मोदी, राहुल, केजरीवाल के चुनाव प्रचार के अपने-अपने मुहावरे

By: | Last Updated: Monday, 14 April 2014 3:47 AM

नई दिल्ली: देश में जारी लोकसभा चुनाव में वे अपनी-अपनी पार्टियों के प्रमुख चुनाव प्रचारक हैं, तथा 400 से भी अधिक लोकसभा सीटों पर खड़े अपने प्रत्याशियों के लिए भीषण गर्मी और धूल भरे दिनों में जनता से अपने पक्ष में मत देने की अपील कर रहे हैं.

 

नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल अपने-अपने व्यक्तित्व और राजनीतिक दृष्टि से अपना-अपना प्रचार अभियान चला रहे हैं और अपने ही अंदाज में जनता के बीच जा रहे हैं.

 

63 वर्षीय मोदी और 43 वर्षीय राहुल अपने-अपने राजनीतिक दलों में एक पूरी पीढ़ी के बदलाव का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, तो दूसरी और 45 वर्षीय केजरीवाल राजनीति में तो नए हैं, पर देश में स्थापित हो चुकी राजनीतिक प्रणाली को बदलने की चाह के साथ बेहद चुनौतीपूर्ण प्रतीत हो रहे हैं.

 

मोदी जहां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में लोगों के बीच जा रहे हैं, वहीं राहुल और केजरीवाल को भी क्रमश: कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) का सबसे बड़ा चेहरा माना जा रहा है. हालांकि राहुल और केजरीवाल के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उनके राजनीतिक दलों ने घोषणा नहीं की है.

 

मोदी का लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान बहुत ही सुनियोजित है और उसका खूब प्रचार प्रसार भी किया जा रहा है, जिसके तहत वह अगले महीने चुनाव प्रचार खत्म होने तक देश भर में 185 ‘भारत विजय’ रैली करने वाले हैं. मोदी के प्रचार अभियान को मीडिया द्वारा भी हाथों-हाथ लिया जा रहा है तथा बीजेपी का पूरा प्रचार अभियान मोदी के ही इर्द-गिर्द केंद्रित कर दिया गया है.

 

कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि राहुल गांधी अगले महीने तक लगभग 80 रैलियों को अभी संबोधित करेंगे. कांग्रेस की तरफ से अध्यक्ष सोनिया गांधी भी इस बीच विभिन्न राज्यों में जनसभाएं करेंगी.

 

वाराणसी लोकसभा सीट से मोदी को चुनौती देने वाले केजरीवाल विभिन्न राज्यों में रोड शो के जरिये लोगों के बीच जा रहे हैं.

 

आप के सूत्रों ने बताया कि केजरीवाल आने वाले दिनों में अपना पूरा ध्यान वाराणसी पर ही लगाएंगे.

 

मोदी अपने चुनाव प्रचार के दौरान अपने भाषण के जरिये जनता से संवाद स्थापित करने और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों का सहारा ले रहे हैं. मोदी युवा मतदाताओं में उत्साह पैदा करने के उद्देश्य से स्थानीय मुद्दे उठाते हैं.

 

मोदी लगभग अपने हर भाषण में नेहरू-गांधी परिवार पर बेहद कठोर प्रहार करना नहीं भूलते. मोदी वक्ता के रूप में सहज लगते हैं और बहुत ही तीखा हमला करते हैं. वह भाषण के दौरान अपनी आवाज में उतार-चढ़ाव लाते हैं और अपने संदेशों को भावपूर्ण बनाने की कोशिश करते हैं.

 

हरियाणा और राजस्थान में अपनी जनसभाओं में मोदी ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर कथित भूमि सौदे को लेकर कटाक्ष किया. वह राहुल को ‘शहजादा’ और कांग्रेस को ‘सल्तनत’ कहकर कटाक्ष करते हैं.

 

मोदी अपने भाषणों को प्रभावी बनाने के लिए हिंदी के मुहावरों का भी इस्तेमाल करते हैं तथा महंगाई, रक्षा, महिला सुरक्षा और शिक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर युवा मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं.

 

दूसरी ओर राहुल गांधी के भाषणों में मोदी के खिलाफ आक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है. राहुल, मोदी को आम धारणा के तहत ही एक तानाशाह और सांप्रदायिक मानसिकता का नेता बताते हैं.

 

राहुल अपने भाषणों में हालांकि बीजेपी के अपने प्रतिद्वंद्वी नेता की अपेक्षा कम कठोर नजर आते हैं तथा अपने भाषण व्यंग्यात्मक लहजे में देते हैं.

 

राहुल अपने भाषणों में कांग्रेस द्वारा पिछले 10 वर्षो में किए गए कार्यो का हवाला देते हैं, तथा अपनी पार्टी को गरीब, युवा और मध्यम वर्ग की जनता के साथ बताने की कोशिश करते हैं.

 

राहुल खुद को ऐसा नेता बताते हैं, जो अनेक लोगों से विचार विमर्श और उनकी सहमतियों के साथ काम करना पसंद करता है, जो दूसरों के मतों का आदर करता है तथा जो आपसी विचार-विमर्श के जरिये समस्या का समाधान प्राप्त करना चाहता है.

 

राहुल अपनी इन रैलियों के दौरान अनौपचारिक बने रहने, लोगों तक पहुंचने और सुलभ बने रहने की कोशिश करते देखे जा सकते हैं. कई रैलियों में तो वह विद्यालयों में छात्रों के बीच लोकप्रिय जींस पर कुर्ता पहनकर ही पहुंच जाते हैं.

 

राहुल के भाषण हालांकि लगातार सुने जाएं तो उनमें दोहराव दिखाई देता है.

 

राहुल ने अपनी रैलियों के दौरान मोदी पर उनके गुजरात मॉडल और जासूसी कांड को लेकर हमले किए तथा बीजेपी पर ‘विघटनकारी राजनीति’ करने का आरोप लगाया.

 

राहुल अपनी पार्टी को एकीकृत करने वाली पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, जो देश के गरीबों के प्रति सहृदय है तथा देश के सभी नागरिकों तक समान रूप से विकास पहुंचाना चाहती है.

 

राहुल और मोदी जहां देश की जमी जमाई पार्टियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और नेता की छवि के रूप में ही जनता के बीच जाते हैं. वहीं बमुश्किल एक वर्ष पहले गठित आपा के नेता अरविंद साधारण वेशभूषा में ही जनता के बीच जाते हैं.

 

अरविंद अधिकांशत: शर्ट पैंट पहने रहते हैं. बहुत ही साधारण, सीधे और स्पष्ट अंदाज में अपनी बात रखते हैं. अरविंद शब्दों के जाल में नहीं उलझना चाहते और इस अंदाज में लोगों को संबोधित करते हैं, जिससे प्रतीत हो कि वह समझौतावादी राजनीति में नहीं घुसना चाहते.

 

केजरीवाल सुरक्षा ताम-झाम और ढेर सारे सहयोगियों के साथ भी नहीं चलते. हालांकि केजरीवाल बहुत ही आत्मविश्वास से अपनी बात कहते हैं और अपनी पार्टी की सफलताओं और असफलताओं को जोड़ते चलते हैं.

 

वह एक ऐसे नेता की छवि गढ़ने की कोशिश करते हैं जो तमाम सुख सुविधाओं से दूर है तथा लोगों की समस्याएं दूर करना ही उसकी प्राथमिकता है.

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने के बाद 49 दिनों में ही त्यागपत्र देने के कारण ‘भगोड़ा’ करार दिए जाने पर केजरीवाल खुद को ऐसे नेता के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं जो अपने सिद्धांतों के लिए कुछ भी त्याग सकता है.

 

कांग्रेस और बीजेपी की उद्योग घरानों से मिलिभगत पर निशाना साधने वाले केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी नीति उन्हें आम जनता के करीब ले जाती है.

 

आप संभवत: देश की एकमात्र ऐसी पार्टी है जो अपनी स्थापना के दो वर्ष के भीतर पूरे देश में 400 से भी अधिक लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है और ऐसा प्रतीत भी होता है कि आप को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पहचान मिल जाएगी.

 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मोदी, राहुल और केजरीवाल अपने-अपने अंदाज में ही अपनी बातें जनता तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.

 

वरिष्ठ पत्रकार बी.जी. वर्गीज ने कहा कि रैलियों में आने वाली भीड़ जरूरी नहीं है कि वापस जाने के बाद उन्हीं दलों को अपना मत दें.

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