सरहद पार भी सुर्खियों में रहे बालासाहेब ठाकरे

सरहद पार भी सुर्खियों में रहे बालासाहेब ठाकरे

By: | Updated: 17 Nov 2012 12:35 PM


मुंबई:
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे
अपने अंतिम समय तक सुर्खियों
में छाए रहने वाले भारत के
चंद नेताओं में शामिल रहे.
इसी वजह से देश ही नहीं, सरहद
के बाहर भी लोग उन्हें जानते
और पहचानते हैं. छह दशक से
ज्यादा के सार्वजनिक जीवन
में ठाकरे हमेशा किसी न किसी
विवाद में रहे.

देशभर में
'बालासाहेब' के रूप में
लोकप्रिय ठाकरे देश के उन
नेताओं में से रहे जिनका
करिश्मा सिर चढ़कर बोलता था.
लोग उनकी एक झलक पाने के लिए
लालायित रहते थे. तभी तो वे उन
नेताओं में गिने जाते हैं
जिन्होंने अपने दम पर
राजनीतिक दल खड़ा ही नहीं
किया बल्कि उसे सत्ता भी
दिलवाई मगर खुद कभी कोई पद
कबूल नहीं किया.

महाराष्ट्र
की सांस्कृतिक राजधानी पुणे
में प्रोग्रेसिव ऐक्टिविस्ट
प्रबोधनकार ठाकरे उर्फ केशव
के घर 23 जनवरी 1926 को जन्मे
बालासाहेब का बचपन पहले पुणे
उसके बाद ठाणे के भिवंडी शहर
में बीता. ठाकरे बचपन से ही
होनहार दिखे.

सांस्कृतिक
राजधानी में पैदा होने का असर
उन पर जीवन भर रहा. वे पूरी तरह
मराठी संस्कृति में रच-बस गए.
उनकी व्यंग्यात्मक वाणी में
जादू ही नहीं करिश्मा भी था
जो भीड़ खींचने का माद्दा
रखता था.

इस उम्दा कलाकार
के अंदर व्यंग्य
कार्टूनिस्ट ने बचपन में ही
जन्म ले लिया. मगर उसे सही मंच
1950 के दशक में मिला जब उन्हें
कार्टूनिस्ट के रूप में
फ्रीप्रेस जर्नल में नौकरी
मिली. उनके कार्टून इतने
अपीलिंग हुए कि 'टाइम्स ऑफ
इंडिया' भी उन्हें रविवारी
अंक में नियमित छापने लगा.
इससे गदगद बालासाहेब ने 1960
में कार्टून साप्ताहिक
'मार्मिक' का प्रकाशन शुरू
किया.

बालासाहेब का
कारवां एक बार मंजिल की ओर
बढ़ा तो फिर कभी पीछे मुड़कर
नहीं देखा. दरअसल, मराठी समाज
के हितों और अधिकारों की
रक्षा के लिए लड़ने के लिए
उन्होंने 19 जून 1960 में शिवसेना
की स्थापना की. शुरू में उनका
लक्ष्य मराठीभाषियों को
नौकरी दिलाना रहा क्योंकि उन
दिनों नौकरी में ये तबका
अमराठीभाषियों के मुकाबले
पिछड़ा हुआ था.

मराठी का
पक्ष लेने की उनकी पहल को
अभूतपूर्व प्रतिसाद मिला।
खासकर युवाओं ने बालासाहेब
को सिर आंखों पर बिठा लिया।
उनके अभियान ने मुम्बई ट्रेड
यूनियनों में कम्युनिस्टों
का वर्चस्व खत्म कर दिश और
उसकी जगह शिवसेना की कामगार
सेना ने ली. ये दौर था वसंतराव
नाइक का जिनका वरदहस्त
बालासाहेब और उनकी नीति पर
रहा. कहा ये भी जाता है कि वाम
नेताओं पर लगाम कसने के लिए
ही नाइक ने ठाकरे को आगे किया.

मराठी
भाषा और संस्कृति के पैरोकर
बालासाहेब मराठी मानुस के
लिए इतने ज्यादा डेडिकेटेड
रहे कि उनकी राह में जो भी आया,
उससे उनका पंगा हो गया. चाहे
वो साठ के दशक में गुजराती
मारवाड़ी रहे हों या फिर
सत्तर के दशक में दक्षिण
भारतीय या फिर अस्सी नब्बे के
दशक में उत्तर प्रदेश और
बिहार के लोग.

यही वजह है
कि अभी दो साल पहले जब मास्टर
ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर ने
मुंबई के बारे में शिवसेना के
दर्शन के विपरीत टिप्पणी की
तो बालासाहेब उन पर भी बरस
उठे. तकनीकी तौर पर देखें तो
उन्होंने हालांकि कभी किसी
भी व्यक्ति या समुदाय का सीधे
विरोध नहीं किया, वह तो बस
मराठी समाज को उसका अधिकार
देने की पैरवी करते रहे.

छह
दशक से ज्यादा के सार्वजनिक
जीवन में बालासाहेब हमेशा
किसी न किसी विवाद में रहे.
सबसे बड़ा विवाद उनकी
हिंदुत्व विचारधारा पर हुआ.
उनके अतिवादी हिंदुत्व को
वामपंथी मुस्लिम विरोधी
करार देते रहे. उनके
व्यक्तित्व पर हालांकि
बारीकी से गौर करें ते ये
धारणा सच से एकदम परे लगती है.
दरअसल, बालासाहेब उन लोगों का
विरोध करते रहे जिनकी, उनके
अनुसार, आस्था भारत में नहीं,
बल्कि पाकिस्तान में है.

ठाकरे
के मुताबिक वे लोग इस देश में
रहते हैं लेकिन देश के
कानूनों का पालन नहीं करते
हैं. बालासाहेब मुंबई में
अशांति के लिए
बांग्लादेशियों को
जिम्मेदार मानते रहे. इसी
लाइन पर चलते हुए 2002 में
इस्लामी आतंकवाद के मुकाबले
हिंदू आत्मघाती दस्ते की
पैरवी थी. हिंदू संस्कृति के
पैरोकार बालासाहेब
वेलेंटाइन डे को हिंदू
सभ्यता के अनुकूल नहीं मानते
थे. उनके अनुसार स्त्री-पुरुष
संबंध परदे के पीछे ही ठीक
हैं, उनकी नुमाइश वेस्ट में
स्वीकार हो सकती है
हिंदुस्तान में नहीं. इसलिए
वे वेलेंटाइन्स डे का विरोध
करते रहे.

हिटलर और इंदिरा
गांधी के प्रशंसक और तमिल
चीतों के समर्थक ठाकरे जिस
विचारधारा का समर्थन करते थे
वो एक समुदाय के खिलाफ जाती
थी. इसी मिजाज के चलते मराठी
हृदय सम्राट से ज्यादा हिंदू
हृदय सम्राट माने जाते रहे.

अयोध्या
में बाबरी मस्जिद के विध्वंस
के बाद मुंबई में दो चरण में
भड़के दंगों में बाल ठाकरे की
भूमिका बहुत विवादास्पद रही.
कानूनी शिथिलता के चलते उनसे
जुड़े मुकदमे अंजाम तक नहीं
पहुंच सका.

मुंबई दंगों
की जांच करने वाले श्रीकृष्ण
आयोग ने दिसंबर 1992 और जनवरी 1993
के लिए सीधे तौर पर बाल ठाकरे
को जिम्मेदार ठहराया था. जिसे
तत्कालीन शिवशाही ने
अस्वीकार कर दिया. लेकिन
श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट
पर अमल करने का दावा करके
अल्पसंख्यकों का वोट लेने
वाली कांग्रेस ने खानपूर्ति
के अलावा कुछ नहीं किया. इसके
अलावा विवादास्पद बयानों के
लिए देश के कई अदालतों में
ठाकरे के खिलाफ मुकदमा चल रहा
है.

सत्तर के दशक तक छोटी
पार्टी ही रही शिवसेना को
ठाकरे के करिश्मा ने अस्सी के
दशक में सशक्त जनाधार वाली
पार्टी बना दिया. उन्होंने
ऐलान किया कि महाराष्ट्र
विधान भवन पर भगवा ध्वज
फहराकर रहेंगे. लक्ष्य हासिल
करने के लिए 1987 में बीजेपी से
गठबंधन किया.

1995 में शरद
पवार और कांग्रेस से ऊब चुकी
जनता ने भगवा गठबंधन में
भरोसा जताया. चुनावों में
शिवशाही ने कांग्रेस को धूल
चटा दी और बालासाहेब का सपना
साकार हुआ. लेकिन जनता की
उम्मीदों को पूरा करने के लिए
जो टीम बनी, उसने ईमानदारी से
काम नहीं किया और 1999 के चुनाव
में पिछड़ गया. यानी अगली
पीढ़ी के नेता बालासाहेब की
विरासत को संभाल नहीं पाए.




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