मोदी, मंदिर, संघ और संन्यास की ये कहानी आप शायद ही जानते हों!

By: | Last Updated: Monday, 28 April 2014 12:27 PM
मोदी, मंदिर, संघ और संन्यास की ये कहानी आप शायद ही जानते हों!

नई दिल्ली. 2014 लोकसभा चुनाव की सियासत बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द घुम रही है, क्योंकि पीएम पद के सबसे मजबूत दावेदार हैं. लेकिन मोदी के जीवन का एक दौर ऐसा है, जिसके बारे में ज्यादातर लोगों को पता नहीं, उनके कई कट्टर समर्थकों को भी नहीं. ये दौर है 1968 से 1988 तक का .

 

 

मोदी 1970 में आरएसएस के प्रचारक बने जब उनकी उम्र महज बीस साल की थी. मोदी की शादी 1968 में तब हुई थी जब वो 18 साल के भी नहीं हुए थे . मोदी ने घरवालों के दबाव में शादी तो कर ली थी, लेकिन शादी के बाद ही वो घर से निकल पड़े . अगले दो सालों में वो कभी बेलूर मठ गये, तो कभी हिमालय में .

 

हिमालय के अपने प्रवास के दौरान मोदी केदारनाथ के पास गरुड़चट्टी में भी रहे. इस दौरान की बातें मोदी ने कभी विस्तार से तो नहीं बताईं लेकिन बेलूर मठ और हिमालय जाने की बात उन्होंने ABP न्यूज के खास कार्यक्रम घोषणापत्र में भी स्वीकार की .

 

संघ के प्रचारक के तौर पर मोदी का हिमालय और मंदिरों से रिश्ता बना रहा. मोदी 1972-73 में खेड़ा जिले के मुख्यालय नाडियाड के संतराम मंदिर में रहे और संघ का दायरा छात्रों के बीच बढ़ाने का काम किया. संतराम मंदिर से जुड़े लोग आज भी मोदी के उस दौर को याद करते हैं कि किस तरह एक छोटे से कमरे में रहकर मोदी प्रचारक का काम करते थे.

 

 

इसी तरह की निशानियां अहमदाबाद के जगन्नाथ मंदिर में भी है. मोदी यहां भी प्रचारक की भूमिका में रहे. सत्तर के दशक के आखिरी कुछ वर्षों से लेकर अस्सी के दशक के शुरुआती सालों में मोदी का यहां भी रहना हुआ .

 

 

इसी तरह की निशानियां अहमदाबाद में भी हैं. गुजरात में संघ के मुख्यालय हेडगेवार भवन के अलावा अहमदाबाद के जगन्नाथ मंदिर में प्रचारक के शुरुआती तीन साल उन्होंने बिताए . संघ भवन में रहते हुए मोदी सुबह पांच बचे उठते थे  और दूध लाकर वरिष्ठ प्रचारकों को चाय पिलाने के साथ ही पूरी इमारत की सफाई भी करते थे .

 

दूसरी तरफ जगन्नाथ मंदिर में रहने के दौरान मोदी ने गौ संवर्धन का काम भी बड़े पैमाने पर किया . यहीं रहते हुए मोदी के संगठन क्षमता की शुरुआती धाक भी जमी. विश्व हिंदू परिषद का राष्ट्रीय सम्मेलन 1973 में सिद्धपुर में आयोजित हुआ, तो वहां व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मोदी के पास रही . इसी दौरान मोदी संघ के तत्कालीन प्रमुख माधव सदाशिवराव गोलवलकर उर्फ गुरुजी से भी मिले. उस दौर का एक खास किस्सा मोदी ने एबीपी न्यूज़ के साथ शेयर भी किया.

 

सम्मेलन के दौरान खर्च के लिए जो करीब अस्सी हजार रुपये आये थे, उन्हें नरेंद्र मोदी को रखने के लिए दिया गया. टेंट में रहते मोदी को चिंता हुई कि पैसे कहां रखे जाएं. ऐसे में उन्होंने सरस्वती नदी के पट में बालू के नीचे एक प्लास्टिक की थैली में रुपयों को गाड़ दिया . तीन दिन बाद जब जरूरत पड़ी, तो उन्होंने पैसों को निकाल कर खर्च किया . जगन्नाथ मंदिर में रहने के दौरान ही मोदी देश-विदेश के साधु-संतों के करीब भी आए .

 

अहमदाबाद के जगन्नाथ मंदिर के साथ मोदी का संबंध इतना गहरा रहा कि जब उन्होंने 2001 के अक्टूबर महीने में पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, तो तत्काल मंदिर के दर्शन के लिए गए . यही नहीं, बतौर मुख्यमंत्री मोदी लगातार बारह बार जगन्नाथ मंदिर से निकलने वाली रथयात्रा की शुरुआत करने का रिकॉर्ड भी बना चुके हैं .

 

गुजरात के कई मंदिरों में रहकर संघ का काम करने वाले मोदी ने 1988 में एक बार फिर से हिमालय की राह पकड़ी. दरअसल 1987 में ही मोदी संघ से बीजेपी में आए थे, वो भी तत्काल आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस के निर्देश पर . इस बात का जिक्र एम वी कामथ ने मोदी पर लिखी अपनी किताब में भी किया है. मोदी ने कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की . तब इस यात्रा की शुरुआत हुई ही थी. इस यात्रा के दौरान की मोदी की कुछ तस्वीरें उनकी मनोस्थिति को बयान करते हैं. किसी तस्वीर में मोदी सन्यासी जैसी वेशभूषा में नजर आते हैं, तो कही कुछ सिपाहियों के बीच हाथ में बंदूक थामे. दरअसल मोदी ने कई बार अपने भाषणों में जिक्र किया है कि वो सेना में जाना चाहते थे और इसके लिए जामनगर के सैनिक स्कूल में दाखिला भी चाह रहे थे, लेकिन गरीबी की वजह से वो ऐसा नहीं कर पाए . ऐसे में कैलाश-मानसरोवर यात्रा के दौरान हाथ में राइफल थामकर एक सिपाही की अनुभूति हासिल करते दिखाई देते हैं मोदी इस फोटो में .

 

इसके बाद का दौर मोदी के लिए सियासत की तेज गतिविधियों वाला रहा. गुजरात इकाई के संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी 1988 में थामने वाले मोदी आज पीएम पद के बीजेपी उम्मीदवार बन चुके हैं. लेकिन संघ, सन्यास और मंदिरों का वो दौर मोदी और उनको जानने वालों के लिए आज भी खास है .