'मनमोहन ने परमाणु करार पर दी थी इस्तीफे की धमकी'

By: | Last Updated: Friday, 11 April 2014 2:14 PM

नई दिल्ली: भारत अमेरिका परमाणु करार को लेकर 2008 की गर्मियों के दौरान राजनीतिक संकट के चरम अवस्था में पहुचने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संप्रग गठबंधन के वाम के दबाव के आगे झुक जाने की स्थिति में अपना पद त्यागने की धमकी दी थी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी जगह किसी और व्यक्ति की तलाश कर लेने को कहा था.

 

इस बात का खुलासा संजय बारू की हाल में जारी पुस्तक ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर..द मैकिंग एंड अनमैकिंग आफ मनमोहन सिंह.’’ में किया गया है. बारू संप्रग प्रथम के शुरूआती चार वषरें के दौरान प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार थे. उन्होंने अपनी पुस्तक में मनमोहन एवं सोनिया के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत को चित्रात्मक शैली में पेश किया है.

 

वरिष्ठ पत्रकार और 2008 में प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार पद से इस्तीफा देने वाले बारू लिखते हैं कि मनमोहन को अपनी ही पार्टी के भीतर इस करार को आगे बढ़ाने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था.

 

मनमोहन ने इस मुद्दे पर 17 जून को सोनिया से बात की थी. अगली सुबह कांग्रेस अध्यक्ष एवं वरिष्ठ मंत्री प्रणव मुखर्जी उनसे मिलने प्रधानमंत्री आवास पर गये थे.

 

प्रधानमंत्री ने उस दिन अपनी सारी मुलाकातें रद्द कर दी थी जिससे मीडिया में उनके इस्तीफे की अटकलें लगने लगी थीं. बारू ने इन अटकलों के बारे में प्रधानमंत्री से बात की और उन्होंने इस बारे में मीडिया से कुछ भी नहीं कहने की सलाह दी. ‘‘मैं जानता हूं कि काम हो चुका है.’’ बारू को बाद में प्रधानमंत्री ने बुलाया और कहा कि उन्होंने पिछले दिन सोनिया से बात की थी. प्रधानमंत्री ने कांग्रेस अध्यक्ष को बताया कि अब उनकी काम करने लायक स्थिति नहीं रह गयी है. उन्होंने यह भी बताया कि किन हालात के चलते उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की.

 

बारू के अनुसार उन्हें यह पता चला कि सोनिया ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया से कहा कि वह प्रधानमंत्री को इस्तीफा न देने के लिए मनायें.

 

इसके बाद सरकार को करार पर आगे बढ़ने की अनुमति मिली और वह परमाणु मामले में लगी रोक को हटवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु नियामक आईएईए गयी. वाम के समर्थन वापस लेने के बाद प्रधानमंत्री ने संसद में विश्वास मत हासिल किया.

 

बारू लिखते हैं, ‘‘थोड़ा-थोड़ा करके कुछ सप्ताह की अवधि के भीतर उनकी शक्तियां छीन ली गईं. उन्होंने सोचा कि वह अपनी टीम में जिन लोगों को वह चाहते हैं उन्हें मंत्री के तौर पर शामिल कर सकते हैं. सोनिया ने उनसे सलाह-मशविरा किए बिना प्रणब मुखर्जी को वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी की पेशकश करके इस उम्मीद को शुरूआत में ही समाप्त कर दिया.’’

 

पुस्तक के अनुसार सिंह अपने प्रधान आर्थिक सलाहकार सी रंगराजन को वित्त मंत्री नियुक्त करने पर विचार कर रहे थे. सिंह ने ‘‘अपने साथी रंगराजन के साथ 1991-92 के दौरान भुगतान संतुलन के संकट से मुकाबला किया था.’’ बारू के अनुसार प्रधानमंत्री ने 2 जी घोटाले के सार्वजनिक होने से पहले ही द्रमुक के ए राजा को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने का प्रयास किया था ‘‘लेकिन 24 घंटे तक अपनी तरफ से जोर लगाने के बाद वह अपनी पार्टी और द्रमुक दोनों के दबाव के आगे झुक गए.’’

 

बारू कहते हैं कि राजा को शामिल करने का विरोध करने के अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने टी आर बालू को भी मंत्रिमंडल में ‘उनकी खराब प्रतिष्ठा’ के कारण शामिल किए जाने का विरोध किया था. वह बालू के मामले में सफल हुए लेकिन राजा के मामले में उन्हें झुकना पड़ा.

 

बारू के अनुसार सोनिया का सत्ता का ‘त्याग’ करना कुछ अच्छा करने या अंतर्रात्मा की आवाज की तुलना में राजनैतिक युक्ति अधिक था, उन्होंने कांग्रेस पार्टी को चुनावी सफलता दिलाने के बावजूद 2004 में प्रधानमंत्री का पद नहीं स्वीकार करके पेश करने की कोशिश की थी.

 

एक सेवानिवृत्त तमिल अधिकारी को प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव नियुक्त करने की असफल कोशिश और अपने विश्वासपात्र सहायक पुलॅक चटर्जी को पीएमओ में रखने का हवाला देते हुए बारू ने लिखा है, ‘‘सत्ता सौंप दी गई लेकिन प्राधिकार नहीं सौंपा गया.’’ सेवानिवृत्त अधिकारी ने राजीव गांधी के साथ काम किया था लेकिन उन्होंने सोनिया की पेशकश को ठुकरा दिया था.

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