2014: यूपी में सुर्खियों में रहे लव जिहाद, धर्मातरण जैसे मुद्दे

By: | Last Updated: Monday, 22 December 2014 3:37 AM

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के लिए वर्ष 2014 काफी उथल पुथल भरा रहा. वर्ष की शुरुआत में हुए आम चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को जहां विधानसभा उपचुनावों में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी, वहीं दूसरी ओर वर्ष के अंत तक आते-आते लव जिहाद व धर्मातरण जैसे मुद्दों की गूंज संसद तक सुनाई दी. इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाख नसीहतों के बाद भी उप्र के सांसदों व मंत्रियों के विवादित बयानों ने जमकर उनकी किरकरी कराई.

 

वर्ष 2014 की शुरुआत बीजेपी के लिए यादगार रही. लोकसभा चुनाव में सहयोगी दलों को मिलाकर 73 लोकसभा सीटों पर उसने विजय हासिल की. यह उप्र में पार्टी का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन था. सफलता के घोड़े पर सवार बीजेपी को जल्द ही जनता ने उपचुनावों में नकार दिया और बीजेपी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी.

 

उपचुनावों में मिली हार के बाद बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने इसे पार्टी के लिए सबक बताते हुए कहा कि पार्टी इस हार की समीक्षा करेगी. उपचुनावों में पार्टी ने लव जिहाद जैसे विवादित मुद्दे को तरजीह दी, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा.

 

वर्ष के अंत तक आते-आते बीजेपी को धर्मातरण के मुद्दे पर एक बार फिर फजीहत झेलनी पड़ी. आगरा से उठे धर्मातरण के मुद्दे पर बीजेपी को उप्र से लेकर संसद तक विरोधी दलों के तीखे तेवरों से दो चार होना पड़ा.

 

इस बीच विवादित मुद्दों से पार्टी की हो रही फजीहत को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसदों व मंत्रियों को विवादित बयानों से दूर रहने की नसीहत दी, लेकिन उप्र से जुड़े केंद्र सरकार के मंत्रियों ने उनकी नसीहतों को भी ठेंगा दिखा गया.

 

केंद्रीय राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति, गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ, उन्नाव से सांसद साक्षी महाराज के विवादित बयानो ने पार्टी की काफी किरकरी कराई.

 

इन सब मुद्दों पर बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा, “बीजेपी, कांग्रेस के बाद पहला दल है, जिसने वर्ष 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षामंत्री यहां से नेतृत्व कर रहे हैं. पार्टी के लिए यह एक सुखद अनुभव है. सदस्यता अभियान में पार्टी ने नया कीर्तिमान स्थापित किया.”

 

पाठक ने कहा कि उपचुनाव में हालांकि पार्टी को हार मिली लेकिन यह वर्ष बीजेपी के लिए कई मायनों में ऐतिहासिक भी रहा. बीजेपी ने 2014 में अन्य पार्टियों का उप्र से सफाया कर दिया. अब यहां पार्टियां नहीं, परिवार प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

 

बीजेपी के अलावा बात सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की करें तो वर्ष 2014 की शुरुआत सपा के लिए काफी निराशाजनक रही. लोकसभा चुनाव में उसे केवल पांच सीटों आजमगढ़, मैनपुरी, फरु खाबाद, बदायूं और कन्नौज में विजय मिल पाई. बाकी जगहों पर उसे हार का सामना करना पड़ा.

 

लोकसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन से उबरते हुए सपा ने उपचुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन किया. पार्टी ने उपचुनाव में अधिकांश सीटों पर अपना परचम लहराया.

पार्टी के इस प्रदर्शन से उत्साहित उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बीजेपी पर करारा हमला बोलते कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद जो लोग कह रहे थे कि उप्र में सपा का जनाधार गिरा है, उनके लिए उपचुनाव एक बड़ा सबक है.

 

उन्होंने कहा कि जनता ने सांप्रदायिक ताकतों को नकारते हुये समाजवादियों की सरकार में अपना विश्वास व्यकत किया है.

 

बहरहाल, विधानसभा चुनाव में मिली जीत से उत्साहित सपा ने लखनउ के जनेश्वर मिश्र पार्क में राष्टीय अधिवेशन बुलाया जिसमें पार्टी के सभी नेता शरीक हुए.

 

सपा के नेता डॉ. सी.पी. राय ने कहा, “2014 लोकसभा चुनाव के लिहाज से पार्टी के लिए थोड़ा निराशाजनक रहा. पार्टी को अपेक्षा के अनुसार परिणाम हासिल नही कर पायी. लेकिन इसकी बड़ी वजह केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा था. जिसका लाभ दूसरी पार्टी को मिला.

 

उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी ने काफी काम किया जिसका परिणाम उपचुनावों में मिला पार्टी को 11 में से 8 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई.”

 

बकौल राय, “यह वर्ष पार्टी के लिए काफी अच्छा रहा. उपचुनावों में शानदार प्रदर्शन के अलावा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य के विकास के लिए कई योजनाओं का शिलान्यास किया और कई का लोकार्पण किया, जिसका लाभ आने वाले समय में जनता को मिलेगा.”

 

सपा और बीजेपी के अलावा बसपा प्रमुख मायावती के लिए वर्ष 2014 हर मामले में निराशाजनक रहा. लोकसभा चुनाव में पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई. उप्र में 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बसपा को एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई.

 

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद हालांकि लखनऊ में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी हुई, जिसमें पार्टी के खोए जनाधार को हासिल करने के लिए मंथन किया गया और पार्टी ने एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग के अपने पुराने फार्मूले की तरफ बढ़ने का फैसला किया.

 

पार्टी ने हालांकि उप्र में हुए उपचुनावों में हिस्सा नहीं लिया. इसके बजाय पार्टी के नेताओं ने संगठन को दुरुस्त करने की कवायद शुरू की. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर ने वर्ष 2014 को पार्टी के लिए मिलाजुला करार दिया.

 

उप्र में वर्ष 2014 में कांग्रेस की स्थिति भी बसपा की तरह नजर आई. लोकसभा चुनाव में केवल अमेठी और रायबरेली जीतने वाली कांग्रेस को उपचुनावों में भी जनता ने नकार दिया और एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई.

 

चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के उप्र प्रभारी मधूसुदन मिस्त्री ने संगठन को नए तरीके से खड़ा करने का प्रयास शुरू किया और इसे लेकर लखनऊ में उन्होंने पदाधिकारियों के साथ कई बैठकें भी की.

 

कांग्रेस की स्थिति पर पार्टी के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने कहा, “पार्टी लोकसभा चुनाव में मिली हार से हताश है लेकिन निराश नहीं है. पार्टी ने संगठन को दुरुस्त करने का काम शुरू कर दिया है. नई टीम का गठन हो गया है. पूरे प्रदेश में सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है.”

 

राजपूत ने कहा कि पार्टी नए वर्ष में नए तेवर के साथ केंद्र और राज्य सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरेगी.

 

राजनीतिक दलों के अलावा वर्ष के अंत में आयकर विभाग को नोएडा प्राधिकरण के निलंबित इंजीनियर इन चीफ यादव सिंह के घर मिली अकूत संपत्ति का मामला भी सुर्खियों में रहा. यादव सिंह की काली कमाई की सीबीआई जांच की मांग उठ रही है.

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Web Title: 2014: UP Politics
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