सचिन और जुकरबर्ग: कामयाबी की दो कहानियां

By: | Last Updated: Tuesday, 4 February 2014 7:20 AM
सचिन और जुकरबर्ग: कामयाबी की दो कहानियां

4 तारीख बड़ी अहम है. अहम इसलिए एक तरफ तो दस साल के जादू का जश्न मना रहा है फेसबुक और दूसरी तरफ 24 साल की मेहनत का सम्मान किया देश. ये दिन अहम इसलिए हो गया है कि फेसबुक का दसवां जन्मदिन है और सचिन तेंडुलकर को मिला भारत रत्न.

 

कामयाबी की दास्तां है

देश के महानगर मुंबई के आजाद मैदान से एक दास्तां शुरू हुई थी जिसके खेलते-खेलते दुनिया बदल गई और दूसरी तरफ हॉवर्ड में एक कमरे से मार्क जुकरबर्ग ने इंटरनेट के मैदान पर एक ऐसी पारी शुरू की जिसने दुनिया बदल दी. ये दो अलग कहानियां हैं लेकिन एक दोनों में मेहनत, लगन और सोच का रंग भरा है. दोनों के नतीजे भी एक जैसे हैं. दोनों ही कहानियों में नायक आखिरकार दौलत और शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचे हैँ.

 

सचिन तेंडुलकर का सपना

सचिन तेंडुलकर ऐसे पहले खिलाड़ी बने हैं जिन्हें भारत रत्न से नवाजा गया है. भारत रत्न यानी भारत राष्ट्र की तरफ से सबसे बड़ा आधिकारिक सम्मान. सचिन तेंडुलकर गैर आधिकारिक तौर पर देश के रत्न तो पहले ही बन चुके थे. साल 1989 में जब पहली बार सचिन तेंडुलकर ने टीम इंडिया की जर्सी पहनी थी तो किसी को ये अंदाजा नहीं था कि ये शख्स क्रिकेट बल्लेबाजी के पिछले सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त कर क्रिकेट का भगवान बन बैठेगा. वैसे हम ही गुस्ताखी करते हैं कि किसी को भगवान बना कर अपने से दूर करने की. इंसान के तौर पर देखिए सचिन ने किया क्या. सचिन तेंडुलकर ने एक सपना देखा. खुली आंखों का सपना. बेहतरीन बल्लेबाज बनने का सपना. मैंने सचिन के इतने इंटरव्यू देखे और पढ़े मेरे सामने कहीं एक बार नहीं आया कि सचिन 100 शतकों का रिकॉर्ड बनाना चाहते थे या फिर वो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज बनना चाहते थे. सचिन हर पारी में बेस्ट करना चाहते थे और यही है उनकी कामयाबी का राज.

 

मार्क जुकरबर्ग का सपना

मार्क जुकरबर्ग ने भी कुछ अलग नहीं किया. 2004 की फरवरी में जब फेसबुक लांच किया गया तो ये सिर्फ हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए एक सॉफ्टवेयर भर था. मार्क जुकरबर्ग और उनके दोस्त सेवेरिन, मैककॉलम, मोस्कोविट्ज और क्रिस ह्यूगस दुनिया जीतने नहीं निकले थे. वो एक सॉफ्टवेयर बना रहे थे. ऐसा जिसकी मेंबरशिप लिमिटेड थी. सिर्फ हॉवर्ड के छात्रों के लिए. फिर फेसबुक अपडेट हुआ और इलाके के दूसरों कॉलेजों के छात्रों को जोड़ा गया. फिर दूसरी यूनिवर्सिटी और फिर हाई स्कूल तक के छात्रों को. सिर्फ छात्रों में मशहूर ये सॉफ्टवेयर दुनिया फतह कर लेगा ऐसा शायद ही किसी ने सोचा होगा पर ये हुआ. मार्क जुकरबर्ग और उनके दोस्तों की कोशिश दुनिया पर छा गई.

 

सचिन ने नियमों को अपना बना लिया

सचिन के खेल में एक क्लासिक अंदाज था, एक लय थी. उन्होंने क्रिकेट के नियमों को माना और उसके मुताबिक अपने खेल को ढाला. उन्होंने क्रिकेट के कुछ नए नियम भी बनाए लेकिन सचिन का खेल नियमों के आसपास रहा. उन्होंने अनुशासन में बंधी जिंदगी जी खेल को सबसे पहले रखा. सचिन ने दिखाया कि नियमों में बंधकर क्या किया जा सकता है.

 

मार्क जुकरबर्ग ने नियमों को तोड़ दिया

मार्क जुकरबर्ग अगर नियमों को मानते तो शायद ऐसा कमाल नहीं कर पाते. जुकरबर्ग ने इंटरनेट के मौजूदा नियमों को चुनौती दी. जिस समय फेसबुक आई तो पहले ही कई बड़ी कंपनियां सक्रिय थीं. इंटरनेट की दुनिया में सिक्स डिग्री और माइ स्पेस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट मौजूद थीं. भारत में फेसबुक ने जब चढ़ना शुरू किया तो ऑरकुट जैसी नेटवर्किंग साइट भी मौजूद थी. उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के लिए नए विकल्प दिए और नतीजा हुआ ये.

 

सचिन ने देश को एक कर दिया

सचिन को जो मिला उसमें बड़ा हाथ उनके टैलेंट का था. सच है. पर उससे भी बड़ा हाथ उनके उनकी मेहनत का था. जी तोड़ मेहनत, कभी ना रूकने वाली मेहनत. टीवी स्क्रीन पर दुनिया ने सचिन के स्ट्रोक देखे या  देखे वो विज्ञापन जिसमें सचिन नजर आए. लेकिन परदे के पीछे नाकामी के दिनों में अपने को संभालना हो या फिर कामयाबी के दिनों में घंटों की प्रैक्टिस. सचिन कभी अपनी डगर से पीछे नहीं हटे. सचिन को सचिन इन्हीं बातों ने बनाया. उन्होंने भारत को आगे रखा और प्रांत भाषा से ऊपर उठ कर पूरे देश को अपने खेल से एक कर दिया.

 

जुकरबर्ग ने दुनिया को एक कर दिया

मार्क जुकरबर्ग के फेसबुक में इस वक्त इतने यूजर हैं जितनी भारत की आबादी है. फेसबुक के चेयरमैन और सीईओ जुकरबर्ग के पास भारत में 9 करोड़ तीस लाख यूजर हैं. भारत की सबसे बड़ी सोशल साइट बन चुकी है फेसबुक. फेसबुक अब 135 बिलियन डॉलर की कंपनी बना है और शायद 150 बिलियन डॉलर की कंपनी सबसे तेज बनने का रिकॉर्ड भी तोड़ देगी. फेसबुक के जरिए मार्क जुकरबर्ग ने देशों की आधिकारी बाउंड्री को तोड़ दिया है. 

 

सचिन और जुकरबर्ग की कहानियां बेशक अलग हों पर दोनों में एक समानता है वो है अपनी सोच के जरिए आगे बढ़ने की. दोनों के रास्ते अलग हैं पर आज तक दुनिया की दो सफल कहानियां कहां पहले बने रास्ते पर चली हैं. दोनों के पास अपनी सोच थी लेकिन सोच के साथ मेहनत जुड़ी थी. दोनों ने एक ही बात साबित की है सपने लेने जरूरी हैं और सपनों के पीछे अपने आप को झोंक देना उससे भी जरूरी.

 

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