राहुल क्यों पिछड़ गए?

By: | Last Updated: Monday, 13 January 2014 4:31 PM
राहुल क्यों पिछड़ गए?

देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के उपाध्यक्ष और देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने के वशंज राहुल गांधी पिछड़ रहे हैं. देश में लगातार हो रहे सर्वे ये बताते हैं कि राहुल गांधी नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल से भी पिछड़ रहे हैं. एबीपी न्यूज नीलसन का जो ताजा सर्वे हुआ है उसके मुताबिक दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में राहुल गांधी मोदी से तो बहुत पीछे हैं बल्कि केजरीवाल से भी पीछे हैं.

 

सवाल ये है कि देश में कांग्रेस और उसके युवराज कहे जाने वाले राहुल गांधी की हालत ऐसी कैसे हो गई? साल 2009 में मुंबई लोकल में सफर करने के दौरान राहुल गांधी की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही थी फिर ऐसा क्या हुआ कि राहुल हीरो से जीरो की तरफ बढ़ते गए.

 

वजह नंबर पांच: कांग्रेस के ढांचे को बदलने की कोशिश

 

आजादी के बाद से कांग्रेस पार्टी में एक खास किस्म का रिवाज है. ये रिवाज है अपने नेता के पीछे चलने का. कांग्रेस में सबसे लोकप्रिय नेताओं की लिस्ट देख लीजिए इंदिरा गांधी नंबर एक पर आएंगी. इंदिरा गांधी की कार्यशैली में उनकी राय काफी मायने रखती थी. ताकत एक जगह केंद्रीकृत होती थी. अपने नेता का यही अवतार कांग्रेस को पसंद आता है. लेकिन राहुल गांधी इस कार्यशैली से उलट एक अलग शैली अपना रहे हैं. ये शैली है ताकत को विकेंद्रीकृत करने की. राहुल जो बात कर रहे हैं वो कांग्रेस के कल्चर से एकदम उल्ट है. उनकी बातों पर यकीन किया जाए तो ऐसा लगता है कि वो मौजूदा कांग्रेस से अलग एक अलग कांग्रेस बनाना चाहते हैं और ऐसे में मौजूदा कांग्रेस के ढांचे का कमजोर पड़ना स्वाभाविक नजर आता है.

 

वजह नंबर चार: जो बोला उसे कर नहीं पाए

 

राहुल गांधी के सपने या सोच अच्छी हो सकती है लेकिन दिक्कत ये हुई कि राहुल गांधी अपनी सोच को हकीकत के धरातल पर उतार नहीं पाए. राजनीति में सक्रिय होने के करीब दस साल बाद तक राहुल गांधी के सपने सिर्फ सपने ही बने रहे. राहुल गांधी आज भी लगभग वैसी बातें कर रहे हैं जैसी बातें वो बरसों पहले करते थे. जैसे युवाओं को आगे लाया जाएगा, पार्टी के दरवाजे हर किसी के लिए खोले जाएंगे. 13 जनवरी को केरल पहुंचे तो भी यही कि ज्यादा से ज्यादा युवाओं और महिलाओं को आगे आना चाहिए और कांग्रेस ज्वाइन करना चाहिए. लेकिन बातें सिर्फ बातें रह गईं कांग्रेस अपना संगठन मजबूत करने में नाकामयाब रही. राहुल सिर्फ फॉर्मूले देते रहे उन्हें लागू करने वाला कोई नहीं मिला. दिल्ली के टिकट का बंटवारा हुआ तो युवा चेहरे गायब थे. दागियों तक को टिकट मिला. जाहिर है राहुल गांधी के फॉर्मूले को किनारे कर टिकट दिए गए. सवाल ये है कि जब राहुल गांधी की अगर पार्टी में ही नहीं चल रही तो बाहर कैसे सुनी जाएगी?

 

वजह नंबर तीन: जिम्मेदारी से भागने की छवि

 

शायद राहुल गांधी के सलाहकार ऐसी छवि बनाना चाहते थे कि राहुल सत्ता में रहकर सत्ता से दूर हैं, उन्हें पद का लालच नहीं है. कभी पार्टी के लोगों की तरफ से पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी संभालने की बात उछली तो कभी सरकार में पद संभालने की. राहुल गांधी ने जनवरी 2013 तक कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं ली. लेकिन इससे ये संकेत गया कि राहुल गांधी कोई जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं. घर-परिवार में एक जवान होते बच्चे की छवि होती है जो कोई जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहता. ये छवि राहुल गांधी के साथ चिपक गई. राहुल गांधी ने पहली बड़ी जिम्मेदारी संभाली कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनकर. इसके बाद साल 2013 में ही दागियों के अध्यादेश वाले बिल का विरोध किया. ये दो मौके ऐसे थे जब कम से कम कांग्रेसियों ने ही नहीं देश में भी राहुल गांधी की तारीफ की गई. 

 

वजह नंबर दो: ठोस समाधान नहीं

 

राहुल गांधी या सोनिया गांधी के बारे में यही मशहूर है कि देश की वास्तविक सत्ता उन्हीं के हाथ में हैं. लेकिन राहुल गांधी जब भी बोलने खड़े होते हैं तो विपक्ष के नेता ज्यादा नजर आते हैं. जो चल रहा है उसे बदलना है. लोग ऐसे में सवाल पूछते हैं कि जब बदलना है तो बदला क्यों नहीं. राहुल गांधी जिस विरासत को लेकर खड़े हुए हैं उसी के साथ जुड़ा है देश के वर्तमान का हाल. राहुल गांधी जितनी बार वर्तमान पर सवाल उठाते हैं विरोधियों को अतीत पर हमला करना आसान हो जाता है. नतीजा होता है राहुल गांधी की विश्वसनीयता पर सवाल और इसी संकट से राहुल गांधी जूझ रहे हैं. राहुल गांधी के पास समस्याओं की लिस्ट तो है लेकिन उसका कोई ठोस जवाब नहीं है. राहुल गांधी ये भी नहीं समझा पाए कि मनरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल से देश विकास के पथ पर कैसे आगे बढ़ जाएगा.

 

वजह नंबर एक: अर्थव्यवस्था का बुरा दौर

 

कहते हैं अर्थव्यवस्था एक चक्र की तरह घूमती है. जिसमें कभी अच्छा वक्त आता है कभी बुरा. यूपीए वन की सरकार अच्छे वक्त में चली जबकि यूपीए 2 के हिस्से में बुरा वक्त आया. कुछ दुनिया के आर्थिक हालात खराब और कुछ सरकार की नीतियां. देश महंगाई के गर्त में गिरा और सरकार लोकप्रियता के पैमाने पर गिरती गई. सरकार में कांग्रेस का बहुमत है लिहाजा उसे भी नुकसान होना ही था. राहुल गांधी ही नहीं कांग्रेस जिस भी चेहरे को आगे करती उसे नुकसान ही होता.

 

राहुल गांधी जब भी जनता के बीच जब गए तो देश को नई कहानियां मिलीं. अब उसी एक किरदार के जरिए कुमार विश्वास अमेठी में पहुंच कर हमला कर रहे हैं. राहुल कभी संसद में एक्टिव नहीं दिखे. बड़े मुद्दों पर अक्सर खामोशी ओढे रखी. मीडिया से दूरी बनाए रखी. ऐसे कई बातें हैं जिनसे राहुल गांधी की छवि पर डेंट पड़ा है. लेकिन ये भी साफ है कि कांग्रेस ने राहुल को लेकर अपना प्रचार अभियान शुरू नहीं किया है. कांग्रेस जब भी अभियान शुरू करेगी राहुल की छवि में कुछ सुधार तो आएगा ही. लेकिन सवाल ये उठ रहा है कि कहीं राहुल गांधी के लिए देर तो नहीं हो गई?

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