योगेंद्र यादव-प्रशांत भूषण विवाद से आप पर पड़ी चंदे की चोट, मार्च में मिला सिर्फ 45 लाख चंदा

By: | Last Updated: Wednesday, 1 April 2015 5:08 AM
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नई दिल्ली: झगड़े के बीच आम आदमी पार्टी के चंदे में जबर्दस्त कमी आई है. पार्टी को हर महीने मिलने वाले चंदे के आंकड़ों को देखने से ये पता चलता है कि झगड़े से चंदे का भी नुकसान हो रहा है.

 

पिछले साल मार्च में आम आदमी पार्टी को 9 करोड़ रुपए का चंदा मिला था जबकि जून में 34 लाख 53 हजार का चंदा मिला. वहीं जुलाई में 56 लाख 17 हजार चंदा मिला. पिछले साल अक्टूबर में 9 लाख 97 हजार का चंदा मिला.

 

इस साल जब पार्टी ने दिल्ली चुनाव के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी तब जनवरी के महीने में सबसे ज्यादा 12 करोड़ का चंदा मिला था. फरवरी में पार्टी 5 करोड़ का चंदा जुटाने में कामयाब रही लेकिन पिछले महीने जब पार्टी का झगड़ा खुलकर सामने आया तो चंदे में भी भारी गिरवाट दिखी.

 

पिछले महीने पार्टी को 45 लाख 43 हजार चंदा मिला. एक दिलचस्प आंकड़ा पिछले 26 मार्च का है जिस दिन योगेंद्र गुट और केजरीवाल खेमे के बीच सुलह की आखिरी कोशिश फेल हो गई थी. इस दिन पार्टी को सिर्फ 264 रुपये चंदा मिला था.

 

क्या हो रहा है आम आदमी पार्टी में?

केजरीवाल भले कह रहे हों कि पार्टी ठीक चल रही है लेकिन क्या यही सच है? महाराष्ट्र में मयंक गांधी और अंजलि दमानिया के बाद महाराष्ट्र आप के अध्यक्ष सुभाष वारे के भी सुर बागी हो गए हैं.

 

पुणे में  बैठक के बाद महाराष्ट्र आप अध्यक्ष ने केजरीवाल को ईमेल भेजा है और लिखा है कि पार्टी की विश्वसनीयता औऱ विश्वास पर और दाग लगने से पहले शॉर्ट आउट और गेट आउट कीजिए. राज्य कार्यकारिणी समिति की बैठक में लिए गए फैसलों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. इस बारे में शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की जाएगी. दावा ये किया गया है कि सदस्य इस बात पर सहमत हैं कि जो हो रहा है वो पार्टी सिद्धांतों के खिलाफ है. पार्टी ने अगर नहीं सुनी तो बाकी पार्टियों और आप में कोई फर्क नहीं रह जाएगा.

 

पार्टी के बड़े नेताओं ने जानबूझकर विवाद पैदा किया है. प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, रामदास जैसे नेताओं को निकालने को लेकर महाराष्ट्र आप में नाराजगी है.  जिस बैठक में इतने कड़े सुर उभरे हैं उसमें मयंक गांधी तो थे ही, मीरा सान्याल भी मौजूद थीं. ज्यादातर वो लोग बैठक में शामिल थे जो आप की राष्ट्रीय परिषद की उस बैठक में मौजूद थे जिसमें प्रशांत-योगेंद्र को कार्यकारिणी से निकालने का फैसला हुआ था.

 

आपको बता दें कि महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने की मांग उठ रही है लेकिन पार्टी ने कोई फैसला न लेते हुए ये फैसला लिया है कि कुमार विश्वास महाराष्ट्र के मामले देखेंगे. कहीं ये इसी का असर तो नहीं है? 

 

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