सोनिया-राहुल के पीछे चाणक्य कौन?

who are behind on sonia and rahul?

क्या जिंदगी की बिडंबना है कि अपराधी जेल जाने से डरते हैं जबकि नेता जेल जाने से खुश होते हैं. अपराधी को मालूम है कि जेल जाने से उसका जीवन खराब हो जाएगा जबकि नेता को मालूम है कि जेल जाने से उसकी किस्मत सुधर जाएगी. नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी दो दिन पहले यही संकेत दे रहे थे कि वो बेल नहीं लेंगे बल्कि जेल जाने को तैयार हैं. इतिहास गवाह है कि जेल जाने से नेताओं की तकदीर खुलती है. 1975 के इमरजेंसी में जेल जाने वाले अधिकतर नेताओं का सितारा बुलंद हो गया था वहीं 1977 जनता पार्टी की सरकार आने के बाद इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया गया था तो 1980 में जनता पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया और तो भ्रष्ट्राचार के मामले में लालू यादव के जेल जाने से उनकी भी किस्मत चमक गई. हाल के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव और नीतीश कुमार की जोड़ी ने मोदी का सूपड़ा साफ कर दिया.

 

गुजरात में हार्दिक पटेल भी पटेलों के आरक्षण की मांग को लेकर जेल गये हालांकि उनपर देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है. हाल में भी हार्दिक पटेल की वजह से बीजेपी ग्रामीण गुजरात में स्थानीय चुनाव हार गई. बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद कांग्रेस का हौंसला काफी बुलंद हो गया है. अब कांग्रेस को लगने लगा है कि मोदी की लहर खत्म हो गई है इसीलिए अब कांग्रेस रोज रोज नई राजनीति चल रही है और ये राजनीति सोनिया और राहुल नहीं बल्कि चाणक्य के इशारे पर खेली जा रही है. आखिरकार शुक्रवार को ही कांग्रेस ने खुलासा किया कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी कोर्ट के निर्देश का सम्मान करेगी यानि बेल लेंगे. यही हुआ दोनों को पचास-पचास हजार के निजी मुचलके पर जमानत मिल गई लेकिन कांग्रेस ने अदालती मामले को खूब भुनाने की कोशिश की. नेता से पार्टी कार्यकर्ता सोनिया-राहुल के समर्थन में सड़क पर उतर गये यानि पार्टी को इसी बहाने ऊर्जा मिली.

 

कहां से मिल रही है सोनिया-राहुल को शक्ति?
कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अपने शीर्ष नेतृत्व के प्रति अपना प्यार और समर्थन जताया. देश के दूसरे हिस्सों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पक्ष में प्रदर्शन किया . साथ ही मोदी सरकार के प्रति गुस्सा और नफरत का इजहार किया. दरअसल ये समझने लायक है कि लोकसभा चुनाव के दौरान देश में कांग्रेस के शमियाने में हर जगह छेद दिखाई पड़ रहे थे. न तो उस समय सोनिया की रणनीति काम कर रही थी न ही राहुल गांधी की बुद्धि. 2014 के लोकसभा चुनाव में लगभग हर राज्य से कांग्रेस के तंबू उखड़ गये थे तो वहीं पार्टी की सारी नीति, बुद्धि और शक्ति धाराशाई हो गई थी. ऐसा कहा जाने लगा कि 44 सीट हासिल करके पार्टी रसातल में चली गई. अब अचानक कांग्रेस पार्टी में कैसे शक्ति आ गई और कैसे हौसले बुलंद हो गये. मामला तो कोर्ट का है इस कानूनी दांवपेंच से निपटा जा सकता है लेकिन बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर नेशनल हेराल्ड के मुद्दे पर बवाल मचा दिया गया. कांग्रेस कानूनी लड़ाई को राजनीति लड़ाई में बदलने की कोशिश की. दरअसल देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 9 सितंबर 1938 को लखनऊ में द नेशनल हेरल्ड अखबार की शुरुआत की थी. नेशनल हेरल्ड अखबार को चलानेवाली कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड पर 90 करोड़ का कर्ज चढ़ गया था और इस कर्ज की वजह से अखबार को बंद करना पड़ा. इसी कंपनी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कंपनी यंग इंडियन को एसोसिएटेड जर्नल्स की संपत्ति का मालिकाना हक मिल गया.इसी सौदे को आधार बनाकर सुब्रमण्यम स्वामी ने साल 2012 में सोनिया और राहुल गांधी के खिलाफ धोखाधड़ी और दूसरे मामलों के तहत कोर्ट में याचिका दायर की. इसी मामले में मां बेटे कोर्ट में हाजिर नहीं हुए तो कांग्रेस पार्टी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन राहत नहीं मिली और और दोनों को कोर्ट में हाजिर होना पड़ा.

 

स्वामी की वजह से कांग्रेस को मौका मिल गया कि और पार्टी आरोप लगाने लगी कि पूरी कहानी के पीछे मोदी का हाथ है. मोदी की सरकार कांग्रेस नेताओं के खिलाफ बदले की भावना से काम कर रही है. जो सोनिया इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद पर नहीं देखना चाहती थीं और यही नहीं सोनिया ने राहुल को कहा था कि सत्ता जहर है . नटवर सिंह की बात माने तो राहुल गांधी 2004 में सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था उन्हें डर था कि अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनती है तो उनकी भी हत्या हो सकती है. वही सोनिया अब कह रही हैं कि वो इंदिरा गांधी की बहू हैं और वो किसी से डरती नहीं है. वहीं राहुल कह रहें हैं पीएमओ के इशारे पर कार्रवाई हो रही है . इसी को बहाना बनाकर कांग्रेस पार्टी संसद नहीं चलने दे रही है. इसका मुख्य मकसद जीएसटी बिल पर अड़गा लगाना ताकि विकास की गति रूक जाए और आने वाले लोकसभा चुनाव में मोदी टांय टांय फिस्स हो जाए. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कांग्रेस अपने बलबूत पर ये रणनीति तय नहीं कर रही है बल्कि किसी कंपनी को को हायर किया है जो कांग्रेस को सलाह दे रही है.

 

ये प्रशांत किशोर भी हो सकते हैं या दूसरी कंपनियां भी हो सकती है. दरअसल चुनाव जीतना-हारना, नेता को ऊपर उठाना और नीचे गिराना रणनीति का हिस्सा हो गया है. ये रणनीति बनाने का काम मार्केटिंग कंपनियां बखूबी से कर रही है. कांग्रेस की ताजा रणनीति बयां कर रही है कि कांग्रेस की राजनीति और रणनीति के पीछे किसी चाणक्य का हाथ है. ऐसे में मोदी के लिए और समस्या खड़ी हो गई है. अगर मोदी संभल कर राजनीति नहीं करते हैं तो उनका 10 साल तक पीएम बनने का सपना शायद सपना ही बनकर रह जाए.

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