सुनवाई के बगैर हिरासत में रखना स्वतंत्रता का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट

By: | Last Updated: Wednesday, 14 May 2014 9:21 PM

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को कानूनी प्रावधान से अधिक अवधि तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है. उस स्थिति में बिलकुल ही नहीं जब हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ सुनवाई नहीं हो रही हो, क्योंकि यह संबंधित व्यक्ति से उसकी आजादी छीनने जैसा होगा.

 

अदालत ने उल्लेख किया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी कानून के प्रावधान के तहत हिरासत में लिया गया है और उसके खिलाफ सुनवाई नहीं हो रही है तो ‘यह उसकी आजादी छीनने और नागरिक अधिकार का हनन करना’ माना जाएगा.

 

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति एन. वी. रमना की पीठ ने पिछले सप्ताह दिए गए अपने एक फैसले में कहा है, “ऐसे मामले में किसी व्यक्ति की हिरासत जारी रहना जरूरी है या नहीं इसकी समय-समय पर समीक्षा और आकलन किया जाना चाहिए.”

 

अदालत ने यह फैसला नरेंद्र चौधरी नाम के एक व्यक्ति को 12 महीने तक निवारक नजरबंदी में रखने के आंध्र प्रदेश सरकार के आदेश को निरस्त करते हुए सुनाया.

 

राज्य सरकार ने चौधरी को आंध्र प्रदेश अवैध शराब बिक्री, डकैती,मादक पदार्थ, अपराध, गुंडागर्दी, अनैतिक व्यापार अपराध और भूमि हड़पने जैसी खतरनाक गतिविधि रोकथाम अधिनियम 1986 के तहत हिरासत में रखने का आदेश दिया था.

 

इस कानून की धारा 3 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को निवारक नजरबंदी में तीन माह से अधिक समय तक नहीं रखा जा सकता. चौधरी को 5 अक्टूबर 2013 को हिरासत में लिया गया. उसके खिलाफ 11 मामले हैं. सुप्रीम कोर्ट में उसकी हिरासत को उसकी पत्नी चेरुकुरी मणि ने चुनौती दी थी.

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Web Title: सुनवाई के बगैर हिरासत में रखना स्वतंत्रता का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट
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