राजनीतिक अस्थिरता झारखंड की नियति बनी

By: | Last Updated: Tuesday, 8 January 2013 6:52 AM

रांची:
बिहार से अलग होकर 15 नवंबर 2000
में बने झारखंड में राजनीतिक
अस्थिरता कोई नई बात नहीं है.
राज्य के मुख्यमंत्री
अर्जुन मुंडा के राज्यपाल को
इस्तीफा सौंपने के बाद राज्य
में नई सरकार बनाने दौर
प्रारंभ हो गया है.

राज्य
गठन के बाद पहली बार भारतीय
जनता पार्टी ने सत्ता संभाली
थी और बाबूलाल मरांडी पहले
मुख्यमंत्री बने थे. करीब 27
महीने बाद ही 17 मार्च 2003 को
मंत्रिमंडल में शामिल कुछ
मंत्रियों के विरोध के कारण
मरांडी को रुखसत होना पड़ा और
भाजपा ने अर्जुन मुंडा को
सरकार चलाने का दायित्व
सौंपा था.

18 मार्च 2003 को
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने
वाले मुंडा ने सरकार का शेष
कार्यकाल पूरा किया और
विधानसभा के चुनाव हुए. चुनाव
में किसी भी दल को स्पष्ट
बहुमत नहीं मिला. खंडित
जनादेश के कारण जोड़-तोड़
शुरू हो गया.

झारखंड
मुक्ति मोर्चा ने राज्यपाल
के पास बहुमत जुटाने का दावा
पेश किया. राज्यपाल के
आमंत्रण पर शिबू सोरेन ने दो
मार्च 2005 को मुख्यमंत्री के
रूप में शपथ ली, लेकिन सदन में
बहुमत साबित नहीं करने के
कारण 10 दिनों बाद ही उन्हें
इस्तीफा देना पड़ा.

इसके
बाद भाजपा ने निर्दलीय
विधायकों की मदद से एकबार फिर
सरकार बनाई अर्जुन मुंडा इस
बार भी मुख्यमंत्री बने. 555
दिनों बाद 14 सितंबर 2006 को
मंत्रिमंडल में शामिल
निर्दलीय मंत्रियों ने
मुंडा का तख्ता पलट दिया. 14
सितंबर 2006 को नए समीकरण के साथ
निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा
झारखंड के मुख्यमंत्री की
गद्दी पर काबिज हुए.

कोड़ा
ने मुख्यमंत्री के रूप में 709
दिन कामकाज किया, लेकिन यह
सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा
नहीं कर सकी. पद से हटने के बाद
कोड़ा पर भ्रष्टाचार समेत कई
मामले दर्ज हो गए.

27 अगस्त
2008 को शिबू सोरेन मुख्यमंत्री
बने. शिबू के लिए डगर आसान
साबित नहीं हो सकी. विधायक
बनने के लिए उन्हें उपचुनाव
लड़ना पड़ा। दिसंबर में
तमाड़ विधानसभा उपचुनाव में
शिबू हार गए और मात्र 114 दिनों
बाद ही उन्हें मुख्यमंत्री
पद से हाथ धोना पड़ा.
वैकल्पिक सरकार नहीं बनने से
राज्य में 19 जनवरी 2009 से 29
दिसंबर 2009 तक राष्ट्रपति शासन
लगाया गया.

राज्य में
मध्यावधि चुनाव हुए और फिर
मतदाताओं ने खंडित जनादेश
दिया. भाजपा और झामुमो को 18-18
सीटें मिलीं. दोनों दल बड़ी
पार्टियों के रूप में सामने
आई.

इसके बाद भाजपा और
झामुमो ने मिलकर सरकार बनाई
और तीसरी बार 30 दिसंबर 2009 को
शिबू मुख्यमंत्री बने.
लोकसभा में संयुक्त
प्रगतिशील गठबंधन के पक्ष
में वोट देने के कारण 152 दिनों
बाद ही 31 मई 2010 को उन्हें फिर से
मुख्यमंत्री की कुर्सी
गंवानी पड़ी.

किसी दल को
बहुमत नहीं रहने के कारण फिर
से एक जून 2010 को राज्य में
राष्ट्रपति शासन लागू हुआ. 11
सितंबर 2010 को झामुमो और ऑल
झारखंड स्टूडेंटस यूनियन
(आजसु) के साथ मिलकर भाजपा ने
सरकार बनाई और अर्जुन मुंडा
मुख्यमंत्री बने.

सात
जनवरी 2013 को झामुमो के समर्थन
वापस लेने के बाद मुंडा को आठ
जनवरी को इस्तीफा देना पड़ा.

India News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: राजनीतिक अस्थिरता झारखंड की नियति बनी
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017