मोदी ने क्यों दी किताब ‘माइनर हिंट्स’ को पढ़ने की सलाह?

By: | Last Updated: Wednesday, 9 April 2014 7:17 AM
मोदी ने क्यों दी किताब ‘माइनर हिंट्स’ को पढ़ने की सलाह?

बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने वडोदरा लोकसभा सीट से आज अपना नामांकन भर दिया है. नामांकन दाखिल करने के बाद मोदी मीडिया से मुखातिब हुए और इस दौरान उन्होंने स्वराज्य और सुशासन का पाठ पढ़ने के लिए ‘माइनर हिंट्स’ नामक किताब पढ़ने की सलाह दी.

 

आखिर माइनर हिंट्स में ऐसा क्या है?  इस किताब और देश की बड़ी रियासतों में से एक रही बड़ौदा के महाराजा सयाजीराय गायकवाड़ की शासन शैली पर गहरी नज़र डाल रहे हैं एबीपी न्यूज़ के गुजरात एडिटर ब्रजेश कुमार सिंह. इस किताब का गुजराती अनुवाद ‘शासन सूत्र’ नाम से हुआ है. 

 

‘माइनर हिंट्स’ और महाराजा सयाजीराव गायकवाड़

 

महाराजा सयाजीराव गायकवाड़, जिन्हें भारतीय इतिहास में औपचारिक तौर पर सयाजीराव तृतीय के तौर पर जाना जाता है, आजादी से पहले देश की बड़ी रियासतों में से एक बड़ौदा के करीब 58 वर्षों तक शासक रहे. ये लंबा शासन काल देश के तत्कालीन रियासती शासकों के हिसाब से कुछ बड़े कार्यकालों में से एक था. और इस लंबे कार्यकाल के दौरान वो अपनी अदम्य देशभक्ति, कुशल प्रशासन और महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक सुधारों के कारण देश-विदेश में मशहूर हुए. उनका शासन देशी रियासतों ही नहीं, ब्रिटिश शासन के लिए भी अनुकरणीय बना.

 

लेकिन जिस समय सयाजीराव ने शासन की बागडोर संभाली, उस समय उनकी उम्र महज अठारह साल की थी. सयाजीराव जन्मजात राजा नहीं थे, बल्कि उन्हें बड़ौदा के पूर्व महाराजा खंडेराव की विधवा महारानी जमनाबाई ने 27 मई 1875 को गोद लिया. जिस बच्चे को महारानी ने गोद लिया, उसका असली नाम था गोपाल और वो काशीराम गायकवाड़ की संतान था, जो बड़ौदा के गायकवाड़ों के दूर के रिश्तेदार हुआ करते थे और महाराष्ट्र के कवलाना नामक छोटे से कस्बे में रहते थे. दत्तक लेने के बाद गोपाल को सयाजीराव तृतीय का नाम दिया गया, क्योंकि सयाजीराव के नाम से बड़ौदा रियासत में दो प्रतापी राजा पहले हो चुके थे.

 

जिस समय सयाजीराव को जमनाबाई ने दत्तक लिया, उस समय उनकी उम्र थी महज बारह साल. आखिर बाहर साल के गोपाल का ही क्यों चुनाव किया महारानी ने. बताया जाता है कि गोद लेने के लिए कई बच्चे महारानी के पास आए थे और महारानी सबसे एक सवाल जरुर पूछती थीं कि आखिर वो किसलिए बड़ौदा आए हैं. 11 मार्च, 1863 को जन्मे नन्हे गोपाल से जब ये सवाल पूछा गया तो उसने पलक झपकाये बिना कहा – मैं यहां शासन करने आया हूं. गोपाल की यही बात बाइस साल की महारानी जमनाबाई को भा गई और उन्होंने गोपाल को ही गोद लेने की ठान ली.

 

जब एक बार बड़ौदा की रियासत को उसका नया महाराजा मिल गया, तो औपचारिक तौर पर शासन उस महाराजा के हाथ में देने के लिए उसका प्रशिक्षण शुरू हुआ. इस काम में बड़ौदा के तत्कालीन दीवान टी माधव राव लगे, जो थोड़े समय पहले ही दीवान की अहम भूमिका में बड़ौदा लाये गये थे. न सिर्फ सयाजीराव को पढ़ाने के लिए प्राइवेट ट्यूटर रखे गये, बल्कि उनके शारीरिक प्रशिक्षण और घुड़सवारी की तालीम देने के लिए भी कई विशेषज्ञ रखे गये. तय ये हुआ कि 21 साल की उम्र में सयाजीराव को स्वतंत्र रुप से शासन की बागडोर सौंप दी जाएगी, उसके पहले उनका प्रशिक्षण चलता रहेगा और बड़ौदा का प्रशासन रिजेंसी कौंसिल चलाती रहेगी. लेकिन जब ब्रिटिश शासन की इस बात के लिए आलोचना शुरू हुई कि वो जानबूझकर सयाजीराव को स्वतंत्र सत्ता देने में देरी कर रहा है, तो अचानक वायसराय लॉर्ड रिप्पन ने ये फैसला कर लिया कि सयाजीराव के 18 साल के हो जाने के बाद ही उन्हें स्वतंत्र सत्ता सौंप दी जाएगी. इसी फैसले के तहत 28 दिसंबर, 1881 को सयाजीराव का राज्यारोहण हुआ.

 

हालांकि इससे ठीक पहले का समय न सिर्फ ब्रिटिश सरकार बल्कि दीवान माधव राव के लिए भी काफी चुनौतीपूर्ण रहा. दरअसल बारह साल की उम्र में जब नन्हें से गोपाल को महारानी ने गोद लिया, तो सोचा ये गया था कि 21 साल की उम्र तक आते-आते नये महाराजा के प्रशिक्षण के लिए करीब नौ साल का समय मिल जाएगा. इसी हिसाब से उनके प्रशिक्षण का शेड्यूल भी तैयार किया गया था. लेकिन उसमें अचानक तीन साल की कटौती होने पर दीवान माधव राव की चुनौती बढ़ गई. दरअसल पहले ये सोचा गया था कि प्रशासन के हर विभाग का व्यावहारिक अनुभव सयाजीराव को दिया जाएगा, लेकिन समय की कमी के कारण विशेषज्ञों के भाषण के जरिये इसकी कमी पूरी करने का निश्चय किया गया. इसी सिलसिले में जून से लेकर दिसंबर 1881 के बीच करीब सात महीनों के समय में महाराजा सयाजीराव को करीब डेढ़ सौ व्याख्यान दिये गये. इनमें से ज्यादातर व्याख्यानों के समय या तो महाराजा सयाजीराव अकेले रहते थे या कभी-कभार उनके ट्यूटर एफएएच इलियट साथ बैठते थे, जिन्हें महाराजा सयाजीराव ताउम्र ‘सर’ के संबोधन से ही बुलाते रहे.

 

इन डेढ़ सौ भाषणों में से करीब एक तिहाई यानी छियालीस व्याख्यान दीवान माधव राव ने दिये, जिन्हें ब्रिटिश शासन पहले ही ‘राजा’ की उपाधि दे चुका था असाधारण योग्यता और प्रशासनिक कुशलता के लिए. बाकी व्याख्यान रियासत के राजस्व आयुक्त काजी शहाबुद्दीन, मुख्य न्यायाधीश रुस्तमजी, कानून विशेषज्ञ थानावाला जैसे सात-आठ लोगों ने दिये. इनमें से किसी ने कानून और न्याय व्यवस्था की जानकारी दी, तो किसी ने राजस्व व्यवस्था की, किसी ने पुलिस की व्यवस्था समझाई तो किसी ने फौज के गठन और रख रखाव की. किसी ने हिसाब-किताब की व्यवस्था समझाई, तो किसी विशेषज्ञ ने महाराजा का ज्ञान हिंदू शास्त्रों और उनसे जुड़ी विधियों और नियमों के बारे में पुख्ता किया.

 

खुद दीवान टी माधव राव ने महाराजा को प्रशासन के सभी व्यावहारिक पहलुओं से परिचित कराने का प्रयास तो किया ही, खुद महाराजा का अपना आचरण कैसा हो, इसके बारे में भी सुझाव दिये. माधव राव के ये सभी व्याख्यान बाद में एक पुस्तक के तौर पर छपे, शीर्षक दिया गया – ‘माइनर हिंट्स’. माइनर हिंट्स का गुजराती में भी अनुवाद हुआ- शासन सूत्र के नाम से. खैर, माइनर हिंट्स में जो छियालीस अध्याय हैं, वो आज भी शासन को बेहतर ढंग से कैसे चलाया जाए, इसके लिए अनुकरणीय हैं, बाइबल के समान हैं.

 

मसलन, शासन के बुनियादी सिद्धांत नामक व्याख्यान में माधव राव महाराजा सयाजीराव को ये बताते हैं कि हर शासक को ऐसे दरबारी घेरने की कोशिश करते हैं, जो महाराजा को ये समझाते हैं कि राष्ट्र उनके लिए बना है, न कि वो राष्ट्र के लिए बने हैं और ऐसी परिस्थिति में महाराजा तुरंत रियासत को अपनी बपौती समझ लेते हैं और प्रजा को भेड़ बकरी के समान. माधव राव महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ को ऐसी भूल करने से आगाह करते हैं, साथ में ये भी समझाते हैं कि शासकों का कर्तव्य और जिम्मेदारी काफी बड़ी होती है और उन्हें ऐसी गैर जिम्मेदाराना, अतार्किक हरकतें नहीं करनी चाहिए, जैसा जंगली जानवर करते हैं. माधव राव महाराजा को ये भी समझाते हैं कि किसी भी शासक का आखिरी उद्देश्य उन लोगों को सुखी रखना है, जिन पर शासन करने का अधिकार भगवान की कृपा से उन्हें मिला है.

 

माधव राव महाराजा को ये भी बताते हैं कि सलाह किनकी लेनी चाहिए. माधव राव के मुताबिक, वो लोग सलाह देने के लिए सबसे तत्पर रहते हैं, जो संबंधित विषय में सबसे कम जानकारी रखते हैं. ऐसे में माधव राव महाराजा को सावधान करते हैं कि सलाहकारों के चयन के मामले में सबसे ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ये सफल शासक के लिए पहली अनिवार्यता है. माइनर हिंट्स में ऐसे मोती बिखरे पड़े हैं, जो प्रशासन के बुनियादी सिद्धांत सहज ढंग से बताते हैं. आज से करीब एक सौ बत्तीस साल पहले दीवान माधव राव ने इन्हें महाराजा सयाजीराव के प्रशिक्षण के लिए अपने लंबे अनुभव के आधार पर पेश किया था. साढ़े तीन सौ पन्नों की ये किताब आज भी देश के कई प्रशासनिक प्रशिक्षण केंद्रों के पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रही है या फिर उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा है. थोड़े वर्ष पहले तक गुजरात आने वाले आईएएस और आईपीएस जैसे अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को ये पुस्तक उनकी कुशलता बढ़ाने के लिए भेंट की जाती थी.

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