मोदी ने अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया

मोदी ने अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया

By: | Updated: 30 May 2014 12:34 PM
नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया है. डोभाल आईबी के पूर्व निदेशक हैं. अरसे से उनके नाम की चर्चा चल रही थी.

 

नई सत्ता में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी एनएसए और आंतरिक सुरक्षा सलाहकार जैसी अहम जिम्मेदारी किसे दी जाए. इस बात को लेकर अरसे से जिस नाम का सबसे ज्यादा जिक्र हो रहा था वह हैं पूर्व आईबी चीफ अजीत डोभाल का.

 

दिखने में बेहद सीधे सादे अजीत डोभाल जितने सामान्य नजर आते हैं उनका करियर उतनी ही करिश्माई कामयाबियों से भरा है. अजीत डोभाल 1968 में केरल कैडर से आईपीएस में चुने गए थे. और नौ साल पहल यानी साल 2005 में इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी के मुखिया के पद से रिटायर हुए हैं. उन्हें 37 साल का तजुर्बा तो है ही वाजपेयी सरकार में मल्टी एजेंसी सेंटर और ज्वाइंट इंटेलिजेंस टास्क फोर्स के चीफ के तौर पर बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार के साथ काम भी कर चुके हैं.

 

अजीत की दूसरी खूबी है उनकी ये विचारधारा

 

डोभाल का झुकाव हिंदुत्ववादी विचारधारा की ओर भी माना जाता है. अजीत डोभाल विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के मौजूदा अध्यक्ष हैं. नरेंद्र मोदी भी लगातार विवेकानंद को भारत के युवाओं के सामने नए रोल मॉडल की तरह पेश करते रहे हैं. बीजेपी ने साल 2010 में राष्ट्रीय सुरक्षा पर हरिद्वार में जो पहला अधिवेशन बुलाया था उसमें भी अजीत डोभाल को खास तौर से बुलाया था. यानी करीबी पुरानी है.

 

लेकिन करीबी से कहीं ज्यादा अहम है अजीत की काबिलियत. अजीत डोभाल की पहचान सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज पर उनकी पैनी नजर की वजह से बनी है. ऐसी ही साफ समझ की बदौलत अजीत डोभाल ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को संकट से उबारा था.

 

24 दिसंबर 1999 को एयर इंडिया की फ्लाइट आईसी 814 को आतंकवादियों ने हाईजैक कर लिया और उसे कांधार ले जाया गया. भारत सरकार एक बड़े संकट में फंस गई थी. ऐसे में संकटमोचक बनकर उभरे थे अजीत डोभाल. अजीत उस वक्त वाजपेयी सरकार में एमएसी के मुखिया थे. आतंकवादियों और सरकार के बीच बातचीत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई और 176 यात्रियों की सकुशल वापसी का सेहरा डोभाल के सिर बंध गया था.

 

अजीत डोभाल ने सीमापार पलने वाले आतंकवाद को करीब से देखा है और आज भी आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख बेहद सख्त माना जाता है.

 

अजीत डोभाल उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते. उन्हें आज भी लगता है मजबूत इरादे एक दिन दाऊद को सलाखों के पीछे जरूर ला खड़ा करेंगे.

 

डोभाल की खासियत ये भी है कि वो अपने विरोधियों पर मनोवैज्ञानिक असर डालने में महारत रखते हैं. उत्तरपूर्व में मिजो नेशनल आर्मी के मुखिया लाल डेंगा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बतौर आईबी चीफ डोभाल ने उनके 6 में 5 कमांडरों को उनके खिलाफ भड़का दिया था और यहां तक कि लाल डेंगा को अपने चीफ कमांडर को ये कहना पड़ा था कि अगर उन्होंने डोभाल की बात मानी तो उनकी छुट्टी कर दी जाएगी.

 

मिजो नेशनल आर्मी में सेंध लगाकर उन्होंने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दिल जीत लिया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें महज 6 साल के करियर के बाद ही इंडियन पुलिस मेडल से सम्मानित किया था जबकि परंपरा के मुताबिक वो पुरस्कार कम से कम 17 साल की नौकरी के बाद ही मिलता था.

 

यही नहीं राष्ट्रपति वेंकटरमन ने अजीत डोभाल को 1988 में कीर्तिचक्र से सम्मानित किया तो ये भी एक नई मिसाल बन गई. अजीत डोभाल पहले ऐसे शख्स थे जिन्हें सेना में दिए जाने वाले कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था.

 

अजीत डोभाल की कामयाबियों की लिस्ट में आतंक से जूझ रहे पंजाब और कश्मीर में कामयाब चुनाव कराना भी शामिल है. यही नहीं उन्होंने 6 साल पाकिस्तान में भी गुजारे हैं और चीन, बांग्लादेश की सीमा के उस पार मौजूद आतंकी संगठनों और घुसपैठियों की नाक में नकेल भी डाली है.

 

अजीत को मौत का खौफ भी नहीं सताता. 1989 के ऑपरेशन ब्लैक थंडर की जब स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए 300 सिक्योरिटी गार्ड और 800 बीएसएफ के जवानों ने धावा बोला था. कहा जाता है कि खुद अजीत डोभाल उस वक्त हरमिंदर साहब के अंदर मौजूद थे. उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी.

 

अजीत का मानना है कि आतंक के लड़ाई के लिए एनसीटीसी यानी नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर जैसी किसी बड़ी संस्था की जरूरत है जो एक मुकम्मल लड़ाई लड़ सके.

 

नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए एनसीटीसी का विरोध करते रहे हैं लेकिन अब देश की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है. यही एक मोर्चा है जहां मोदी और अजीत डोभाल के विचार अलग नजर आते हैं. लेकिन अब तक की राजनीति में अजीत डोभाल दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञों से करीबी के कारण कांग्रेस के निशाने पर रहे हैं.

 

यही नहीं अजीत डोभाल को कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह अन्ना आंदोलन की कोर कमेटी के सदस्य के तौर पर भी गिनाते रहे हैं. डोभाल इन विरोधों के बीच लगातार काम करते रहे हैं और 69 साल की उम्र में भी सक्रिय हैं.

 

मोदी लगातार आतंक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते रहे हैं और अब जब सत्ता उनके हाथ में है तो उन्हें एक ऐसे हाथ की जरूरत है जो उनके इशारे पर आतंकवाद पर मजबूत वार कर सके. अजीत डोभाल मोदी को सलाह देते रहे हैं.

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