सर क्रीक: इतिहास, विवाद और समाधान की कोशिशें

By: | Last Updated: Friday, 14 December 2012 6:56 AM
सर क्रीक: इतिहास, विवाद और समाधान की कोशिशें

अहमदाबाद:
भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद
के प्रमुख मुद्दों में से एक
सर क्रीक पर देश के अंदर ही
सियासी विवाद शुरु हो गया है.

गुजरात के मुख्यमंत्री
नरेंद्र मोदी ने
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
को बारह दिसंबर को एक पत्र
लिखकर ये आरोप लगा डाला कि
भारत सरकार पूरे सर क्रीक का
कब्जा पाकिस्तान को देने का
फैसला 15 दिसंबर को करने जा रही
है. प्रधानमंत्री की तरफ से
इसका तत्काल खंडन किया गया और
मोदी के आरोपों को बेबुनियाद
करार दिया गया.

लेकिन मोदी फिर भी नहीं चूके
और कह डाला कि प्रधानमंत्री
का इस मामले में जवाब साफ
नहीं है और उन्होंने ये मांग
कर डाली कि प्रधानमंत्री ये
साफ करें कि सर क्रीक के
मामले में कोई घोषणा की जाने
वाली है या नहीं.

इस विवाद में कांग्रेस
अध्यक्ष सोनिया गांधी भी आज
कूद पड़ी, जब गांधीनगर के
कलोल में एक चुनावी सभा के
दौरान उन्होंने कह डाला कि
कांग्रेस ने देश के हितों,
एकता और अखंडता के साथ कोई
समझौता नहीं किया है, लेकिन
कुछ लोग उकसाने वाली बातें
करके लोगों को भड़काना चाह
रहे हैं. जाहिर है, ऐन
विधानसभा चुनावों के बीच
पैदा हुए इस विवाद का मकसद
सियासी निकाला जा रहा है,
लेकिन इसकी वजह से सर क्रीक
एक बार फिर आ गया है चर्चा के
दायरे में.

सर क्रीक क्या है?

सवाल उठता है कि आखिर सर
क्रीक क्या है, जिसे लेकर
भारत और पाकिस्तान के बीच
पिछले पांच दशक से विवाद है,
जो सुलझ नहीं रहा है.

दरअसल कश्मीर की तरह ही
सरक्रीक का भी मसला है, जिस पर
भारत और पाकिस्तान दोनों ही
देशों के बीच कोई सहमति नहीं
बन पाई है.

जहां तक सर क्रीक का सवाल
है, ये एक ऐसा नाला है, जो
गुजरात के कच्छ जिले और
पाकिस्तान के सिंध प्रांत के
बीच है. इसे भले ही सर क्रीक के
तौर पर ही ज्यादातर पुकारा
जाता हो, लेकिन कच्छ के
पुराने दस्तावेजों में इस
सिर क्रीक कहा गया है. इसका
कारण ये बताया जाता है कि
पहले इस नाले में सीरी नामक
मछली पाई जाती थी, जिसके नाम
पर इस नाले का नाम पड़ा सिर
क्रीक. बाद में इसे सर क्रीक
के तौर पर ही ज्यादा पहचान
मिली.

सर क्रीक की कुल लंबाई करीब 68
किलोमीटर की है, जबकि इसके
आगे का दलदली इलाका, जो
बोर्डर पिलर नंबर 1175 पर खत्म
होता है, वो 36.4 किलोमीटर का है.
इस तरह से कुल 104.4 किलोमीटर
लंबाई का ये इलाका ही
भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद
की जड़ है. कारण ये कि दोनों ही
देशों के बीच सीमा को लेकर जो
आपसी सहमति बनी है, वो जम्मू
के सांभा सेक्टर से शुरु होकर
बोर्डर पिलर नंबर 1175 तक है, जो
कच्छ के रन्न में है.

दरअसल सर क्रीक का विवाद करीब
सौ वर्ष पुराना है. आजादी के
पहले कच्छ देश की एक प्रमुख
रियासत थी, जिसके राजा महाराव
के नाम से संबोधित किए जाते
थे. बीसवीं सदी की शुरुआत में
कच्छ महाराव और सिंध प्रांत
के तत्कालीन प्रशासन के बीच
एक फौजदारी मामले को लेकर
विवाद शुरू हुआ, जो वारदात सर
क्रीक इलाके में हुई थी.

ऐसे में उस वारदात से जुड़ा
मामला कहां चलेगा, महाराव
कच्छ की अदालत में या फिर
सिंध प्रांत की अदालत में,
इसे लेकर विवाद शुरू हुआ. इस
विवाद के बाद ही कच्छ रियासत
और सिंध प्रांत की सीमा तय
करने के लिए 1914 में दोनों
पक्षों के बीच एक समझौता हुआ,
जिसके आधार पर 1925 में सीमा को
चिन्हित करने के लिए पत्थर
लगाने का काम खत्म हुआ. उसके
बाद से इस इलाके में कोई
विवाद दोनों पक्षों के बीच
नहीं रहा.

लेकिन देश की आजादी के बाद
जहां कच्छ रियासत का भारत में
विलय हुआ, वही सिंध प्रांत
पाकिस्तान में गया. इसके बाद
एक बार फिर से विवाद की
शुरुआत हुई, जिसकी परिणति
कच्छ के रन्न में पाकिस्तान
की 1965 में हुई घुसपैठ और फिर
उसके बाद भारत-पाकिस्तान
युद्ध के तौर पर सामने आई.

इसके बाद कच्छ सीमा विवाद को
सुलझाने के लिए जो
अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल
ब्रिटिश प्रधानमंत्री
हेरॉल्ड विल्सन की
अध्यक्षता में बैठा, उसने
छाड़ बेट सहित कच्छ के रन्न
का करीब दस फीसदी हिस्सा
पाकिस्तान को सौंपने का
फैसला किया. बावजूद इसके सर
क्रीक को लेकर विवाद खत्म
नहीं हुआ.

पाकिस्तान ने नया विवाद खड़ा
करते हुए ये कहना शुरू किया
कि सर क्रीक का पूर्वी
किनारा, जो भारत की तरफ था, उस
तक उसका अधिकार बनता है.
लेकिन भारत ने पाकिस्तान के
इस दावे को गलत बताया और कहा
कि अंतरराष्ट्रीय
प्रतिमानों के मुताबिक, अगर
दो देशों के बीच कोई नदी या
नाला आता है, तो उसकी
मध्यरेखा सीमा बनती है न कि
उसका किनारा.

पाकिस्तान ने इसे मानने से
इंकार कर दिया और 1914 के समझौते
के साथ अटैच एक नक्शे का
हवाला देते हुए ये कहना शुरू
किया कि उस नक्शे में सर
क्रीक का पूर्वी हिसा, जो
भारत की तरफ है, उस तक
पाकिस्तान की सीमा दिखाई गई
है. लेकिन भारत ने पाकिस्तान
के इस क्लेम को अतार्किक
बताया और कहा कि 1914 के समझौते
के बाद 1925 तक बोर्डर पिलर लग
गये और ऐसे में मैप पर दिखाये
गये बिंदुओं का कोई मतलब नहीं
है.

बहरहाल दोनों देशों के बीच इस
विवाद को सुलझाने के लिए 1969 से
लेकर 1992 के बीच पांच बैठके
हुईं. इसके बाद 1998 में वाजपेयी
सरकार के दौरान जो कंपोजिट
डायलॉग प्रोसेस शुरू हुई,
उसमें दोनों देशों के बीच
भरोसा बढ़ाने वाले उपायों के
तौर पर सर क्रीक को लेकर
समाधान का मसला भी आया. लेकिन
उसके बाद कारगिल में हुई
घुसपैठ ने इस सिलसिले को एक
बार फिर पटरी से उतार दिया.

आखिरकार विभिन्न स्तरों पर
कई दौर की बातचीत के बाद
जनवरी 2007 में सर क्रीक का
दोनों देशों की तरफ से साझा
सर्वे करने की शुरुआत हुई.

इस बारे में साझा टीम की
रिपोर्ट तैयार भी हुई, लेकिन
उसके बाद आज तक फैसला नहीं हो
पाया. इस बीच संयुक्त राष्ट्र
की तरफ से दी गई वो समय सीमा भी
खत्म हो गई, जिस समय सीमा तक
भारत और पाकिस्तान को इस
विवाद को सुलझा लेना था.

संयुक्त राष्ट्र ने लंबे समय
से विवाद की जद में रहे इस
मुद्दे को तय करने के लिए 2004
में पांच साल की समयसीमा तय
की थी और कहा था कि 2009 तक दोनों
देश सर क्रीक का मसला सुलझा
लें, ताकि इसी के हिसाब से तय
हो सके उनकी अंतरराष्ट्रीय
जल सीमा भी और इस सीमा के
हिसाब से एक्सक्लुसिव
इकोनॉमिक जोन.

इस समय सीमा के समाप्त हो
जाने तक दोनों देशों के बीच
कोई सहमति नहीं बन पाने पर
संयुक्त राष्ट्र ने सरक्रीक
के करीब के समुद्री इलाके को
अंतरराष्ट्रीय जल घोषित
करने की धमकी भी दी थी॰ जिस
स्थिति में कोई भी तीसरा देश
समुद्र सीमा से 200 नॉटिकल माइल
की दूरी के बीच किसी भी किस्म
का खनन या दूसरे फायदे उठा
सकता है. सामान्य
परिस्थितियों में किनारे से
लेकर 200 नॉटिकल माइल तक उस देश
का एक्सक्लुसिव इकोनॉमिक
जोन माना जाता है, जिसकी
किनारा वहां लगा होता है.

ऐसे में अगर सर क्रीक में कोई
भी पक्ष अपनी तरफ से कोई
उदारता दिखाता है, तो उसी
हिसाब से असर पड़ेगा जल सीमा
पर और उसी के मद्देनजर करीब
सैकड़ों नॉटिकल माइल के बीच
के समुद्री संसाधनों पर. यही
नहीं, सर क्रीक के इलाके में
तेल और गैस के भारी भंडार की
संभावना के मद्देनजर भी भारत
और पाकिस्तान इस मसले पर एक
इंच भी जगह छोड़ने को तैयार
नहीं हैं.

ऐसे में इस मुद्दे पर दोनों
देशों के बीच समझौता हो जाने
की बाट जोहने वाले लोगों के
लिए इंतजार छह दशक से भी लंबा
हो गया है और इस बीच विवाद
खत्म होने की जगह बढ़ते जा
रहे हैं, खास बात तो ये कि ताजा
विवाद भारत और पाकिस्तान के
बीच नहीं, बल्कि देश की दो
प्रमुख पार्टियों के बीच
पैदा हो गए हैं, वो भी चुनावी
मौसम में.

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