व्यंग्य: मोदी के सपनों को नाथने चले राजनाथ !

व्यंग्य: मोदी के सपनों को नाथने चले राजनाथ !

By: | Updated: 24 Mar 2014 12:20 PM
नई दिल्ली. कुर्सी पर टकटकी बांधे इनकी नजरें गड़ी रहती हैं. एकाएक इन्हें सियासत के लक्ष्य का तीर मिल गया. जी हां, नितिन गडकरी की नासमझी और ऐन मौके पर समीकरण बैठाकर अध्यक्ष पद मिल गया. किसी भी दिशा और हवा से पद हथियाने का जादू सीख चुके हैं. यूपी में मुख्यमंत्री बनने से लेकर वर्तमान में अध्यक्ष पद तक इस जादू का नजारा तो आप भी देख चुके हैं. जितना मिले उसका अधिकतम हिस्सा हड़पने का प्रबंधन इनका हुनर है.

 

ऐसी लौ लगाई है कि छल-फरेब-धूर्तता करने में अपने-पराए का अंतर भूल चुके हैं. और अब सियासत का समीकरण बैठाते-बैठाते आज दिल की बात ट्विटर पर आ गई. जनाब, पहले दिल की बात लिख दिये. अचानक ही दिल पर दिमाग हावी हुआ और झूमा-झटकी करके इन्हें सियासत की रफ्तार पकड़ने में महज आधे घंटे लगे.

 

'अबकी बार भाजपा सरकार' यह हाल-ए-दिल बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह का है. लेकिन अचानक महज आधे घंटे में इनको मोदी के नाम में निर्गुण रचना की खनक सुनाई देती है. और फिर लिखते हैं..'अबकी बार मोदी सरकार'.

 

सियासत के नक्‍शे में तहरीर और तेवर का बदलना कोई बड़ी बात नहीं. सारे समीकरण के बावजूद अवाम से वजनदारी में राब्ता कायम न कर पाने की बौखलाहट साफ झलक रही है. श्रीमान की बौखलाहट है या सियासत में संदेश देने की कला. अब तो राजनाथ जानें. लेकिन इतना तो अब समझ में आने लगा है कि 272 प्लस तो ये भी नहीं चाहते हैं.

 

जैसे नव उदारवादी अर्थशास्त्र में ‘कोई चीज मुफ्त नहीं होती’, वैसे ही राजनीति में यूं ही कोई मददगार नहीं मिलता है.

 

जनाब..हम तो आपको मुफ्त में यही सलाह देते हैं कि लिप्साओं के हर मंथन पर बगावत का जन्म होता है. इसे आप जसवंत और लालकृष्ण आडवाणी के जरिए देख लीजिए. और हां..वोट की भांप में मोदी को सिंहासन का ख्वाब दिखने लगा है. सत्ता के सपने परवान पर हैं. और आप सपनों की सवारी कीजिए..उसे पहले ही तोड़ने की साजिश में फंसे तो आपकी अंदरखाने की राजनीति की अंतिम विदाई कहीं आडवाणी और हरिन पाठक की तरह ना हो जाए.

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