पंगेबाज़ों का सोशल एक्सपेरिमेंट: अगर दिखता है तो इग्नोर कैसे कर सकते हैं?!

By: | Last Updated: Friday, 18 April 2014 8:48 AM
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दिल्ली: क्या भारत के आठ राज्य चीन/नेपाल का हिस्सा हैं? क्या रेसिज़्म सच में एक समस्या है? नीड़ो तनियम याद है आपको? हां? जिनको नहीं याद उन्हें बताते चलें कि नीड़ो अरुणाचल प्रदेश का एक लड़का था. इस राज्य की राजधानी ईंटानगर है. वैसे तो भारत में किसी विधायक के बेटे को हाथ लगाना अपनी जान को ख़तरे में डालना है पर अरुणाचल के एक विधायक के बेटे नीडो को पीट-पीट कर मार दिया गया. विवाद सिर्फ़ इतनी सी बात से शुरु हुआ था की नीडो के बालों का रंग बहुतायत आबादी की तरह काला नही बल्कि किसी और रंग का है.

 

असरे बाद एक चीज़ में सुधार आया की देश के बाकी हिस्सों में तो नहीं पर देश की राजधानी दिल्ली में उत्तर पूर्व (नार्थ इस्ट) के लोगों के साथ भेदभाव और अत्याचार की ख़बरों को मीडिया ने प्रमुखता से उठाना शुरु किया. जिसमें मणिपुर की एक लड़की का उसके मकान मालिक के लड़के द्वारा रेप से लेकर दिल्ली के मुनिरका इलाके की पंचायत का वो तुगलकी फ़रमान तक शामिल था जिसमें तय किया गया था की आत्याचार के ख़िलाफ़ तेज़ी से उठ रही आवाज़ो और मीडिया में उनको मिल रही कवरेज की वजह से उत्तर पूर्व वालों को मकान ही किराए पर ना दिया जाए.

 

बावजूद इन तमाम घटनाओं और कवरेज के उत्तर पूर्व वालों के साथ जो रवैया लोगों का था, जस का तस है. पहले एक बात थी की मीडिया ऐसे मुद्दों को नहीं उठाती पर अब तो मीडिया ने भी ऐसे मुद्दों की कवरेज की. तो दिक्कत कैसे दूर हो? आपको 16 दिसम्बर का निर्भया मामला याद होगा. ख़बर थी की बलात्कार के बाद जब निर्भया और उसके साथी को सड़क पर नंगा फ़ेक दिया गया था तो सड़क से गुज़र रहे किसी ने उनकी सुध तक नहीं ली और बड़ी देर तक वो सड़क के किनारे युं ही घायल और नग्न अवस्था में पड़े रहे. जब पुलिस आई तब अपनी गाड़ी का पर्दा निकालकर उन्हें दिया जिससे वो अपना शरीर ढ़क सकें.

 

समाज की एक ख़ूबसूरती ये है की इसे दिक्कत का पता होता है. कई चीज़े तो समाज के नाक के नीचे हो रही होती हैं. समाज इनके ख़िलाफ़ चीखता-चिल्लाता भी है पर जैसे ही एक्शन लेने का मौका मिलता है, समाज नज़रें चुराकर निकल लेता है. पर इस नियाम का अपवाद भी है. अपवाद नज़रें नहीं चुराता बल्कि आंखों में आंखें डालकर दिक्कत का मुकाबला करता है. कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत को एक बताने से पहले हमें ये मानना होगा की दक्षिण भारत के लोग श्रीलंकाई नहीं, कश्मीर के लोग पाकिस्तानी नहीं और नार्थ इस्ट के आठ राज्यों के लोग ना तो चीनी हैं और ना नेपाली.

 

ये बात माननी होगी, मनवानी होगी और जब कभी ऐसी ज़रूरत आन पड़े तो आंख चुराने के बजाए कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना होगा. सिर्फ़ समस्याओं पर माथा पीटने और गाल बजाने से कुछ नहीं होगा. ऐसा ही संदेश देते हुए सोशल एक्सपेरिमेंट को आधार बनाकर ट्रबल सीकर टीम (पंगा लेने वाली टीम) ने तैयार किया है इस वीडियो को देखें और तय करें की आप किस तरफ़ हैं आंखें चुराने वालों की तरफ़ या कंधे से कंधा मिलाने वालों की तरफ़?