लापता लोगों को अभी भी तालाश रहा है उनका परिवार

By: | Last Updated: Monday, 1 July 2013 6:26 AM
लापता लोगों को अभी भी तालाश रहा है उनका परिवार

हरिद्वार/ऋषिकेश:
आपदाग्रस्त उत्तराखंड में
अभी भी फंसे लोगों के उनके
जीवन के सुखद क्षणों में लिए
गए फोटोग्राफ्स का उपयोग
उन्हें खोजने के लिए अब राहत
शिविरों, रेलवे स्टेशनों एवं
बस अड्डों की दीवारों पर
प्रदर्शित कर किया जा रहा है.

सैकड़ों परिवार वालों के लिए
राहत एवं बचाव कार्य के एक
पखवाड़ा बीत जाने के बाद भी
लापता अपने रिश्तेदारों एवं
परिवार वालों की तलाश करने के
लिए ये फोटोग्राफ्स भी एक
माध्यम हैं.

हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर कई
राज्यों की सरकारों द्वारा
अपने यहां से चार धाम की
यात्रा पर आए तथा बाढ़ में
फंस गए लोगों की सहायता के
लिए शिविर लगाए गए हैं. अब तक
हालांकि एक लाख से अधिक लोगों
को बचाया जा चुका है, लेकिन
अभी भी सैकड़ों लोगों का कुछ
पता नहीं चल पाया है.

शांति कुंज परिसर में मध्य
प्रदेश, गुजरात एवं ओडिशा
द्वारा अपने राहत शिविर लगाए
गए हैं, जहां ऐसी कहानियों की
भरमार है.

अपने पति के साथ शर्म से
मुस्कुराती हुई एक वृद्ध
महिला की फोटो हो या किसी
पारिवारिक समारोह के दौरान
खिंची गई परिवार के चार
सदस्यों की फोटो हो या एक 40
वर्षीय पुरुष की मग के आकार
की फोटो हो, ये सारे
फोटोग्राफ्स आपदा के कारण
बिछड़ गए परिवार की ही कहानी
कहते हैं. यह सारे
फोटोग्राफ्स लापता लोगों के
हैं.

शोकसंतप्त परिवार वालों के
लिए बीते ये 15 दिन बेहद यातना
देने वाले रहे हैं. राजस्थान
से अपने 50 वर्षीय भाई, भाभी और
उनके तीन बच्चों की खोज में
आए राजकुमार सिंह बहुत ही
दयनीय से लग रहे हैं.

सिंह ने रुंधे हुए गले से
आईएएनएस संवाददाता को बताया,
“मैंने अपने भाई से अंतिम बार
15 जून को बात की थी. मैं
हरिद्वार, ऋषिकेश तथा
देहरादून हर जगह हो आया.
लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला.
किसी ने भी उन्हें नहीं देखा.
मैं अपनी मां को क्या
बताउंगा?”

लगभग यही दास्तान अपने दो भाई
और दो बहनों की तलाश कर रही
स्नेहा शर्मा की है. वह अपने
भाइयों-बहनों को बहुत ही
शिद्दत के साथ हर अस्पताल,
पुलिस थाने एवं राहत शिविरों
में खोज रही हैं.

शर्मा के भाई बहनों के
फोटोग्राफ देखकर सेना के एक
जवान ने उन्हें बताया कि उनकी
17 वर्षीय बहन ज्योति का
उन्होंने अंतिम संस्कार कर
दिया है.

स्नेहा शर्मा को हालांकि
अपने शेष भाई बहनों के बारे
में कुछ भी पता नहीं चल सका है.

मध्यप्रदेश सरकार के एक
मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा
ने बताया कि उन्होंने अनेक
परिवारों की करुण कहानी सुनी.

लक्ष्मीकांत शर्मा ने
आईएएनएस से कहा, “एक परिवार के
सामने ही उसके दो रिश्तेदार
बह गए. वे भय से देखते रह गए.”

कुछ कहानियां आशा जगाने
वाली भी

शर्मा ने आगे बताया, “हम 18
सदस्यों वाले एक परिवार के
जीवित बच गए तीन लड़कों से
मिले. उन्होंने बताया कि
धर्मशाला के पहले मंजिल में
पानी भर जाने के कारण वे
दूसरी मंजिल पर चले गए तथा
वहां भी उन्होंने खिड़की की
ग्रिल पकड़कर किसी तरह अपनी
जानें बचाईं.”

उत्तराखंड में मध्य प्रदेश
से आए तीर्थयात्रियों के
राहत एवं बचाव कार्य की
देखरेख के लिए 50 अधिकारियों
के दल के साथ पिछले 12 दिनों से
वहां रुके शर्मा ने कहा, “उनका
दुख सांत्वना से परे है.
उन्हें समझा पाना हमारे लिए
बेहद कठिन है. उनका पूरा
परिवार खत्म हो गया.”

उन्होंने कहा कि उन्हें यह भी
पता लगा है कि कुछ लोग दो से
तीन दिनों तक पैदल चलकर राहत
शिविरों तक पहुंचे. लगभग यही
नजारा ऋषिकेश का भी है, जहां
दूर-दूर तक प्रियजनों के
फोटोग्राफ्स लगे देखे जा
सकते हैं.

ऋषिकेश का अंतर्राज्यीय बस
अड्डा कहीं से भी सामान्य बस
अड्डा नहीं दिखाई देता. जहां
बस अड्डे की एक तरफ की दिवार
फोटोग्राफ और पोस्टरों से
अटी पड़ी है, वहीं दिवार का
दूसरा हिस्सा पुलिस,
स्वयंसेवकों एवं धार्मिक
संगठनों द्वारा लोगों को
भोजन एवं दवाओं की पेशकश के
लिए उपयोग किया जा रहा है.

दस वर्ष से पुलिस सेवा में रह
चुके टिहरी गढ़वाल के एक
अधिकारी ने कहा कि उन्होंने
ऐसी विपदा कभी नहीं देखी.

बचावकर्मियों
को भी दहला गई उत्तराखंड
त्रासदी

राष्ट्रीय
आपदा प्रतिक्रिया बल
(एनडीआरएफ) के जवानों ने
उत्तराखंड में मौत और विनाश
का जो तांडव देखा है, उसे जीवन
में शायद की भूल पाएंगे. देश
में प्राकृतिक आपदा आने पर
कठिन भौगोलिक स्थितियों में
काम करने के अभ्यस्त इन
जवानों को भी उत्तराखंड में
मौत और तबाही के दृश्य भीतर
तक दहला गए हैं.

एनडीआरएफ
के इंस्पेक्टर गोपाल सिंह
मीणा ने बताया कि उन्हें 18 जून
को केदारनाथ और रुद्रप्रयाग
के बीच स्थित गुप्त काशी में
उतारा गया था.

मीणा ने आईएएनएस को बताया कि
उनके दल ने देखा कि बाढ़ के
रास्ते में आने वाली इमारतें
माचिस की तीलियों की तरह बिखर
गईं थीं. चारों ओर शव बिखरे
पड़े थे.

वहां कोई ऐसी इमारत नहीं थी,
जो सुरक्षित बची हो. वहां
बहुत सारे शव थे. एक तरह से वह
भूत कस्बा बन चुका था. शवों की
हालत भी बहुत खराब थी और
जवानों को आगे बढ़ने में बहुत
दिक्कतें पेश आईं.

उत्तराखंड में करीब 15 दिनों
तक राहत और बचाव कार्य करने
के बाद मीणा और उनके कई
सहयोगी अब दिल्ली वापस लौटने
की तैयारी में हैं.

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड
में 14 जून को हुई भारी बारिश
के बाद बाढ़ और भूस्खलन से
भारी तबाही हुई और सैकड़ों
लोगों की मौत हुई और अब भी
सैकड़ों लोग लापता हैं.
बचावकर्मियों ने करीब 100,000
लोगों को बाढ़ प्रभावित
इलाकों से बाहर निकाला है.

मीणा ने कहा कि बाढ़ से बचने
के लिए कई लोगों ने जंगलों
में शरण ली. उनकी स्थिति बहुत
ही खराब थी. उनके दल का अगला
पड़ाव गौरीकुंड था, जो
केदारनाथ मंदिर की चढ़ाई का
आधार शिविर है. यहां की
स्थिति और भयानक थी. कई लोगों
के पांव सूज गए थे, इसलिए वे
चलने की स्थिति में नहीं थे.
मीणा और उनके दल ने पूरी
केदारनाथ घाटी से सैकड़ों
लोगों को बाहर निकाला.

जापान में सुनामी के बाद काम
कर चुके मीणा ने कहा कि वहां
पर भी इतनी भयंकर तबाही नहीं
देखी गई थी. प्रकृति के सामने
वह खुद को पूरी तरह लाचार
महसूसस कर रहे थे.

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