एसोचैम ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर दिये श्रम कानूनों में बदलाव के सुझाव

By: | Last Updated: Monday, 28 July 2014 8:22 AM
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लखनउ: उद्योग मंडल एसोचैम ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर कामगारों और उद्योगों के परस्पर हितों को नये परिप्रेक्ष्य में संरक्षित करने के लिये राज्य के श्रमकानूनों में बदलाव करने के सुझाव दिये हैं.

 

एसोचैम के महासचिव डी. एस. रावत ने मुख्यमंत्री को हाल में लिखे पत्र में कहा है कि उद्योग मंडल की औद्योगिक विकास परिषद ने राज्य के श्रम कानूनों को कामगारों और नियोजकों दोनों के लिये ही और बेहतर बनाने के लिये उनमें कुछ बदलावों की जरूरत महसूस की है. अगर सरकार इन संशोधनों को अमल में लाये तो इससे दोनों पक्षों को फायदा होगा.

 

रावत ने पत्र में ‘इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट 1947’ के अनुच्छेद 2 (जे) में बदलाव के तहत ‘उद्योग’ की परिभाषा में किये गये बदलाव को अधिसूचित करने, अनुच्छेद 2 (ए) में बदलाव करके 20 हजार रुपये से ज्यादा वेतन पाने वाले तकनीकी कर्मियों और सुपरवाइजर को ‘कामगार’ की श्रेणी से बाहर करने, शिकायतों के निस्तारण के लिये अनुच्छेद 9 (सी) को बिना वक्त गंवाए अधिसूचित करने और तीन साल से ज्यादा समय बाद किये गये दावों पर विचार नहीं करने के सुझाव दिये हैं.

 

उन्होंने पत्र में फैक्ट्री की परिभाषा में संशोधन के जरिये लघु उद्योगों को उसके दायरे से बाहर लाने पर जोर देते हुए ओवरटाइम के बदले पारिश्रमिक के बजाय अतिरिक्त छुट्टी देने का सुझाव भी रखा है.

 

रावत ने कहा कि 40, 50 और 70 के दशक के अनेक कानून आज भी लागू हैं जो आज के परिदृश्य में अप्रासंगिक हो चुके हैं. उनमें बदलाव करना समय की मांग है. एसोचैम ने सरकार को सुझाव दिया है कि इन कानूनों में कुछ जरूरी संशोधन करके उन्हें मौजूदा हालात के अनुरूप बनाये.

 

इस बात का ख्याल जरूर रखा जाए कि इससे कर्मचारियों के हित भी प्रभावित नहीं हों और उद्योगों के लिये भी स्थितियां सहज बनें. उनका कहना है कि इन इकाइयों के पास बड़े पैमाने पर आपूर्ति के ऑर्डर आते हैं जिन्हें बहुत कम समय में पूरा करना पड़ता है.

 

ऐसे में उन्हें कर्मचारियों के कार्यो के घंटों में ज्यादा लचीलापन की जरूरत होती है, जो धारा 51, 52, 54 और 56 के लागू रहते अक्सर मुमकिन नहीं होता.

 

एसोचैम महासचिव ने पत्र में कहा है कि आज के युग में अनेक श्रम संगठनों की सक्रियता के कारण उद्योगों को कर्मचारियों के अलग-अलग वर्गों के असहयोग का सामना करना पड़ता है. ऐसे में ‘एक उद्योग, एक यूनियन’ के फार्मूले की जरूरत है. इसके लिये ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 में समुचित बदलाव किये जाने चाहिये.

 

रावत ने बोनस भुगतान अधिनियम 1965 में बदलाव का सुझाव देते हुए बोनस और उत्पादकता के बीच सीधा सम्बन्ध बनाने को कहा है ताकि कर्मचारी ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करने के लिये प्रेरित हों. पत्र में घाटे में चल रही इकाइयों को बोनस भुगतान की मजबूरी से मुक्त करने के लिये कानून में संशोधन का सुझाव भी दिया गया है.

 

उन्होंने पत्र में कहा है कि आजकल ऐसी इकाइयां भी हैं जहां मौसम के मुताबिक काम होता है. उनके लिये स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति करना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे में औद्योगिक नियोजन अधिनियम 1946 में ‘निश्चित अवधि के लिये अनुबंध पर नियुक्ति’ के प्रावधान को भी जोड़ा जाना चाहिये.

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