हम अपने अधिकारों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते?

By: | Last Updated: Thursday, 27 March 2014 4:45 PM

नई दिल्ली. चुनाव सिर पर है. देशभर में नेता धुआंधार प्रचार में जुटे हैं. लेकिन क्या देश का हर नागरिक वोट देने जाएगा?

 

सरकार ने जो अधिकार हमें दे रखे हैं उनमें वोटिंग का अधिकार सबसे निर्णायक है. लेकिन वोट डालने कितने लोग जाते हैं.

 

2009 के लोकसभा चुनाव में देशभर में करीब साठ फीसदी लोगों ने वोट दिया. यानी 10 में से छह लोग वोट देने गए.

दिल्ली में तो पिछली बार पचास फीसदी लोग ही वोट डालने गए यानी आधे लोग वोटिंग बूथ तक नहीं पहुंचे. मुंबई में और भी बुरा हाल रहा सिर्फ 44 फीसदी लोग वोट डालने गए. दक्षिण मुंबई सीट पर सिर्फ 40 फीसदी हुआ यानी दस में छह लोगों ने वोट देना जरूरी नहीं समझा. सवाल ये है कि हम वोटिंग के अधिकार का इस्तेमाल क्यों नहीं करते.

 

बीस साल पहले 1994 में सूचना के अधिकार आंदोलन की शुरुआत हुई. 2005 में सूचना का अधिकार मिला लेकिन कितने लोग इसका इस्तेमाल करते हैं. हर साल सिर्फ बीस से पच्चीस लाख सवाल सरकार से पूछे जाते हैं.

 

सवा सौ करोड़ की आबादी में ये आंकड़ा कम है क्योंकि सरकार को कोसने वालों की तादाद तो करोड़ों में है लेकिन दस रुपये देकर सवाल पूछने के पचड़े में कोई नहीं पड़ना चाहता. सरकार की तरफ से मिले शिक्षा का अधिकार में भी हम पिछड़े हुए हैं.

 

यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के दो तिहाई बच्चे अभी भी बुनियादी शिक्षा से महरूम हैं. सिर्फ एक तिहाई बच्चे चौथी क्लास तक पहुंच पाते हैं. भारत में व्यस्क निरक्षरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है.

 

उपभोक्ता अधिकार पर भी हमारा रवैया उदासीन है. 28 साल पहले हिंदुस्तान में उपभोक्ताओं को अधिकार मिले. शिकायत से लेकर जानकारी के प्रावधान दिए गए हैं. लेकिन हम इन अधिकारों को लेकर सजग नहीं रहते. ऑनलाइन सरकार ने जागो ग्राहक जागो अभियान भी चला रखा है लेकिन मिलावट से लेकर धोखाधड़ी की शिकायतें आती हैं.

 

सवाल ये है कि हम अपने अधिकारों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते.

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Web Title: हम अपने अधिकारों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते?
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