लोगों में मेरे पिता की रंगीन-आशिक मिजाज बूढ़े की छवि बन गई है: खुशवंत सिंह के बेटे

By: | Last Updated: Saturday, 22 March 2014 6:29 AM

नई दिल्ली: मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि खुशवंत सिंह का बेटा होने पर कैसा महसूस होता है? कुछ लोगों की तो यही उलझन है कि क्या खुशवंत सिंह के बेटे के रूप में परिचय कराए जाने पर मैं असहज महसूस करता हूं, इस पर मेरा जवाब होता है, मैं तो इसका आदी हो चुका हूं और इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.

 

कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो यह मान बैठे हैं कि आज मैं जो कुछ हूं, अपने पिता की ही बदौलत हूं, शायद वे जानते नहीं कि वे बेटे की मदद के नाम पर उंगली तक हिलाने वाले नहीं हैं. यह मैं बखूबी जानता हूं इसीलिए उनसे कभी कहूंगा ही नहीं. वैसे भी, जब कभी मुझसे ऐसा सवाल पूछा जाता है, तो मैं यही कहता हूं कि मैं उनके ‘इलेस्ट्रेट वीकली’ का संपादक बनने से काफी पहले ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ का सहायक संपादक बन गया था.

 

हां, यह मैं जरूरी कहूंगा कि तब जरूर मुझे गुस्सा आता है, जब मेरा परिचय खुशवंत सिंह के बेटे के रूप में करवाने के बाद यह जोड़ दिया जाता है कि वैसे ये खुद भी जानी मानी हस्ती हैं. दुख की बात है कि भारत में व्यक्ति की अपनी पहचान या शख्सियत नहीं होती, आप फलां-फलां के बेटे, पोते, भतीजे या चचेरे भाई के रूप में ज्यादा जाने जाते हैं.

 

यहां मैं यह कहना चाहूंगा कि ऐसी जगहों पर जहां लोग मुझे खुशवंत सिंह के बेटे के रूप में नहीं जानते, मुझे पापा की वजह से शर्मिदगी उठानी पड़ी है. अमेरिका में एक ऐसा ही वाकया हुआ. इंदिरा गांधी की कुख्यात इमरजेंसी के बाद 1976 में मैं अमेरिका गया था. इंदिरा गांधी और संजय गांधी के काफी घनिष्ठ होने के वजह से मेरे पिता इमरजेंसी के बड़े समर्थक थे. मेरे मित्र अशोक महादेवन तब इंडियन रीडर्स डाइजेस्ट में उप संपादक थे. उन्होंने मुझे वाशिंगटन में एक पार्टी में आमंत्रित किया था. पार्टी अमेरिका में रह रहे महादेवन के एक भारतीय मित्र ने आयोजित की थी.

 

चूंकि उस शाम करने को कुछ खास नहीं था, इसलिए मैं अशोक के साथ हो लिया, उन्होंने न तो मेजबान को और न ही वहां मौजूद मेहमानों को मेरा परिचय दिया. आखिरकार, भारत की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा शुरू हुई और बात इमरजेंसी पर आ टिकी. सबने उसे कोसा खासकर, संजय गांधी को भद्दी-भद्दी गालिया दी जानें लगीं. तभी मेरे पिता का नाम भी आया, चूंकि वे उन गिने-चुने बुद्धिजीवियों और पत्रकारों में से थे, जिन्होंने इंदिरा गांधी का समर्थन किया था.

 

मुझे लगता है कि तब मुझे स्पष्ट कर देना चाहिए था कि वे मेरे पिता हैं लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया और मुझसे यह एक बड़ी गलती हो गई. एक मेहमान ने तो यहां तक कहा दिया कि मैं तो चाहता हूं कि कोई आदमी हरामी खुशवंत सिंह को गोली मार दे.

 

अशोक महादेवन मुझे पार्टी में लाए थे, इसलिए उन्होंने याचना की दृष्टि से देखा. उनकी परेशानी साफ महसूस की जा सकती थी. आखिरकार उन्हें मौजूद मेहमानों के सामने घोषणा करनी पड़ी, यहां मौजूद राहुल दरअसल, खुशवंत सिंह के बेटे हैं.

 

अचानक वहां चुप्पी छा गई और मेजबान ने माफी मांगनी शुरू की. मैं खीसें निपोड़ते हुए मुस्कराया और बोला, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता या इससे मिलते-जुलते कोई शब्द कहे होंगे मैंने, लेकिन उसके बाद पार्टी का मजा ही किरकिरा हो गया. पहले वाली गंभीर चर्चा की जगह हल्की-फुल्की बातों ने ले ली.

 

एक और वाकया 80 के दशक के मध्य का है. मैं इंडियन एक्सप्रेस के लिए उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में किसी चुनाव की रिपोर्टिग के लिए गया था. (तब मैं इसके चंडीगढ़ संस्करण का संपादक था) ट्रेन से सफर के दौरान मैं एक यात्री से बातें करने लगा, उन्होंने पूछा कि मैं शहर पहुंचकर कहां रुकूंगा? मेरे यह कहने पर कि कोई अच्छा होटल मिल जाए तो देखूंगा, उन्होंने अपने साथ ही रुकने का इसरार किया.

 

वहां पहुंचकर पाया कि वे सज्जन उस इलाके के राजघराने से संबंध रखते थे. उन्होंने मुझे अपने आलीशान महल के एक बहुत बड़े बेडरूम में ठहराया. रात को डाइनिंग हाल में उस परिवार के दूसरे लोगों से मुलकात हुई. डाइनिंग हाल इतना बड़ा था कि मजे से उसे बालरूम भी कहा जा सकता था. खाना खाते समय ही मुझे याद नहीं किस तरह मेरे पिता का नाम आया. मैंने उन्हें बताया नहीं था कि मैं उनका बेटा हूं लेकिन जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि उस पूरे परिवार के मन में मेरे पिता के लिए गहरी नफरत थी. वे सब मेरे पिता के खिलाफ जहर उगल रहे थे और मैं बुत बना उन्हें देख रहा था.

 

पिछली बार की तरह मुझे शायद यह खुलासा कर देना चाहिए था कि जिस शख्स की इज्जत के वे परखचे उड़ा रहे हैं, वे कोई और नहीं, मेरे पिता हैं. लेकिन मुझे लगा कि इसके लिए बहुत देर हो चुकी थी. उस वातावरण में वह सच्चाई कबूलना असंभव-सा लग रहा था.

 

लिहाजा, उद्विग्न कर देने वाली उस शाम को और बिगड़ने से बचाने के लिए बहाना बनाकर मैं वहां से उठ गया और अपने बेडरूम में आ गया. पहले मेरा वहां एक दिन और रुकने का इरादा था लेकिन मैंने मेजबान को धन्यवाद दिया और राजमहल से विदा ली. मैं ने जानता कि बाद में उन्हें यह पता चल पाया कि नहीं कि मैं कौन था या किसका बेटा था?

 

इसके अलावा ट्रेन की यात्रा : मैं मुंबई से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई अक्सर राजधानी के द्वितीय श्रेणी के स्लीपर से ही जाता हूं. उस दौरान साथी यात्रियों से भी बातें होती रहती हैं. बातचीत के दौरान अक्सर यात्री एक-दूसरे से पूछते हैं कि आप क्या करते हैं, कितना कमाते हैं..वगैरह-वगैरह. अमूमन मेरे पिता का भी जिक्र आ जाता है कि वे कौन हैं, क्या करते हैं?

 

पहले तो मैं ऐसा जिक्र आने पर अपने पिता के बारे में बता देता था, लेकिन बाद में मैंने महसूस किया कि ऐसा करने से मेरी बाकी की यात्रा तनाव में गुजरती है. अब मैं किसी उपन्यास में डूब जाता हूं.

 

अब पिता का जिक्र आने पर उन्हें कोई उबाऊ-सा लेखक मनोहर सिंह या ऐसा ही कोई साधारण-सा नाम बता देता हूं और उनका नाम किसी ऐसी यूनर्विसटी से जोड़ देता हूं, जिसके बारे में लोग कुछ जानते ही न हों या फिर उन्हें कार के स्पेयर पार्ट्स का दुकानदार या ट्रांसपोर्ट कंपनी का मालिक बता देता हूं ताकि बाकी यात्रा के दौरान उपन्यास का आनंद ले सकूं और इस बारे में कोई आगे कुछ न पूछे.

 

दिक्कत यह है कि मेरे पिता की, लोगों में खास किस्म की छवि बन गई है, जिसे वे तोड़ना ही नहीं चाहते. यह छवि ऐसे रंगीन-आशिक मिजाज बूढ़े की, जिसे सेक्स के अलावा कुछ सूझता ही नहीं, जो औरतों का दीवाना है और चौंका देने वाले बयानों और अश्लील चुटकुलों से सुर्खियों में बने रहना चाहता है.

 

उनका बेटा होने के नाते मैं सच्चाई जानता हूं कि उन्हें सेक्स के मामले में हमारे समाज में व्याप्त ढोंग और दोहरे मानदंडों को बेनकाब करने में मजा आता है, लेकिन जहां तक औरतों की चाहत और आशिकमिजाजी का सवाल है, उन्हें खुद अपनी ऐसी छवि बनाने में मजा आता है. वे हमेशा जवान-खूबसूरत औरतों से घिरे रहते हैं और उन्हें यह अच्छा भी लगता है (यह अच्छा किसे नहीं लगता?) लेकिन मैं जानता हूं कि दिल से बहुत ही रूढ़िवादी शख्स हैं.

 

मैं अपने किशोरावस्था का एक वाकया बताता हूं-हमारे घर की ऊपर की मंजिल पर एक बहुत ही खूबसूरत लड़की रहती थी. वह एक अफगानी राजनयिक की बेटी थी. हम दोनों एक दूसरे की तरफ आकर्षित थे. जब भी उसके माता-पिता बाहर जाते, वह मुझे फोन कर देती की रास्ता साफ है. मैं अपने फ्लैट से निकलर ऊपर जाती सीढ़ियों में अदृश्य हो जाता. मेरा इस तरह उससे चोरी-छिपे मिलना मेरे पिता से छिपा नहीं था और उन्हें यह कतई पसंद नहीं था.

 

तुम इन पठानों को जानते नहीं हो, किसी दिन पकड़े गए, तो उस लड़की का पिता तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेगा. एक दिन उन्होंने मुझे डराते हुए कहा. मैं थोड़ा डरा जरूर, लेकिन इतना नहीं कि उसके पीछे जाना छोड़ दूं.

 

उससे पहले का ऐसा ही एक किस्सा और है. मैं स्कूल में ही था और हम छात्रों का एक गुट पार्टी में गया था. मैंने अपने माता-पिता से कह दिया था कि मैं समय पर शायद रात के 10 बजे तक लौट आऊंगा लेकिन पार्टी जरा लंबी खिंच गई और मैं आधी रात के आसपास ही लौट पाया लेकिन मेरे लौटने तक जो लड़कियां मेरे साथ थीं, उनके माता-पिता मेरे घर फोन कर चुके थे.

 

मेरे पिता मेरे पहुंचने तक जगे हुए थे. मुझे देखते ही उन्होंने करारी झाड़ पिलाई. खासकर, मेरे गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए, उनके हिसाब से लड़कियों का ख्याल रखना मेरी जिम्मेदारी थी और मुझे समय पर घर लौटना चाहिए था.

 

मेरे पिता बेरहमी की हद तक ईमानदार हैं-अपने बारे में भी और दूसरों के बारे में भी. मैंने बेरहम शब्द का इस्तेमाल यहा जानबूझ कर किया है. उनमें छल-कपट या दिखावा बिल्कुल नहीं है. जो शख्स या जो चीज जैसी है, वे वैसा ही कहेंगे, भले ही इससे किसी की भावनाओं को चोट क्यों न पहुंचे.

 

मिसाल के दौर पर किसी मृत व्यक्ति के संस्मरण या श्रद्धांजलि लिखते समय वे उसकी कमजोरियों व ऐब का उल्लेख करने में नहीं हिचकते. उनका इस धारणा में विश्वास नहीं कि मरे हुए लोगों की आलोचना नहीं करनी चाहिए. वे यह मानते हैं कि एक सार्वजनिक व्यक्ति, भले ही उनका दोस्त ही क्यों न रहा हो, का मूल्यांकन सही-सही होना चाहिए.

 

(राहुल सिंह खुशवंत सिंह के पुत्र और मशहूर पत्रकार हैं. उनका यह आलेख वर्ष 2002 में कामना प्रसाद द्वारा संपादित पुस्तक ‘खुशवंत सिंह : तुझ सा कहें किसे’ से साभार)

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