मोदी को 272 सीटें मिलेंगी क्या?

By: | Last Updated: Saturday, 10 May 2014 5:20 PM
मोदी को 272 सीटें मिलेंगी क्या?

नई दिल्ली. बड़ी-बडी बातों और मुद्दों को बेहद आसान शब्दों में जनता तक पहुंचाने की नरेंद्र मोदी की महारत ही उन्हें दूसरे नेताओं से आगे ले जाती है. तमतमाए चेहरे के साथ जब नरेंद्र मोदी मंच पर प्रकट होते हैं तो टीवी के कैमरे उनके चेहरे के भावों को लोगों के और नजदीक पहुंचा देते हैं.

 

चहरे पर तेजी से बदलते भाव और उनकी भाषा का ठेठ देसी अंदाज सुनने वालों के जहन पर सीधी चोट करता है लेकिन मोदी की ये चोट क्या वोट में तब्दील होगी. ये वह सवाल है जिसके जवाब का पूरे देश को बेसब्री से इंतजार है और खुद नरेंद्र मोदी का दिल भी तीन सौ कमल के लिए बेकरार है.

 

नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हैं और इस पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार  माने जा रहे हैं लेकिन क्या मोदी की ये लहर उन्हें सत्ता का सबसे बड़ा ताज दिला सकेगी. क्या मोदी बीजेपी को 272 सीटें के पार ले जा सकेंगे. या फिर गठबंधन के चक्रव्यूह में फंसेगा नरेंद्र मोदी विजयी रथ. 

 

प्रधानमंत्री पद के बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी मिशन 2014 के अपने सफर के आखिरी पड़ाव तक पहुंच चुके है. 16 तारीख को चुनाव नतीजें भी आ जाएगें लेकिन उससे पहले 64 सीटों पर मतदान अभी बाकी है खुद नरेंद्र मोदी भी वाराणासी से चुनाव मैदान में हैं. वाया वाराणसी ही वो दिल्ली कूच की तैयारी में भी है लेकिन उनके सामने अभी चुनौती बन कर खडा है 272 प्लस.  

 

 

नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी रैलियों में लोगों से 300 कमल मांग रहे हैं यानी बीजेपी के लिए 300 सीटों का बहुमत. जबकि बीजेपी करीब 400 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है ऊपर से एनडीए के पूर्व घटक दल भी बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे है. इसीलिए ये सवाल अभी बड़ा है कि क्या 2014 का लोकसभा चुनाव जीत कर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन सकेंगे. वैसे भी मिशन 272 प्लस के सफर में नरेंद्र मोदी की राह में और भी रुकावटें अभी बाकी है.

 

 फिलहाल तमाम सर्वो में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे है. लेकिन बीजेपी को बहुमत ना मिलने की सूरत में गैर बीजेपी, गैर कांग्रेसी दलों का रुख नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबतें खड़ी कर सकता है. दक्षिण भारत में मोदी जहां जयललिता के खिलाफ चुनाव लड़ रहे है वही उडीसा में नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ उनकी जुबानी जंग जारी है. खास बात ये है कि ये वो क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो कभी एनडीए की घटक रही हैं लेकिन मौजूदा चुनाव में नरेंद्र मोदी के विरोध में खडी नजर आ रही है. 

 

लोकसभा चुनाव की शुरुवात में नरेंद्र मोदी कांग्रेस को निशाने पर ले रहे थे लेकिन अब उनके राजनीतिक हमलों की जद में तीसरे मोर्चे के दावेदार और क्षेत्रीय पार्टियां भी आ गई है. यही वजह है कि क्षेत्रीय दलों का मुकाबला कांग्रेस की बजाए अब सीधे बीजेपी के साथ होता नजर आने लगा है. ऐसे में मोदी का विजय रथ कहां जाकर जाकर रुकेगा ये एक बड़ा सवाल है.

 

 

बहुमत की 272 सीटों के लिए बीजेपी और खुद मोदी ने इस पुरानी कहावत पर भरोसा किया कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है और इसीलिए बीजेपी ने इस रास्ते की शुरुवात वाराणसी से नरेंद्र मोदी को चुनाव मैदान में उतार कर की थी लेकिन चुनावी संग्राम में वाराणसी ही 272 प्लस के मिशन मोदी के लिए नई कसौटी बन गया है. 

 

क्या वाराणसी मोदी के लिए सत्ता की पहली सीढी बनेगा. इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले एक नजर वाराणसी की भौगोलिक स्थिती पर डाल लेते हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाके का केंद्र है वाराणसी. यहां से बिहार राज्य की सीमा बमुश्किल 40 से 50 किलोमीटर दूर रह जाती है. मतलब वाराणसी से मोदी की उम्मीदवारी का साइड इफेक्ट पूर्वांचल के साथ-साथ बिहार पर भी पड़ने की उम्मीद लगाए बैठी है बीजेपी.

 

 

यूपी के पूर्वांचल में ही सबसे ज्यादा 32 लोकसभा की सीटें हैं. लेकिन पूर्वांचल के इस पूरे इलाके में पिछले चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा है.

 

दरअसल बीजेपी को उम्मीद है कि मोदी के वाराणसी से लड़ने पर वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है जिसका बीजेपी को पूर्वांचल की 32 और बिहार की यूपी से सटी सीटों पर असर पड़ने की उम्मीद है वोटों के संभावित ध्रुवीकरण को देखते हुए ही मुलायम सिंह यादव भी आजमगढ़ सीट से चुनाव मैदान में कूदे  हैं.

 

उत्तर प्रदेश में जाति की राजनीति ही चुनावी समीकरण तय करते रहे हैं इसीलिए विकास के नारे से शुरु हुआ मोदी का प्रचार पूर्वी उत्तर प्रदेश में आते-आते जातिवादी राजनीतिक के रंग में रंग गया. दरअसल मोदी की पिछड़ी जाति को पहचान बना कर बीजेपी जिस पिछडे वोट बैंक को साधना चाहती है वो भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस इलाके में खासी तादाद में मौजूद है. अगर पूरे उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां पिछड़ों की राजनीति करने वाले मुलायम सिंह औऱ मायावती जैसे धुरंधर पहले से मौजूद है जिनसे जाति के मुद्दे पर पार पाना आसान नहीं है.

 

 उत्तर प्रदेश में पिछले दो लोकसभा चुनाव के आकंडो पर अगर नजर डाले तो 2004 और 2009 के चुनाव में बीजेपी की गाडी महज दस सीटों पर ही अटक गई थी. इसीलिए इस बार मोदी ने सबसे अधिक दांव उत्तर प्रदेश पर ही लगाया है. उन्होने चुनाव से काफी पहले अपने करीबी अमित शाह को यूपी में तैनात भी किया. अमित शाह ने राज्य में मोदी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए नए सिरे से राजनीतिक बिसात भी बिछाई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुआ सांप्रदायकि दंगा भी चुनाव में एक अहम मुद्दा बना जिसके आधार पर जहां समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोटों का तो वहीं बीजेपी जाट वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में देख रही है. जानकार मानते है कि उत्तर प्रदेश के शहरी इलाकों में मोदी के मीडिया कैंपेन का असर तो हुआ है लेकिन ग्रामीण इलाकों में मोदी की राह आसान नहीं है.  

 

उत्तर प्रदेश के बाद नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बडी चुनौती बिहार में है क्योंकि यहां भी बीजेपी को तिकोने मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है. एक तरफ बीजेपी के पूर्व सहयोगी नीतीश कुमार उसके खिलाफ मैदान में है तो वही दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव भी मोदी के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं.

 

40 सीटों वाले बिहार में बीजेपी ने 2004 में 5 सीटें जीती थी. 2009 के चुनाव में एनडीए गठबंधन को 31 सीटें मिली थी जिसमें से 12 बीजेपी ने जीती थी. लेकिन 2002 में गुजरात दंगों के वक्त एनडीए सरकार में मंत्री रहे नीतीश कुमार ने 2014 के चुनाव से पहले बीजेपी का साथ छोड़ दिया और ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की ताकि धर्मनिरपेक्ष ताकतें नरेंद्र मोदी से दूर ही रहे मगर गुजरात दंगो के बाद एनडीए की सरकार से इस्तीफा देने वाले लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान एनडीए में वापस लौट चुके है जिसका फायदा भी बीजेपी को मिलेगा.

 

नरेंद्र मोदी को तीसरी बड़ी चुनौती पश्चिम बंगाल से मिलती नजर आ रही है. कभी एनडीए की सहयोगी रही ममता बैनर्जी बंगाल में मोदी के खिलाफ तलवार भांज रही हैं और नरेंद्र मोदी ममता के खिलाफ रैलियों में गरज रहे हैं. बंगाल में अब तक राजनीति तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट के बीच ही घूमती रही है  लेकिन अपने भाषणों के जरिए मोदी ने इस चुनाव को बीजेपी वर्सेज तृणमूल करने की पूरी कोशिश की है. 

 

पश्चिम बंगाल में बीजेपी एक ताकत के तौर पर उभर कर सामने नहीं आ सकी है. 2004 के चुनाव में जहां उसका खाता भी नहीं खुल सका था वही 2009 में उसे सिर्फ एक सीट मिली थी. जबकि बंगाल में 42 लोकसभा की सीटें है.

 

नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात में बीजेपी बेहद मजबूत है. 26 सीटों वाले गुजरात में मोदी की कोशिश रही है कि बीजेपी को क्लीन स्वीप दिला सकें. हांलाकि पिछले चुनाव में उन्हें कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिली थी और वो आधी सीटें ही जीत सके थे.

 

गुजरात की तरह ही महाराष्ट्र पर भी बीजेपी की नजर गढ़ी है यहां शिवसेना के साथ बीजेपी का गठबंधन है जिसकी सीधी टक्कर एनसीपी- कांग्रेस गठबंधन के साथ है. महाराष्ट्र की 48 सीटों में से बीजेपी ने 2004 में 13 और 2009 के चुनाव में 9 सीटें जीती थी इस बार बीजेपी शिवेसेना को यहां आधे से ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद है.

 

हिंदी बेल्ट के बाकी राज्यों में भी बीजेपी की हालत ज्यादा मजबूत है. राजस्थान  मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में बीजेपी की सरकार है. खास बात ये है कि इन तीनों राज्यों में बीजेपी की सीधी टक्कर कांग्रेस से हैं. इन राज्यों में बीजेपी के आगे क्षेत्रीय दलों की चुनौती भी नहीं है. ऐसे में बीजेपी को इन राज्यों से सबसे ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद है.

 

राजस्थान में कुल 25 लोकसभा सीटें है. 2004 के चुनाव में बीजेपी ने यहां 20 और 2009 के पिछले चुनाव में सिर्फ चार सीटें ही जीती थी.

 

बीजेपी का दूसरा गढ मध्य प्रदेश है जहां कुल 29 सीटें है 2004 में बीजेपी ने यहां शानदार प्रदर्शन करते हुए 25 सीटें जीती थी लेकिन 2009 के चुनाव में उसका ग्राफ 16 पर आकर ठहर गया था. लेकिन मध्यप्रदेश से सटे छत्तीसगढ़ में 2004 और 2009 के पिछले दोनों चुनाव में बीजेपी ने ग्यारह में से 10 सीटें जीती थी.

 

राजनीति नजरिए से एक और अहम राज्य है उडीसा. 21 सीटों वाले उड़ीसा में बीजेपी पिछले चुनाव में खाता तक नहीं खोल पाई थी. हांलाकि बीजेपी का संगठन यहां मजबूत रहा है. उडीसा में 2004 के चुनाव में बीजेपी ने 21 में से 7 सीटें जीती थी इसीलिए इस बार उसे यहां बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद भी है.

 

बीजेपी की पकड़ हिंदी भाषी राज्यों में मानी जाती रही है. लेकिन अगर दक्षिण के राज्यों पर नजर डाले तो बीजेपी का सबसे मजबूत गढ कर्नाटक रहा है.

 

कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें है. 2004 के चुनाव में बीजेपी ने यहां 18 और 2009 के चुनाव में 19 सीटें जीती थी. लेकिन कर्नाटक को अगर छोड दिया जाए तो दक्षिण में बीजेपी की हालत खराब रही है. तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश में तो पिछले दो चुनाव में उसका खाता भी नहीं खुल सका है. इन तीनो राज्यो में 101 लोकसभा सीटें है.

 

जाहिर है बीजेपी इन राज्यों में सहयोगियों के भरोसे ही बैठी है. खास बात ये है कि आंध्र मे तो टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू एनडीए में शामिल हो चुके है लेकिन तमिलनाडु में बीजेपी को एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता का साथ भी अभी तक नहीं मिल सका है.

 

नरेंद्र  मोदी के मिशन 272 प्लस की राह में रुकावटे अभी और भी आ सकती हैं. 16 मई को अगर एनडीए 250 सीटें भी जीत लाता है तो उसे बहुमत के लिए करीब पच्चीस सीटों की जरुरत होगी औऱ ये कमी एक बडे सहयोगी के जरिए पूरी की जा सकती है. अगर एनडीए की सीटें 220 के आस पास जाकर ठहर जाती है तो ऐसी सूरत में उसे करीब 50 सीटों की दरकार होगी. और ऐसे हालात में नरेंद्र मोदी को दो बडे सहयोगियों की जरुरत पड़ सकती है.

 

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