लोकतंत्र के मंदिर पर लोकतंत्र के पुजारियों का हमला

By: | Last Updated: Friday, 14 February 2014 9:25 AM
लोकतंत्र के मंदिर पर लोकतंत्र के पुजारियों का हमला

संसद भवन के बाहर अलग तेलंगाना का विरोध कर रहे एक शख्स को पुलिस हिरासत में लेती हुई.

तारीख 13 फरवरी, दिन गुरूवार स्वतंत्र भारत के इतिहास का वो दिन जो शायद अबतक के सबसे काले अक्षरों में लिखा जाएगा. भारतीय लोकतंत्र शर्मसार हुआ. भारतीय लोकतंत्र में संसद को मंदिर का दर्जा प्राप्त है. लेकिन इस मंदिर के पुजारियों ने ही मंदिर की अस्मिता तार तार कर दी. देश के लिए कानून बनाने वालों ने जमकर कानून तोड़ा और कानून की धज्जियां उड़ाई. और इन नेताओं को चुनकर संसद भेजने वाली जनता मूक दर्शक बन कर सिर्फ टीवी सेटों पर तमाशा देखती रही. शायद 13 फरवरी वो तारीख है जब देश की जनता को अफसोस हो रहा होगा कि हमने आखिर किसके हाथों में देश की बागडोर सौंपी है. क्या ये लोग वास्तव में इस पद के हकदार भी हैं?
 

तस्वीरों में देखें संसद के इतिहास का काला दिन 

आज से करीब 13 साल पहले जब भारतीय लोकतंत्र के मंदिर पर कुछ आंतकवादियों ने हमला किया तब पूरे देश ने और संसद ने इसे जघन्य अपराध माना था. इस मामले में अफजल गुरू को फांसी भी दे दी गई. लेकिन 13 फरवरी को जो कुछ भी संसद में हुआ उसे क्या इससे कम माना जा सकता है. 13 साल पहले संसद पर हमला करने वाले तो देश के बाहर से थे लेकिन इस बार तो हमला करने वाले अपने ही थे. वो अपने जिन पर संसद की गरिमा को बनाए रखने का जिम्मा था.

जब भी किसी राज्य से काटकर अलग नया राज्य बनाया जाता है तब विवाद होता ही है. हमेशा समाज में दो वर्ग होते हैं एक वर्ग विभाजन का विरोध करता है तो दूसरा समर्थन. राजनीतिक दल भी ऐसे ही काम करते हैं. राजनीतिक फायदे नुकसान के गणित के हिसाब से ही उनकी दशा और दिशा तय होती है.

 

लंबे समय से अलग तेलंगाना राज्य की मांग हो रही थी. कई बार तेलंगाना के समर्थन में सांसदों और पार्टियों ने सड़क से संसद तक आंदोलन किया. जबकि सीधे आंध्र से जुड़ी अधिकतर पार्टियां तेलंगाना का विरोध करती रही हैं. आखिरकार जब केंद्र ने अलग तेलंगाना बनाने का फैसला किया तो स्वभाविक सी बात है कि एक वर्ग को नाराजगी हुई होगी.

 

गुरूवार को जब गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने लोकसभा में अलग तेलंगाना का प्रस्ताव रखा तो सत्ताधारी कांग्रेस की विजयवाड़ा से सांसद लगाड़ापति राजागोपाल ने अन्य सांसदों की ओर मिर्च पाउडर से भरा स्प्रे उड़ाना शुरू कर दिया. जिससे कुछ सांसदों की तबियत बिगड़नी शुरू हो गई और उन्हें अस्पताल भेजना पड़ा.

 

इसी बीच टीडीपी यानी की तेलगू देशम पार्टी के सांसद वेणुगोपाल रेड्डी ने माइक तोड़कर खुद के पेट में घुसाने की कोशिश की. हालांकि शुरुआत में उनपर चाकू निकालने का आरोप लगा. लेकिन बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने चाकू नहीं माइक निकाला था.

अलग तेलंगाना के रूख पर तेलगू देशम पार्टी में भी मतभेद रहा है. तेलगू देशम पार्टी के संसदीय दल के नेता नगा नागेश्वर ने जहां प्रधानमंत्री से मिलकर तेलंगाना पर समर्थन देने की बात कही थी वहीं टीडीपी के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू उसी दिन शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से मिलने मुंबई गए थे और तेलंगाना बिल के विरोध में उनसे समर्थन मांगा था. उस दिन भी चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस और वाईएसआर कांग्रेस पर मिलीभगत का आरोप लगाया था. लेकिन गुरूवार को टीडीपी के सांसद वेणुगोपाल ने जो किया वो बेहद ही शर्मनाक था.

 

इसी बीच तेलंगाना समर्थक सांसदों और विरोधी सांसदों के बीच हाथापाई भी हुई. चंकि यह संसद के भीतर का मसला है इसलिए बिना स्पीकर की अनुमति के पुलिस भी इस मामले में कुछ नहीं कर सकती.

 

इतना सब होने के बाद सदन की धारा 374 ए के तहत सीमांध्र क्षेत्र के सभी 17 सांसदों को निलंबित कर दिया गया. लेकिन सवाल यह है कि क्या इन सांसदों का निलंबन ही काफी है ?

 

जिन सांसदों को निलंबित किया गया है उनमें सब्बम हरि, अनंत वेंकटरामी रेड्डी, रायपति संबासिवा राव, निम्बाला कृसतप्पा , वाई एस जगनमोहन रेड्डी, मोदुगुला वेणुगोपाल रेड्डी, एसपीवाई रेड्डी, कोंकल्ला नारायण राव, एम राजमोहन रेड्डी, मगुंता श्रीनिवासुलु रेड्डी, वी अरुणा कुमार, ए साई प्रताप, एल राजागोपाल, सुरेश कुमार शेटकर , के आर जी रेड्डी, गुथा सुखेंदर रेड्डी, निर्माल्ली शिवप्रसाद शामिल हैं.

 

राजनीति में विरोध और समर्थन होते रहते हैं. किसी भी मुद्दे पर अलग – अलग दलों के अलग – अलग विचार हो सकते हैं. लेकिन विरोध का यह तरीका कहीं से सही नहीं कहा जा सकता है.

 

संसद की तरह राज्यों की विधानसभाओं में भी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं. विधानसभा सदस्य एक दूसरे पर कुर्सियां फेंकते हैं. सदन के अंदर अभद्रता करते हैं. मार-पीट करते हैं और हाथापाई पर उतर आते हैं. राज्यपाल को अभिभाषण पढ़ने नहीं दिया जाता है.

 

कानून के निर्माता सदन के अंदर इतना सब कुछ करते हैं लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है. क्योंकि वो कानून के निर्माता हैं और लोकतंत्र के मंदिर में ये सब कुछ करते हैं इसलिए न्यायपालिका भी इन मामलों में कुछ नहीं कर पाती.

 

शायद इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि संविधान निर्माताओँ ने कभी ऐसी कल्पना ही नहीं की होगी की जनता के प्रतिनिधि इस स्तर तक गिर सकते हैं. लेकिन शायद अब हालात ऐसे हो गए की कानून में फिर से संशोधन की आवश्यकता है. ताकि ऐसे माननीयों को दंडित किया जा सके. और भविष्य में भारतीय लोकतंत्र के मंदिर में फिर ऐसी घटना ना होने पाए.

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Web Title: लोकतंत्र के मंदिर पर लोकतंत्र के पुजारियों का हमला
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