मोदी का ओडीशा दौरा बीजेपी इकाई में जान फूंक पाएगा?

By: | Last Updated: Sunday, 14 July 2013 11:10 PM

अहमदाबाद/भुवनेश्वर: बीजेपी
की चुनाव प्रचार समिति का
अध्यक्ष बनने के बाद गुजरात
के मुख्यमंत्री नरेंद्र
मोदी आज पहली बार ओडीशा के एक
दिन के दौरे पर हैं.

नरेंद्र मोदी भुवनेश्वर
एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद
वहां से सीधे पुरी के लिए
प्रस्थान करेंगे. सुबह
ग्यारह बजे उनके गुंडीचा
मंदिर पहुंचने का कार्यक्रम
है, जहां फिलहाल भगवान
जगन्नाथ विराजमान हैं.

मंगलवार को संक्राति है, ऐसे
में भगवान जगन्नाथ के दर्शन
का पुण्य बढ़ जाता है. जाहिर
है, मोदी ये जरूर चाहेंगे कि
भगवान जगन्नाथ की भरपूर कृपा
उनपर बनी रहे. खास तौर पर तब
जबकि 2014 लोकसभा चुनावों के
मद्देनज़र बीजेपी के चुनाव
प्रचार की बागडोर उनके पास है
और पार्टी के प्रधानमंत्री
पद के उम्मीदवार के तौर पर भी
उनका नाम कभी भी सामने आ सकता
है. ऐसे में पार्टी और खुद की
नैय्या पार लगाने के लिए
भगवान के आशीर्वाद की काफी
जरुरत होगी मोदी को.

भगवान जगन्नाथ के दर्शन के
अलावा मोदी श्रीमंदिर जाकर
माता लक्ष्मी और बिमला मां के
दर्शन भी करने वाले हैं.
साढ़े बारह बजे के करीब
नरेंद्र मोदी पुरी के गजपति
राजा दिव्य सिंह देब से उनके
महल में जाकर मिलने वाले हैं.
गजपति राजा ही परंपरागत तौर
पर पुरी के मशहूर रथयात्रा की
भी शुरुआत कराते हैं, जो इस
बार 10 जुलाई को शुरु हुई.
संयोग ये भी है कि नरेंद्र
मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री
के तौर पर रिकॉर्ड बारहवीं
बार अहमदाबाद में जगन्नाथ
रथयात्रा की शुरुआत दस जुलाई
को ही करा चुके हैं.

पुरी में मोदी का तीसरा
कार्यक्रम शंकराचार्य
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती
से मुलाकात का भी है. इसके लिए
मोदी दोपहर बाद सवा एक बजे के
करीब गोवर्धन पीठ जाएंगे और
वहां शंकराचार्य का
आशीर्वाद हासिल करेंगे.

देश के चार प्रमुख धामों में
से एक पुरी में इन तीन
धार्मिक कार्यक्रमों के बाद
मोदी वापस भुवनेश्वर लौट
जाएंगे, जहां चार बजे के करीब
बीजेपी की ओडीशा इकाई के
प्रमुख नेताओं और
कार्यकर्ताओं से उनकी
मुलाकात का कार्यक्रम है.

माना ये जा रहा है कि बीजेपी
की चुनाव प्रचार समिति के
अध्यक्ष के नाते मोदी पार्टी
की राज्य इकाई में जान फूंकने
की कोशिश करेंगे, जिसका मनोबल
2009 के लोकसभा और विधानसभा
चुनावों के बाद से ही बुरी
तरह टूटा हुआ है.

दरअसल 2009 में ओडीशा में
लोकसभा और विधानसभा के चुनाव
एक साथ हुए थे और उस दौरान
बीजेपी का प्रदर्शन काफी
खराब रहा. उस वक्त ऐन चुनावों
से पहले बीजेपी का बीजू जनता
दल यानी बीजेडी से दशक भर
पुराना गठबंधन टूट गया.
बीजेडी के अध्यक्ष और ओडीशा
के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक
ने 2008 में हुए ईसाई विरोधी
हिंसा के मुद्दे पर बीजेपी से
अपना संबंध तोड़ लिया और ऐसे
में बीजेपी को ये चुनाव बिना
किसी गठबंधन के लड़ना पड़ा.
परिणाम ये निकला कि जहां
बीजेपी 2004 के विधानसभा
चुनावों में 32 सीटें जीतने
में कामयाब रही थी, वही 2009 में
उसकी सीटों का आंकड़ा गिरकर
छह पर पहुंच गया.

उसके उलट बीजेडी का ग्राफ
काफी ऊपर गया. पार्टी 2004 के 61
सीटों से आगे बढ़कर 2009 में 103
सीटें जीतने में कामयाब रही.

अगर लोकसभा चुनावों के
परिणाम की बात करें, तो
बीजेपी का खाता तक नहीं खुला.
ओडीशा में लोकसभा की 21 सीटों
में से बीजेडी के खाते में 14
सीटें गई, तो कांग्रेस के
खाते में छह सीटें और एक सीट
सीपीआई ने जीती.

मोदी का ओडिशा में आखिरी दौरा
भी 2009 में ही हुआ था, जब वो
चुनाव प्रचार के लिए दो बार
वहां गए थे. ऐसे में मोदी जब
करीब चार वर्षों से अधिक के
अंतराल के बाद ओडीशा जा रहे
हैं, तो आधिकारिक तौर पर उनके
दौरे को गैर-राजनीतिक कहा जा
रहा है.

पार्टी की ओडीशा इकाई के
अध्यक्ष केवी सिंह देव की तरफ
से कहा ये जा रहा कि मोदी
भगवान जगन्नाथ के भक्त हैं और
वो सिर्फ भगवान का आशीर्वाद
हासिल करने आ रहे हैं. लेकिन
ये तो हुई औपचारिक बात,
मुद्दा ये है कि क्या मोदी का
ये दौरा बीजेपी की ओडीशा इकाई
में जान फूंक पाएगा, वो भी तब
जबकि 2009 में काफी खराब चुनावी
प्रदर्शन के सदमे से पार्टी
की राज्य इकाई बाहर नहीं निकल
नहीं पाई है.

जाहिर है, मोदी के सामने
चुनौती यही है. अगर 2014 में
पार्टी और खुद मोदी को दिल्ली
की गद्दी की तरफ तरफ बढ़ना है,
तो संगठन और कार्यकर्ताओं
में जान फूंकनी पड़ेगी, खास
तौर पर ओडीशा जैसे राज्यों
में, जहां मौजूदा हाल बुरा है.

मोदी की कोशिश इस एक दिन के
दौरे में पार्टी की राज्य
इकाई के नेताओं के जरिए राज्य
के जमीनी हालात को सबसे पहले
समझने की होगी. यही वजह है कि
वो यहां किसी सार्वजनिक सभा
की जगह पार्टी की राज्य इकाई
के नेताओं और कार्यकर्ताओं
से मिलने का रास्ता अख्तियार
कर रहे हैं इस दफा.

मोदी चूंकि गुजरात के
मुख्यमंत्री के अलावा अब
पार्टी की चुनाव प्रचार
समिति के अध्यक्ष की भूमिका
में भी हैं, ऐसे में उनके इस
दौरे को 2014 लोकसभा चुनावों के
प्रचार अभियान की राज्य में
सांकेतिक ही सही, लेकिन
शुरुआत के तौर पर भी सियासी
हलकों में देखा जा रहा है.
जाहिर है, ओडीशा जैसे राज्य
में पार्टी नेताओं और
कार्यकर्ताओं को 2014 चुनावों
के मद्देनज़र उत्साहित करने
की चुनौती काफी बड़ी है और
मोदी को इसका अंदाजा भी है,
इसलिए इरादा पहले हालात को
समझने का है.

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