सुलतानपुर: स्थानीय मुद्दे और बाहरी उम्मीदवार, वोट को लेकर मतदाता परेशान

सुलतानपुर: स्थानीय मुद्दे और बाहरी उम्मीदवार, वोट को लेकर मतदाता परेशान

By: | Updated: 28 Mar 2014 07:31 AM

सुलतानपुरः लोकसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), भारतीय जनता पार्टी (बीजेपा) व कांग्रेस ने अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं. पार्टियों ने टिकट बंटवारा जाति और ख्याति को ध्यान में रखकर किया है. भाजपा ने वरुण गांधी को मैदान में उतारा है तो कांग्रेस ने अमिता सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया है. बसपा ने शिवसेना के पूर्व विधायक पवन पांडेय पर भरोसा किया है तो सपा ने स्थानीय व्यापारी शकील अहमद पर दांव लगाया है, कहने को तो सभी सुलतानपुर को स्वर्ग बनाने, बेरोजगारी दूर करने, विकास की गंगा बहाने तथा जनता के सुख दुख में साथ निभाने का वादा करा रहे हैं, पर हकीकत से जिले की जनता वाकिफ है.

 

जनपद के मतदाताओं में जिस बात की चर्चा है उसमें सारे प्रत्याशियों के बारे में जो बातें निकल कर आ रही हैं उससे भाजपा के वरुण को हवाई नेता माना जा रहा है. मतदाताओं का कहना है कि वरुण से मिलना ख्वाब जैसा होगा. पांच वर्ष में कितनी बार वह अपने क्षेत्र में आएंगे, भगवान ही जानता है.

 

मतदाताओं की यही राय कांग्रेस प्रत्याशी अमिता के बारे में है. उन्हें भी बाहरी होने का दंश झेलना पड़ सकता है. पूर्व में जिला पंचायत अध्यक्ष व भाजपा सरकार में मंत्री रही अमिता जनपद के बंटवारे में अमेठी जिले की निवासी बन गई, जबकि उनके पति सुलतानपुर से सांसद हैं, परंतु कांग्रेस से लोगों का मोहभंग और स्थानीय न होना कांग्रेस प्रत्याशी पर ग्रहण लगाने को काफी है.

 

बसपा प्रत्याशी पवन पड़ोसी जनपद अंबेडकर नगर के मूल निवासी हैं. विवादों में भी खूब रहे हैं. अपने गृह जनपद से एक बार शिवसेना से विधायक भी रह चुके हैं. हालांकि पवन अब सुलतानपुर के भी निवासी बन गए हैं. पवन ने पूरी ताकत ब्राह्मण, दलित, मुस्लिमों के बीच झोंक दिया है.

 

रही बात सपा की तो काफी काट-छांट के बाद फिर शकील अहमद को अपना प्रत्याशी बनाया. अहमद की राजनीतिक पृष्ठभूमि कुछ खास नहीं है, लेकिन ईमानदार व निर्विवाद छवि होने के कारण लोकसभा चुनाव में मुख्य चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. हालांकि चुनावी परिणाम कई बार अप्रत्याशित हुए हैं. जैसे-जैसे मतदान करीब आएगा, रणनीतिकारों की योजनाएं बदलेंगी और तरकश से जहर बुझे तीर भी निकलेंगे.

 

राजनीतिक जानकारों की मानें तो चुनावी दांव विकास के नाम पर कम, जातियों के आधार पर ज्यादा खेला जाएगा. कुछ ऐसी ताकतें भी सक्रिय हो सकती हैं जो धार्मिक भावनाओं को आधार बना सकती हैं. ऐसे में सबसे बड़ी जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की होगी कि ऐसे तत्वों को पहले से ही चिह्न्ति कर कड़ी कार्रवाई का एहसास करा दे, जिससे चुनाव में जनपद का माहौल न बिगड़े.

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