सत्ता की सियासत में मोदी का नया पैंतरा ?

सत्ता की सियासत में मोदी का नया पैंतरा ?

By: | Updated: 05 May 2014 11:23 AM

गांव में कहावत है कि भेष से ही भीख भी मिलती है. प्रतीक की राजनीति के चलन को महात्मा से लेकर महात्मा गांधी तक ने बखूबी समझा. एक धोती से पूरा शरीर ढंकने, सब कुछ त्याग कर देने और बिना लड़े (अहिंसक) लड़ाई के प्रतीक महात्मा गांधी ऐसे बने कि देश के राष्ट्रपिता का दर्जा दे दिया गया.

 

वर्तमान परिवेश में प्रतीकों की राजनीति के मामले में भारतीय जनता पार्टी ने नये नायक ने बाजी मार ली है. विकास और ब्रांड की इमेज के सहारे नरेंद्र मोदी ने पीएम पद की दावेदारी और युवाओं में लोकप्रियता हासिल की. अब चुनावी चरण के आखिरी सफर को रोमांचक बनाते हुए फैजाबाद में इस चुनाव प्रचार अभियान के दौरान शायद पहली बार राम और मंदिर का सहारा लिया. उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में रैली के दौरान उनके मंच पर अयोध्‍या में प्रस्‍तावित राम मंदिर की तस्‍वीर लगी थी. इससे पहले प्रत्येक रैली में मंच पर मोदी की ही तस्वीर लगी रही है. अब जरा कुछ वक्त पीछे चलते हैं.

 

अयोध्या में मोदी को बड़ी शिद्दत से याद आए भगवान राम, मंच पर राम मंदिर का प्रस्तावित मॉडल भी दिखाया

 

वाराणसी में नरेंद्र मोदी ने कमाल की राजनीति की है. उन्होंने वाराणसी में अपना माहौल बनाने के लिए मदन मोहन मालवीय से लेकर सरदार वल्लभ भाई पटेल और गंगा मैया से लेकर भोले बाबा के प्रतीकों का सहारा लिया. इनमें से मालवीय जी, गंगा और काशी विश्वनाथ के मंदिर से वाराणसी परिभाषित होती है. मोदी ने मालवीय जी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाए और उनके पोते को प्रस्तावक बना कर पर्चा भरा.

 

मदन मोहन मालवीय आजादी से पहले कई बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे. लेकिन कांग्रेस के अंदर वे नरम हिंदुत्व के समर्थक थे. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की वजह से यहां के लोगों का उनके प्रति भावनात्मक लगाव भी है और वे ब्राह्मण थे. नरम हिंदुत्व, काशी के लोगों की भावना और ब्राह्मण वोट ये तीनों मालवीय जी के नाम से साधे जा सकते हैं. मोदी ने सरदार पटेल की मूर्ति पर फूल चढ़ाई. सरदार पटेल भी कांग्रेस में नरम हिंदुत्व के लिए जाने जाते हैं. पटेल की वजह से वोट का एक बड़ा समूह भी साथ में जुड़ सकता है. काशी-विश्वनाथ और गंगा तो खैर बनारस की पहचान हैं हीं. मोदी ने बहुत बेहतर ढंग से तमाम प्रतीकों का इस्तेमाल किया. अब जरा वक्त का पहिया और पीछे ले चलते हैं.

 

मोदी की राजनीति पर नजर दौड़ाएं. चाय की चुनावी चौपाल से असली चाय वाला नेपथ्य में चला गया और केतली लिए भाजपा के दिग्गज नेता फ्रंट पर दिखने लगे. मोदी को बैठे बिठाए सब्जेक्ट देकर कांग्रेस का जायका शायद बिगड़ गया था. विकास का प्रतीक बन बैठे मोदी आयडिया देकर चाय पिलाने में मस्त हैं और उनके समर्थक नमो टी स्टाल लगाकर चुनाव तक जमे रहें. मोदी ने चाय पर चुस्कियां ली और करीब हर चौपाल पर चाय पर लिखा लेख पढ़े. चाय से चाह बढ़ती है. चाय से गरीबों का ब्यापार बढ़ता है चाय का ठेला फुटपाथ का संसद है. चाय बेचकर बहुत कुछ सीखा है. मोदी अपने अतीत का जिक्र कर भविष्य का रास्ता तय करने के लिए हर नुस्खा अपनाएं.

 

चाय तो बहाना था मकसद तो सिंहासन पाना था. हिन्दुस्तान के चौराहों को चाय का परिचय कराने वाले अंग्रेजों को क्या पता था कि तकल्लुफ, तमीज और तीमारदारी की प्रतीक यही चाय एक दिन देश की राजनीति का चेहरा बन जाएगी. सियासत के गर्म चुल्हे पर अरमानों का पानी उबाल मार रहा है. मुद्दों की पत्ती रंग ला रही है. वायदों की शक्कर डाली गई. वोट की भांप में मोदी को सिंहासन का ख्वाब दिखने लगा. सत्ता के सपने परवान पर हैं. और आज मोदी का कुर्ता और चाय देश की सियासत में अहम हो गए. मोदी लुधियाना में जाते हैं तो पगड़ी, आदिवासियों के बीच उनके कपड़े.

 

मोदी के भाषणों के शब्दों में भी प्रतीक की राजनीति की झलक दिखती है. धुव्रीकरण की गुंजाइश दिखती है. आप गौर करें तो अपने विरोधियों पर हमला करते हुए उनके शब्दों का चयन कैसा होता है. उन्होंने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि जब भी कांग्रेस को चुनौती दी जाती है वह 'सेक्युलरिज़्म के बुर्के' में छिप जाती है. क्या ये महज इत्तेफाक है कि अपने विरोधियों पर हमला करने के लिए प्रधानमंत्री पद के प्रबल 'दावेदार' नरेंद्र मोदी इस्लामी प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं? शहजादे, दिल्ली की सल्तनत..आदि.

 

इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोदी शहर से लेकर गांव तक के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं. नरेंद्र मोदी युवाओं में ऐसे भारतीय नेता के प्रतीक बन गए हैं जो आया तो सब ठीक कर देगा. वह ऐसे प्रतीक बने हैं कि शेयर बाजार सिर्फ इस सर्वे भर से उछाल मारने लगता है कि नरेंद्र मोदी 2014 में सरकार के मुखिया हो सकते हैं.

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