मोदी प्रेम में बीजेपी ने ली संजय जोशी की बलि

By: | Last Updated: Friday, 8 June 2012 4:40 AM

नई दिल्ली:
बीजेपी की राष्ट्रीय
कार्यकारिणी की बैठक से संजय
जोशी को दूर रखने के बाद एक
बार फिर गुजरात के
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी
के दबाव के आगे पार्टी झुक गई
है और इसी का नतीजा है कि जोशी
ने बीजेपी छोड़ दी है.

एबीपी न्यूज को ये जानकारी
मिली है कि अब बीजेपी के
पूर्व महासचिव संजय जोशी संघ
में वापस चले जाएंगे और वहां
उन्हें नई जिम्मेदारी दी
जाएगी.

हालांकि, संजय जोशी के एक
सहयोगी का दावा है कि
उन्होंने बीजेपी नहीं छोड़ी
है सिर्फ पद छोड़ा है.

याद रहे कि संजय जोशी संघ से
बीजेपी में डेपुटेशन पर आए थे
और डेपुटेशन पर आने पर
प्राथमिक सदस्यता लेने की
जरूरत नहीं होती इसलिए अगर
संजय जोशी ने पद छोड़ दिया है
तो इसका मतलब ये हुआ कि
उन्होंने बीजेपी ही छोड़ दी
है.

नरेंद्र मोदी और संजय जोशी के
बीच विवाद की वजह से जिस तरह
से संजय जोशी को इस्तीफा देना
पड़ा उससे बिहार बीजेपी के
नेता सुशील मोदी नाराज हैं.
सुशील मोदी ने कहा है कि जिस
तरह से संजय जोशी को हटाया
गया वो गलत था.

कौन हैं संजय जोशी?

संजय जोशी आखिर है कौन,  उनकी
बीजेपी में इतनी पैठ क्यों है
कि उनसे नरेंद्र मोदी तक को
खतरा महसूस होता है. आखिर
कैसे बनाया उन्होंने अपना ये
मुकाम.

संजय जोशी का शुमार बीजेपी
में उन ताकतवर नेताओं में
होता था जिन्हें शायद आम जनता
ठीक से नहीं जानती लेकिन
पार्टी में उनका कद काफी ऊंचा
है.

1980 के दशक में बीजेपी के
मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी
और संजय जोशी नागपुर में
आरएसएस की एक ही शाखा में काम
किया करते थे. इसीलिए आरएसएस
के साथ साथ उनकी बीजेपी के
कार्यकर्ताओं में भी अच्छी
लोकप्रियता है. खास तौर से जो
जमीन से जुड़े कार्यकर्ता
संजय जोशी के सबसे ज्यादा
करीब है और तो और पार्टी छोड़
चुके पुराने नेता भी संजय
जोशी की तारीफ करते नहीं
थकते.

संजय जोशी मूल रूप से नागपुर
के हैं. उन्होंने मैकेनिकल
इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है.
मैकेनिकल इंजीनियरिंग की
पढ़ाई करने के बाद वो सीधे
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के
साथ जुड़ गए. वो संघ के रास्ते
बीजेपी में आए और उन्हें
बीजेपी को मजबूत बनाने के लिए
पहली बड़ी जिम्मेदारी
गुजरात की दी गई.

वो 1990 में महाराष्ट्र से
गुजरात आए. 1995 में गुजरात में
बीजेपी की पहली बार सरकार
बनीं उस वक्त वो गुजरात
बीजेपी के महासचिव बनाए गए.
जोशी करीब तेरह साल तक गुजरात
में रहे और बीजेपी के सबसे
ताकतवर नेताओं में से एक रहे.

साल 2001 में नरेंद्र मोदी से
खटपट होने के बाद वो दिल्ली आ
गए. दिल्ली में उन्हें बीजेपी
ने संगठन को मजबूत बनाने के
लिए महासचिव बनाया.

जोशी को सबसे बड़ा धक्का लगा
जब 2005 में कथित सीडी कांड में
उनका नाम आया और उन्हें
पार्टी में अपने पद से
इस्तीफा देना पड़ा था.

लेकिन सीडी कांड में क्लीन
चिट मिलने के बाद उन्हें फिर
से पार्टी में अहम रोल अदा
करने का मौका मिला. बीजेपी ने
जोशी को उत्तर प्रदेश के 2012 के
विधानसभा चुनावों की
बाग़डोर सौंप दीं. हालांकि इन
चुनाव में बीजेपी कोई कमाल
नहीं कर पाई.

संजय जोशी ने शादी नहीं की है.
भले ही वो नागपुर के हैं
लेकिन उनके परिवार के कई लोग
गुजरात में रहते हैं.

क्या है झगड़ा

मोदी और जोशी के बीच आज जो
झगड़ा है इसकी नींव आज से
करीब 17 साल पहले पड़ी थी. बात
तब की है जब जोशी गुजरात में
बीजेपी के बड़े ताकतवर नेता
हुआ करते थे और मोदी और जोशी
में कड़ी टक्कर थी. पार्टी के
भीतर सत्ता के संघर्ष की एक
अनूठी कहानी है इन दोनों के
झगड़े की.

वो कहते हैं ना कि एक मयान में
दो तलवारें नहीं रह सकती है
कुछ ऐसी ही कहानी बीजेपी के
दो नेताओं संजय जोशी और
नरेंद्र मोदी की है. वो मयान
गुजरात था जहां राजनीति में
दोनों की धार तेज थी. कभी मोदी
की धार जोशी पर भारी पड़ी तो
कभी जोशी की धार मोदी पर.

साल 1990 में संजय जोशी
महाराष्ट्र में आरएसएस कैंप
से बीजेपी में शामिल होने के
लिए अहमदाबाद आए थे. अहमदाबाद
आने के पहले संजय जोशी नागपुर
में प्रचारक थे और उससे पहले
उसी शाखा के स्वयंसेवक, जहां
गड़करी भी जाया करते थे बतौर
स्वयंसेवक.

1990 में जब संजय जोशी को गुजरात
बीजेपी में संगठन मंत्री का
पद दिया गया, उस वक्त नरेंद्र
मोदी को उनसे ठीक उपर के पद
यानी संगठन महामंत्री के पद
पर काम करते हुए दो साल हो
चुके थे. दोनों ने पार्टी की
गुजरात इकाई में करीब 5 साल तक
साथ-साथ काम किया, संगठन को
मजबूत किया, जिसका परिणाम ये
हुआ कि 1995 में बीजेपी ने अकेले
अपने दम पर गुजरात में पहली
बार सरकार बनाई.

उस समय गुजरात में
मुख्यमंत्री पद के दो प्रमुख
दावेदार थे- बीजेपी के सबसे
वरिष्ठ नेता और शक्तिशाली
पाटीदार समुदाय से आने वाले
केशुभाई पटेल और उतने ही
ताकतवर शंकरसिंह वाघेला,
जिनकी पार्टी पर भी खासी
ग्रिप थी.

दरअसल शंकरसिंह वाघेला 1993 तक
पार्टी के अध्यक्ष बने रहे थे
और मोदी और जोशी दोनों ने
उन्हीं के मार्गदर्शन में
संघ के प्रचारक की भूमिका के
बाद सियासत का पाठ पढ़ा था.
लेकिन जब बीजेपी की गुजरात
में पहली सरकार के
मुख्यमंत्री बनने का मामला
सामने आया, तो मोदी और जोशी
दोनों ने साथ दिया केशुभाई
पटेल का.

केशुभाई पटेल के
मुख्यमंत्रित्व में गुजरात
में बीजेपी की पहली सरकार की
शानदार शुरुआत हुई थी, लेकिन
कुछ महीनों के अंदर ही
शंकरसिंह वाघेला ने बगावत कर
दी. बगावत का कारण केशुभाई
पटेल का शंकरसिंह वाघेला को
सरकार चलाने के मामले में भाव
नहीं देना था और वाघेला इन
सबके लिए जिम्मेदार मान रहे
थे नरेंद्र मोदी को, जिनका
जबरदस्त असर था केशुभाई पटेल
पर. ऐसे में वाघेला के बगावत,
जो भारतीय राजनीति में
खजुराहो कांड के तौर पर मशहूर
है, को शांत करने के लिए
पार्टी के अंदर समझौता हुआ,
तो समझौते की शर्त के तौर पर
मोदी को दिल्ली की तरफ
निर्वासित होना पड़ा और
केशुभाई पटेल की जगह सुरेश
मेहता मुख्यमंत्री बने.

जब मोदी दिल्ली भेजे गये, तो
राज्य बीजेपी में खाली हुई
संगठन महामंत्री की कुर्सी
संभाली संजय जोशी ने. इस तरह
मोदी से गुजरात छिन गया और
संजय जोशी के लिए मैदान खाली
हो गया.

लेकिन वाघेला का विरोध यहीं
खत्म नहीं हुआ एक साल के भीतर
वाघेला ने बीजेपी से बगावत
करके राष्ट्रीय जनता पार्टी
बनाई और सुरेश मेहता की सरकार
गिर गई और फिर कांग्रेस के
सहयोग से वाघेला गुजरात के
मुख्यमंत्री बन गए.

साल 1998 में बीजेपी दोबारा
सत्ता में आई. ये वो वक्त था जब
नरेंद्र मोदी और संजय जोशी के
बीच दरार कम होने की जगह इतनी
ज्यादा गहरी हो गई कि फिर कभी
भर नहीं पाई.

बीजेपी के दोबारा सत्ता में
आने के बाद मोदी गुजरात वापस
लौटना चाहते थे. लेकिन जोशी
ने मोदी के लिए तब गुजरात के
दरवाजे नहीं खोले. 1998 में
केशुभाई एक बार फिर गुजरात के
मुख्यमंत्री बने. मोदी मन
मसोस कर रह गए. ये वो वक्त था
जब दोनों के बीच खटास नफरत
में बदलने लगी.

दोनों के बीच गहरी होती इस
दरार में जोरदार चोट लगी साल
2001 में जब उस वक्त गुजरात में
कुछ विधानसभा सीटों के लिए
हुए उपचुनाव में बीजेपी को
हार झेलनी पड़ी थी और केशुभाई
को सीएम की गद्दी से हटाकर
नरेंद्र मोदी को गुजरात का
मुख्यमंत्री बना दिया गया.

जिस मोदी को गुजरात से वनवास
देकर दिल्ली भेजा गया था उसी
मोदी के सत्ता में आते ही
महीने भर के अंदर संजय जोशी
को गुजरात से वनवास दे दिया
गया.

लेकिन जोशी का सितारा तुरंत
चमकने लगा. संजय जोशी को
दिल्ली में बीजेपी के
राष्टीय महामंत्री का पद
दिया गया. लेकिन मोदी को तब ये
डर सताने लगा कि संजय जोशी
राष्ट्रीय स्तर पर उनकी जगह
नहीं बनने देंगे.

धीरे धीरे मोदी बीजेपी के
सशक्त नेता के रूप में
स्थापित होते गए और संजय जोशी
संघ के आदमी बनकर जमीनी स्तर
पर संगठन के लिए काम करते रहे.

बीजेपी में संजय जोशी का
रुतबा कम नहीं था वो संजय
जोशी ही थे जिन्होंने जिन्ना
विवाद पर लाल कृष्ण आडवाणी से
अध्यक्ष पद से इस्तीफा मांग
लिया था और आडवाणी को इस्तीफा
देना पड़ा था.

लेकिन जोशी का रुतबा मोदी के
लिए परेशानी का सबब था. मोदी
को लगता था कि जोशी गुजरात
में उनके विरोधियों से मिलकर
उन्हें कमजोर करने की कोशिश
कर रहे हैं. दोनों के बीच
मनमुटाव की वजह एक कथित सीडी
भी रही. आरोप है कि संजय जोशी
की सीडी के पीछे भी दोनों के
बीच का विवाद था. सीडी में नाम
आने पर ही जोशी को 2005 में अपने
पद से इस्तीफा देना पड़ा था.
इसके पीछे मोदी के हाथ होने
की आशंका जताई गई थी.

इसके बाद से तो दोनों
एक-दूसरे को देखना तक पसंद
नहीं करते थे. बाद में जोशी को
क्लीन चिट मिल गई थी, लेकिन
उन्हें लंबे समय तक राजनीतिक
वनवास झेलना पड़ा.

हालांकि गडकरी के बीजेपी
अध्यक्ष बनने के बाद ये वनवास
खत्म हुआ. गड़करी ने 2011 में
यूपी में विधानसभा चुनावों
से पहले पार्टी को मजबूत करने
की जिम्मेदारी चुनाव
प्रभारी के तौर पर दी.

मोदी इससे इतने नाराज हुए कि
वो यूपी में 2012 में हुए
चुनावों के दौरान पार्टी का
प्रचार करने तक नहीं गए थे. और
मुंबई राष्ट्रीय
कार्यकारिणी की बैठक में
शामिल होने के लिए मोदी ने
संजय जोशी का इस्तीफा तक
दिलवा दिया. हालांकि पार्टी
अध्यक्ष नितिन गडकरी ने
दोनों के बीच मनमुटाव की बात
को ही खारिज कर दिया.

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