पहले भारतीय रेलवे अपनी ज़मीन तो छुड़ा ले!

indian railway

देश के रेलमंत्री सुरेश प्रभु का मुझ जैसे रेलयात्री के पास सचमुच एक ई-मेल आया है, जो जंक फोल्डर में पड़ा था. (हँस रहा हूं क्योंकि यह सरकारी व सार्वजनिक मेल था जो हर ई-मेल चोंच और पेट रखने वाले के पास पहुंचा होगा ). प्रभु जी ने उसमें दावा किया है कि पीएम मोदी साहब के आशीर्वाद से इस रेल बजट में जो भी घोषणाएं उन्होंने की थीं उन्हें क्रियान्वित करने के लिए बिंदुवार विभाजित कर लिया गया है; साथ ही साथ परियोजनाओं की प्रगति पर नियमित नज़र रखी जा रही है. उन्हें यह सूचित करते हुए हर्ष भी हो गया है कि बजट की घोषणाओं में से 103 घोषणाएं अमल में लाई भी जा चुकी हैं. मज़े की बात यह है कि इन्हीं रेलवे प्रभु ने पूरक प्रश्नों का उत्तर देते हुए लोकसभा में 16 मार्च, 2015 को स्वीकार किया था कि पिछले वर्ष यानी 2014 की समाप्ति तक रेलवे की 930 हेक्टेयर ज़मीन लोग दबाकर बैठे हुए थे. हालांकि इस नुक़्ते पर सरकार से भी कहीं ज़्यादा जागरूक लोगों का आंकड़ा कहता है कि पूरे देश में रेलवे की 1999 हेक्टेयर ज़मीन पर अतिक्रमण हो चुका है. अपनी रियाया के इनबॉक्स में पहुंचे ई-मेल में रेलमंत्री इस मुद्दे पर ख़ामोश हैं.

 

सरकारों के आंकड़ेबाज़ अपनी चमड़ी बचाने के लिए नुकसान पहुंचाने वाली चीज़ों के नतीज़े इस अंदाज़ में पेश किया करते हैं जैसे वह नगण्य-सी बात हो… और अपनी उपलब्धि का ढिंढोरा पीटना हो तो वही नगण्य-सा आंकड़ा हिमालय बना दिया जाता है. सो रेलमंत्री के कारिंदों ने कहा कि चूंकि भारतीय रेलवे के पास 4 लाख 58 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन उपलब्ध है इसलिए यह आंकड़ा (930 हेक्टेयर वाला) महज 0.20 प्रतिशत ही है. हम जागरूक लोगों का आंकड़ा लें तब भी यह 0.50 प्रतिशत से ऊपर नहीं जाता, जो वाक़ई बेहद मामूली नज़र आता है. अपने कारिंदों द्वारा बताया गया यह आंकड़ा भी रेलमंत्री ने लोकसभा को बताया था कि पूरे भारतवर्ष में लगभग 0.47 प्रतिशत ज़मीन पटरी के अगल-बगल संकरी पट्टियों की शक़्ल में ख़ाली पड़ी रहती है, जो पटरियों, पुलों और अन्य ढांचागत मरम्मत के काम आती है. यानी यह रेलवे की वह ज़मीन है जो हम रेल से सफर करते वक़्त नदियां, जंगल, पहाड़, अपने प्यारे शहर और गांव फलांगते हुए पूरे देश में पार करते जाते हैं. दोनों आंकड़ों की तुलना करें तो साफ ज़ाहिर है कि जितनी जगह पूरे देश में रेल की सेहत का मर्सिया पढ़ने में लगती है, लगभग उतनी ही जगह पर अवैध कब्ज़ा हो चुका है. गौरतलब यह है कि यह अवैध कब्ज़ा जंगलों और पहाड़ों की पटरियों पर नहीं, नगरों और महानगरों में हुआ है और निसदिन हो रहा है. यहां हम इसके आर्थिक और समाजशास्त्रीय विवेचन पर नहीं जाएंगे.

 

भीषण ठंड अथवा निष्ठुर गर्मी की रुत ही नहीं; किसी भी मौसम में लोगों को बेघर किया जाना अमानवीय कर्म है. इस पर चम्बल नदी में बचे-खुचे घड़ियाल भी आंसू नहीं बहाते. लेकिन नेता बहाते हैं! पहले वे लोगों को वोट बैंक की शक्ल में आबाद करते हैं, नगर अथवा महानगरपालिका का सम्पत्ति कर भरे जाने वाली रसीद मुहैया कराते हैं, बिजली के कनेक्शन नियमित करवाते हैं, पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं; यहां तक कि लाल-हरे और नीले-पीले राशन कार्ड भी बनवा डालते हैं! …और फिर इन मुफ़लिसों पर मुसीबतों का पहाड़ टूटते ही किसी भी मौसम में बरबाद हो जाने के लिए लावारिस छोड़ देते हैं. मुंबई में साल-दर-साल ऐन घनघोर बारिश के बीच पटरियों के किनारे की झोपड़पट्टियों का उजाड़ दिया जाना समाचार बनता रहता है और बारहों महीने झुग्गियां रेल की पटरियों के किनारे खड़ी होती रहती हैं. दिल्ली की सर्दी में उजाड़ने का ताज़ा उदाहरण है शकूर बस्ती.

 

रेलवे के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो अकेले दिल्ली में 60 हेक्टेयर ज़मीन अतिक्रमण का शिकार हो चुकी है, जिसमें आबाद करीब 47000 झुग्गियों की वजह से रेलवे की 260 करोड़ की परियोजनाएं अधर में लटक गई हैं. दिल्ली में 60 हेक्टेयर ज़मीन का क्या मतलब होता है, इसका अंदाज़ा कोई अफसोस से भरा बिल्डर ही लगा सकता है. अब अगर शकूर बस्ती की बात करें तो रेलवे का कहना यह है कि अकेले इस बस्ती की वजह से 110 करोड़ रुपए का रेल टर्मिनल प्रभावित हुआ है. रेलवे का दूसरा दावा यह है कि अगर वे दया बस्ती की अमर पार्क कॉलोनी और लॉरेंस रोड इलाक़े का अतिक्रमण हटा पाते तो भटिंडा की रेल पटरी अम्बाला जाने वाली पटरी से जुड़ जाती. यह ग्रेड सेपरेटर परियोजना भी 156 करोड़ की है!

 

रेलवे की ज़मीन पर हर राज्य में अतिक्रमण है. सरकारी आंकड़ों पर कौन भरोसा करता है? लेकिन रेल मंत्रालय ही पर भरोसा करें तो उत्तर रेलवे की 210 हेक्टेयर ज़मीन अतिक्रमित हो चुकी है. दक्षिण-पूर्व रेलवे की 159 हेक्टेयर ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा है. अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अन्य रेल-मंडलों में कैसी स्थिति होगी. आज भी रेलवे इतनी ताक़त नहीं जुटा पाई है कि वह अपनी ही ज़मीन से अवैध कब्ज़ा करने वालों को पूरी तरह बेदख़ल कर सके. वैसे तो भारत में अपनी शुरुआत से लेकर आज तक के 162 वर्षों ने रेलवे ने काफी तरक्की की है. आज उसकी पटरियों की लंबाई 65436 किमी को छू रही है. इन पटरियों पर 7172 रेल स्टेशन बने हुए हैं. आज रेलवे के पास 2 लाख 40 हज़ार माल डिब्बे हैं, करीब 63 हज़ार यात्री डिब्बे हैं, 9 हज़ार से अधिक संख्या रेल इंजिनों की है. इस पूरे उपक्रम को संचालित करने में लगभग 13 लाख कर्मचारी जुटे रहते हैं. वर्ष 2014-15 के दौरान 840 करोड़ लोगों ने भारतीय रेलों में सफर किया है. लेकिन शहरों के बीचोंबीच हुए अवैध कब्ज़े सारे किए कराए पर पानी फेर देते हैं. ट्रेनें बचते बचाते इस अंदाज़ में प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ती हैं जैसे कोई नई-नवेली दुल्हन जा रही हो.

 

भारतीय रेलवे के पास अपार सम्पदा है. लेकिन रियाया से करोड़ों रुपए का यात्री और माल भाड़ा वसूलने वाले रेलवे के क्षेत्रीय और मंडलों के अधिकारियों के पास प्रशिक्षित कर्मचारी मौजूद नहीं हैं जो अतिक्रमण करने वालों पर कोई कार्रवाई कर सकें. रेल मंत्रालय देश भर में पिछले तीन वर्षों में अपनी मात्र 112 हेक्टेयर ज़मीन मुक्त करवा पाया है. दिल्ली में 2003 और 2005 के बीच रेलवे ने दिल्ली सरकार को 4410 झुग्गियां हटाने के लिए 11.25 करोड़ रुपए दिए थे. लेकिन आज की तारीख में डीयूएस आईबी मात्र 297 झुग्गियां ही हटा पाया है. दिल्ली में लगभग 70 किमी रेल पटरी दोनों तरफ से अतिक्रमण का शिकार है. लेकिन रेलवे इसका कुछ बिगाड़ नहीं पाती. जब अवैध कब्ज़ा होता है तब रेल प्रशासन सोता रहता है.

 

मुझे एक पुरानी घटना याद आती है:- एमपी में उज्जैन-आगर नैरो गेज बंद होने के 32 साल बाद भी रेलवे प्रशासन अपनी 159.901 हेक्टेयर ज़मीन एमपी सरकार से समय से वापस लेने में महज इसलिए नाकामयाब हो गया था कि वह उसे अपनी मिल्कियत ही साबित नहीं कर पाया था. रेल अधिकारियों की अजगरी के देश में ऐसे कितने मामले न होंगे! सबकी आंख का तारा बनने की कोशिश करने वाली और अपनी आमदनी का 90 पैसा तनख्वाह और मरम्मत में ख़र्च करने वाली अंग्रेज़ों के ज़माने की हमारी भारतीय रेलवे अतिक्रमण हटाने की दिशा में सक्रिय नज़र नहीं आती. ऐसे में हमारे ईमानदार छवि वाले प्रभु जी को पता करना चाहिए कि रेलवे की मिल्कियत छुड़ाने के लिए कहां-कहां माथा टकराना होगा!

India News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: indian railway
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017