विजय विद्रोही की त्वरित टिप्पणी...जनलोकपाल पर शहीद होने की सियासत

By: | Last Updated: Monday, 10 February 2014 12:40 PM

न खाता न बही , जो केजरीवाल कहे वही सही. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर यह बात बिल्कुल खरी उतरती है . केन्द्र सरकार की तरफ से पारित लोकपाल को वह जोकपाल मानते हैं . हालांकि उनके गुरु अन्ना हजारे उसी बिल के लिए मानते है कि उससे 60 फीसदी भ्रष्टाचार रुक सकेगा . केन्द्र का लोकपाल कानून एक मॉडल बिल है जिसके आधार पर राज्यों को अपना लोकायुक्त  लाना है . लेकिन केजरीवाल बिल्कुल नया बिल लेकर आए हैं . दिल्ली चूंकि केन्द्र शासित प्रदेश है इसलिए बिल पर मंत्रीमंडल की बैठक पर विचार होने से पहले ही उसे उपराज्यपाल के पास भेजा जाना चाहिए था . लेकिन केजरीवाल को यह मंजूर नहीं है . वह कहते हैं कि गृह मंत्रालय को 2002 के उस आदेश को वापस ले लेना चाहिए जिसमें कहा गया है कि कानून व्यवस्था , दिल्ली पुलिस और जमीन से जुड़े बिल केन्द्र की अनुमति के बाद ही दिल्ली की विधानसभा में रखे जा सकते हैं . केजरीवाल ने इस बारे में खत केन्द्र को भेजा . केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि वह कानून मंत्रालय से राय लेगा क्योंकि आदेश वापस लेने के लिए कोई आधार तो होना ही चाहिये . लेकिन केजरीवाल को इतना भी इंतजार मंजूर नहीं है .

 

तो क्या यह माना जाए कि केजरीवाल अब सत्ता छोड़ने के लिए तत्पर है . वह जानते हैं कि दिल्ली में अगले दो महीनों में गरमी पड़ने लगेगी और पानी बिजली के मसले हल नहीं हुए तो जनता त्राही त्राही करेगी . वैसे यह पंगा भी खुद केजरीवाल ने ही लिया है . तो क्या केजरीवाल को जनता के उस आक्रोश से डर लग रहा है और वह जनलोकपाल के मुददे पर अपनी सरकार जानबूझकर गिराना चाहते हैं ताकि इस मुसीबत से निजात मिले और वह खुलकर लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट जाएं . इसके लिए उनके पास मुददा भी हो . चूंकि हमने शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ कामनवैल्थ खेलों में हुये कथित घोटालों को लेकर जांच बिठाई इसलिए कांग्रेस नियमों की आड़ लेते हुए हमें जनलोकपाल विधानसभा में रखने नहीं दिया गया . चूंकि घोटालों में एमसीडी के लोग भी फंसे हैं जिन पर बीजेपी का कब्जा है लिहाजा बीजेपी ने भी कांग्रेस की हां में हां मिलाई और हमारे जनलोकपाल बिल को रोक लिया . तो क्या बीजेपी कांग्रेस को भ्रष्टाचार का साथ देने का आरोप लगाते हुए चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति बना रहे हैं इसलिए वह जनलोकपाल बिल के नाम पर अपनी सरकार हजार बार कुर्बान करने की जिद पकड़े हुए हैं .

 

असली बात दोनों के बीच की लगती है . कहते है राजा की जान तोते में उसी तरह आप पार्टी और केजरीवाल की जान जनलोकपाल में . केजरीवाल जानते हैं कि लोकसभा चुनाव के लिए फरवरी के अंत तक आदर्श आचार संहिता लागू हो जाएगी . तब वह अपने जनलोकपाल को लेकर कुछ नहीं कर पाएंगे . जो करना है अगले कुछ दिनों में ही कर देना है . केजरीवाल जानते हैं कि अगर तब तक जनलोकपाल बिल लेकर वह नहीं आएं तो यही बीजेपी और कांग्रेस उनपर वायदा खिलाफी का आरोप लगायेगी . आखिर आम आदमी पार्टी ने सत्ता में आने के 15 दिनों के भीतर जनलोकपाल कानून बनाने का वायदा किया था . आखिर जो दल भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को लेकर राजनीति में आया था वही दल अगर इस मोर्चे पर नाकाम रहता है तो फिर उसे राजनीति में रहने का , सत्ता सुख भोगने का कोई हक नहीं है .

 

केजरीवाल जानते हैं कि अगर वह उपराज्यपाल के पास जनलोकपाल बिल की कापी ले कर जाते जिसे वह केन्द्र को भेजता , जिसे केन्द्र फिर राष्ट्रपति के पास भेजता और फिर उसे विधानसभा में रखे जाने की मंजूरी मिलती ( या फिर नहीं भी मिलती ) तो इस सब में महीनों लगते . केजरीवाल ने इसलिए सीधे बिल को मंत्रीमंडल की बैठक में मंजूर करवाया और अब दबाल डाल रहे हैं कि वह तो किसी भी कीमत पर बिल को अगले कुछ दिनों में पास करवा के ही रहेंगे . यह काम भी जनता के बीच होगा यानि विधानसभा का सत्र खुले में बुलाया जाएगा . इसमे केजरीवाल की राजनीति साफ तौर पर दिख रही है . लेकिन उनके पास इसके सिवाए कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है . केजरीवाल जानते हैं कि विधानसभा में उनके बिल पर चर्चा हुई तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही बिल के कुछ हिस्सों को असंवैधानिक बताकर बिल को विधानसभा की स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजे जाने की सिफारिश करेंगे . केजरीवाल वैसे तो बिल को हु ब हू पास करवाना चाहते हैं लिहाजा वह सबकी मांग ठुकराते हुए बिल पर वोटिंग करवा सकते हैं . इसमें जीते तो ठीक . हारे तो बीजेपी और कांग्रेस पर इसका ठीकरा फोड़ते हुए शहीद हुआ जा सकता है . यह एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक होगा जिसे विपक्ष भांप रहा है . कांग्रेस भी जानती है इसलिए शिंदे कह रहे हैं वह 2002 का आदेश वापस भी ले सकते हैं अगर कानून मंत्रालय ने ऐसी राय दी .

 

कुल मिलाकर लगता है कि केजरीवाल भी जानते हैं कि उनके बिल में कुछ ऐसे हिस्से हैं जो केन्द्र के लोकपाल बिल के खिलाफ जाते हैं . दिल्ली के लोकपाल के तहत डीडीए और दिल्ली पुलिस के आलावा आईएएस अधिकारियों को भी रखा गया है . सब जानते हैं कि केन्द्र शासिल राज्य होने के नाते डीडीए और दिल्ली पुलिस केन्द्र के तहत आते हैं . इसी तरह जब आईएएस अधिकारियों को केन्द्र के लोकपाल के तहत रखा जा चुका है तो उन्हे दिल्ली के लोकपाल के तहत कैसे रखा जा सकता है . इसी तरह सजाओं का प्रावधान भी व्यापक बहस की मांग करता है . ऐसे में अगर केजरीवाल के जनलोकपाल बिल को हुबहू पास कर भी लिया गया तो राष्ट्रपति के पास यह अटक जाएगा . उतराखण्ड में बीजेपी की सरकार के समय जो लोकायुक्त बिल पारित हुआ था उसमें हाई कोर्ट के जजों को बिल के तहत रखा गया था . बिल राष्ट्रपति के पास गया . राष्ट्रपति ने इस पर एतराज किया कि हाई कोर्ट के जज केन्द्र के तहत आते हैं इसलिए लोकायुक्त के तहत नहीं आ सकते . बिल लौटा दिया गया . आखिरकार वहां कांग्रेस की सरकार आई और उसने संशोधन किया तब जाकर बिल को राष्ट्रपति ने मंजूरी दी . इस सच को जानने के बाद भी अगर केजरीवाल ने अपने बिल में विवाद को रखा है तो साफ है कि वह राजनीति कर रहे हैं .

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Web Title: विजय विद्रोही की त्वरित टिप्पणी…जनलोकपाल पर शहीद होने की सियासत
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