मोदी को रोकने के लिए राजनाथ की 'रणनीति' ?

By: | Last Updated: Wednesday, 16 April 2014 11:36 AM

सियासत में अक्सर दिलचस्प वाकये नज़र आते हैं. शख्स का तहजीब बदलता है तो उसकी शख्सियत बदल जाया करती है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और प्रतिष्ठित शिया मौलाना कल्बे जव्वाद की मुलाकात के बाद अचानक राहत इंदौरी की यह पंक्ति बरबस याद आ रही है. वह रोजा भले ही नहीं रखता, इफ्तारी समझता है.

 

जो लोग खुद को भारतीय राजनीति के पुरोधा, दर्शनशास्त्री समझते हैं उनको एक बार राजनाथ सिंह के इतिहास पर भी नजर डाल लेनी चाहिए. किसी भी दिशा और हवा से पद हथियाने के जादूगर हैं . यूपी में मुख्यमंत्री बनने से लेकर वर्तमान में अध्यक्ष पद तक इस जादू का नजारा तो आप भी देख चुके हैं. जितना मिले उसका अधिकतम हिस्सा हड़पने का प्रबंधन इनका हुनर है.

 

सियासत के नक्‍शे में तहरीर और तेवर का बदलना कोई बड़ी बात नहीं. सारे समीकरण के बावजूद अवाम से वजनदारी में राब्ता कायम न कर पाने की कमी को वह अब दूसरे तौर तरीकों से भरपाई करना चाहते हैं. चलिए आपको कुछ ताजा घटनाक्रम के जरिए हम राजनाथ की सियासत के समीकरण को बता रहे हैं. लखनऊ सीट को चुनकर और फिर अटल बिहारी वाजपेई के खास शिवकुमार द्वारा राजनाथ वाजपेई के बाद कौन, इसकी दावेदार की अपनी छवि गढ़वा रहे हैं. शिवकुमार ने कुछ दिनों पहले अटल बिहारी वीजपेई के अंग वस्त्र को मीडिया के जरिए राजनाथ तक पहुंचाया और इनको वाजपेई का आशीर्वाद भी है. यह मीडिया में खूब प्रचारित कराया गया. इसमें राजनाथ सफल हो गये. इसे उस वक्त केवल यह समझा गया कि यह लखनऊ सीट पर अपनी जीत का परचम लहराने की लालसा है.

 

यह राजनाथ सिंह का इतिहास है कि जब वह सत्ता के लिए सियासत में समीकरण बैठाते हैं तो सिद्धांतों को दरकिनार कर देते हैं. वैसे भी सियासत में जो दिखता है वह होता नहीं. और जो होता है वह दिखता नहीं है. खैर..जरा आजकल के बदलते मौसम पर ध्यान दें तो आज प्रतिष्ठित शिया उलमा मौलाना कल्बे जव्वाद का कहना है कि बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को लेकर मुसलमानों में कुछ खौफ है, लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की छवि वैसी ही बन रही है जैसी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की थी.

 

मौलाना जव्वाद ने कहा, ‘इस मुलाकात को हम राजनीतिक नहीं मानेंगे. हमसे उनकी इससे पहले भी मुलाकातें होती रही हैं. इससे पहले जब वह प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे तो वह हमसे मिलते रहे. ईद की नमाज रही तो मुबारकबाद देने आते रहे. इस तरह से देखें तो हमारे पहले से ही संबंध रहे हैं यह मुलाकात सियासी नहीं है व्यक्तिगत है.’

 

अब जरा दोनों को जोड़िए पहला अटल के खास शिवकुमार द्वारा अंगवस्त्र देना और अटल का दावेदार बताना फिर अब कल्बे द्वारा अटल की छवि देखना. इसको जरा लखनऊ सीट की उम्मीदवारी से भी जोड़े रखिएगा. अब तस्वीर कुछ साफ नजर आपको भी आ रही होगी कि बीजेपी के कुछ नेता क्यों नहीं चाहते हैं कि बीजेपी 160 से अधिक बढ़े.

 

दिल्ली से कोसों दूर जब लखनऊ में मौलाना ने अपना मुंह खोला, तो उसकी आवाज भारतीय राजनीति के गलियारों तक अपनी गूंज का असर छोड़ गई. जब सभी जगह यह चर्चा होने लगी की बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनेगी लेकिन बहुमत से दूर रह सकती है. तो राजनाथ सिंह ने पहले पत्ते दिल्‍ली की बजाय लखनऊ से अपनी उम्मीदवारी में खोले. फिर अटल की सीट से दावेदारी के साथ ही उनकी छवि पर अब दावेदारी करते हुए शायद राजनाथ सिंह ने अपने लिए विकल्‍प खुला रखा है. दिल्ली की सियासत में दोनों बड़ी पार्टियों में सियासी समझौते की कई बानगी देश के इतिहास में मौजूद हैं. फिलहाल अटल की सीट से दावेदारी के साथ ही अब वाजपेई की छवि पर राजनाथ की दावेदारी मजबूत दिख रही है. 

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Web Title: मोदी को रोकने के लिए राजनाथ की ‘रणनीति’ ?
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