हैं.

 

लेकिन उन्हें ये भी समझना चाहिए की जनता ने उन्हें कांग्रेस और बीजेपी के विकल्प के रूप में देखा था. लेकिन हर मामले पर उग्र होती जा रही आम आदमी पार्टी की गतिविधियां जनता में ये संदेश पहुंचा रही है कि वो किसी भी मामले में बीजेपी और कांग्रेस से कम नहीं है. अगर आम आदमी पार्टी की ऐसी ही राजनीति आगे भी चलती रही तो वो एक बड़ा वर्ग पार्टी से कट जाएगा जो सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के विकल्प के तौर पर आम आदमी पार्टी से जुड़ा था.

 

 

हालांकि देर रात तक आम आदमी पार्टी ने हिंसक प्रदर्शन पर माफी मांग ली लेकिन बीजेपी पत्थर चलाने के अपने कदम को जायज ही ठहराती रही. कुल मिलाकर जब लोकतंत्र के महापर्व की शुरुआत ऐसी है तो आप समझ सकते हैं कि चुनाव खत्म होते होते ये खूनी राजनीति की शुरुआत क्या रंग लाएगी?

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