लोकसभा चुनाव: 1616 पार्टियां चुनाव मैदान में

By: | Last Updated: Sunday, 13 April 2014 4:54 AM

लखनऊ: स्वतंत्रता के बाद देश में हुए पहले चुनाव से अब तक राजनीतिक दलों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है. मसलन चुनाव में भी ‘प्रतियोगिता’ जारी है. 1952 में हुए पहले चुनाव में देश भर में 53 सियासी दलों ने भागीदारी की थी और 2014 के चुनाव में लगभग 1616 दल चुनाव मैदान में हैं.

 

क्षेत्रीय दलों और राजनीतिक दलों की बढ़ती संख्या की वजह से बड़ी पार्टियों के लिए जीत पहले के मुकाबले काफी मुश्किल हो गई है. यही नहीं जीत का औसत अंतर भी पहले से काफी घट गया है. अब पांच गुना अधिक दल जनता के सामने हैं. देश में आजादी के बाद पहली बार हुए चुनाव में 53 राजनीतिक दल मुकाबले में थे. इसमें 14 राष्ट्रीय दल और 39 राज्य स्तरीय दल थे.

 

1957 में मात्र चार राष्ट्रीय और 11 राज्य स्तरीय दल मैदान में थे. 1962 में कुल 26 दल ही चुनाव लड़े, जिसमें 6 राष्ट्रीय दल थे. 1967 में भी सात राष्ट्रीय और 14 राज्य स्तरीय दलों के साथ कुल 30 दलों के प्रत्याशी जनादेश पाने उतरे. 1971 में आठ राष्ट्रीय, 17 राज्य स्तरीय दल और 28 रजिस्र्टड दल चुनाव लड़े लेकिन 1977 के चुनाव में दलों की संख्या घट गयी.

 

कुल 34 दल ही जनता की अदालत में उतरे. इस चुनाव में कांग्रेस को जबरदस्त मुंह की खानी पड़ी लेकिन जनता का नया प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चल पाया और 1980 में देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा. इस चुनाव में मात्र 26 दलों ने शिरकत की.

 

1984 के चुनाव में 38 दल ताल ठोंकने कूद पड़े थे. 1989 में नौंवे आम चुनाव के बाद, जो गठबंधन सरकारों का दौर चला तो क्षेत्रीय और जातीय पार्टियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी. 1999 के चुनाव तक ये संख्या 169 पहुंच गई. 2004 के चुनाव में 230 दलों के प्रत्याशी मैदान में उतरे.

 

2009 में 7 राष्ट्रीय, 34 राज्य स्तरीय दल और 322 पंजीकृत यानी कुल 363 दल अपने प्रत्याशी संसद भेजने को आतुर रहे. पांच वर्ष के अन्दर ही नेताओं की सियासी महत्वाकांक्षाएं इतनी बढ़ गईं कि 2014 के चुनाव में देश भर से छह राष्ट्रीय, 47 राज्य स्तरीय दलों समेत कुल 1616 दल आयोग में अपनी आमद दर्ज करा चुके हैं. इस चुनाव में 300 नए दल अस्तित्व में आए हैं.

 

पिछले चुनाव की तुलना में चार गुना से अधिक दल इस बार जनता की अदालत में हैं. पहले से कठिन हुआ मुकाबला छोटे-छोटे दलों के मैदान में आने से राजनीतिक स्पर्धा पहले से ज्यादा कठिन हो गयी है. एक से पांच प्रतिशत वोट पाने वाली ये जातीय पार्टियां बड़ी पार्टियों का खेल बिगाड़ने के लिए जानी जाती हैं. अपने जातीय वोट बैंक से बड़े दलों के वोट शेयर में सेंध लगाने वाली इन पार्टियों की वजह से जीत का अंतर घट गया है.

 

1962 में जीत का औसत अंतर 15 फीसद था लेकिन 2009 में यह घटकर मात्र नौ प्रतिशत रह गया. 1977 के चुनाव में जब कांग्रेस विरोधी लहर चल रही थी तब जीत का अंतर 26 प्रतिशत (अब तक का सर्वाधिक) था. दरअसल एक सीट से जितने ज्यादा उम्मीदवार मैदान में रहते हैं, जीत का अंतर उतना ही कम हो जाता है.

 

पन्द्रहवीं लोकसभा में 37 दलों को मिली में जगह-

पहली लोकसभा से लेकर 8 वीं लोकसभा तक एक से डेढ़ दर्जन पार्टियों के प्रत्याशी ही संसद में पहुंच पाये लेकिन 1989 के बाद क्षेत्रीय व जातीय दलों की ताकत में इजाफा हुआ और वह भी संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगीं. 1989 में 33 पार्टियों का संसद में प्रतिनिधित्व रहा.

 

2009 में 15वीं लोकसभा के गठन में 37 दलों के नेता शामिल हुए. 16 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद स्पष्ट होगा कि इस बार चुनावी समर में उतरे 1616 दलों में से कितने संसद में पहुंचते हैं और कितने ‘मुकाबले’ से बाहर हो जाते हैं.

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