MUST READ  | कैसा रहा राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का राजनीतिक जीवन

By: | Last Updated: Tuesday, 28 July 2015 1:27 AM
Abdul Kalam’s political carrier

(Photo: AFP)

नई दिल्ली: अवुल पकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम भारत के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपतियों में से एक थे. उन्होंने 25 जुलाई 2002 को भारत के 11वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली थी. वो 2007 तक  राष्ट्रपति रहे.

किसी ने इसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) का गुजरात दंगों के बाद उठाया गया कदम माना तो किसी को यह चिंता सता रही थी कि कहीं कलाम एनडीए की रबर स्टैंप न बन जाए.

 

अख़बार उनके फ़िल्मी सितारों जैसे बालों पर टिप्पणियाँ कर रहे थे तो आम जनता आश्चर्यचकित थी. उस वक्त पूरा भारत गुजरात दंगो से चर्चा में था. हिन्दू और मुसलमान के बीच बढ़ते दायरे और आने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया.

 

इन्हें भारतीय जनता पार्टी समर्थित एन॰डी॰ए॰ घटक दलों ने अपना उम्मीदवार बनाया था जिसका वामदलों के अलावा समस्त दलों ने समर्थन किया. 18 जुलाई 2002 को डॉक्टर कलाम को नब्बे प्रतिशत बहुमत द्वारा ‘भारत का राष्ट्रपति’ चुना गया था और इन्हें 25 जुलाई 2002 को संसद भवन के अशोक कक्ष में राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई. इस संक्षिप्त समारोह में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य तथा अधिकारीगण उपस्थित थे. इनका कार्याकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ

 

यूं तो डॉक्टर अब्दुल कलाम राजनीतिक क्षेत्र के व्यक्ति नहीं थे लेकिन राष्ट्रवादी सोच और राष्ट्रपति बनने के बाद भारत की कल्याण संबंधी नीतियों के कारण इन्हें कुछ हद तक राजनीतिक दृष्टि से सम्पन्न माना गया.

 

अपना कार्यकाल खत्म करने के बाद उन्होंने दोबारा चुनाव न लड़ने का फैसला किया और जाते-जाते पत्रकार वार्ता में एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था, “मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ. मैं भारत के एक अरब लोगों के साथ ही रहूँगा.”

 

राष्ट्रपति बनने से पहले राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी

राष्ट्रपति बनने से पहले अब्दुल कलाम का राजनीति से कोई लेना देना नहीं था. भारत में मिसाइल टेक्नॉलॉजी के जनक रहे कलाम का राष्ट्रपति पद के लिए नाम भारतीय जनता पार्टी ने पेश किया था. समाजवादी पार्टी और एनसीपी ने भी बीजेपी के प्रस्ताव का समर्थन किया. इसके बाद के आर नारायणन ने राष्ट्रपति पद की रेस से अपना नाम वापस ले लिया था. कलाम के नामांकन के दिन खुद उस वक्त प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी उनके साथ गए थे. उन्हें ऐसा समर्थन मिला कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में उन्हें एकतरफा जीत मिली.

 

बतौर राष्ट्रपति उन्होंने अपने कार्यकाल में ग्रामीण इलाकों में शहरी व्यवस्था की जरूरत पर काफी जोर दिया. उनके इस आइडिया को सरकारों का समर्थन भी मिला. पढ़ाई लिखाई के क्षेत्र को बढ़ावा देने पर भी उनका काफी जोर रहा. यही वजह है कि उन्हें ‘पीपल्स प्रेसिडेंट’ भी कहा गया.

 

एक राजनीतिक व्यक्ति न होने की वजह से कई बार उन्हें कई मौके पर दिक्कत भी पेश हुई. 2015 में आई उनकी किताब Transcendence: My Spiritual Experiences with Pramukh Maharaj में अब्दुल कलाम ने लिखा कि 2006 की ऑफिस ऑफ प्रॉफिट विवाद पर फैसला लेना उनके कार्यकाल का सबसे मुश्किल फैसला रहा. उन्होंने  उस घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि ‘जब हितों के टकराव से जुड़ा संसदीय बिल उनके पास आया तो वो इस द्वंद में थे कि बिल पर साइन करें या फिर इस्तीफा दे दें.’

 

बतौर राष्ट्रपति उनका कार्यकाल भी आलोचनाओं के दायरे से बाहर नहीं रहा. बतौर राष्ट्रपति उनके पास फांसी की सजा पानेवाले 21 लोगो की दया याचिका आई लेकिन वो 20 याचिकाओं पर अपने पूरे कार्यकाल के दौरान कोई फैसला नहीं ले पाए. सिर्फ एक धनंजय चटर्जी की फांसी को ही उन्होंने स्वीकृति दी. इस बात को लेकर उनकी काफी आलोचना हुई.

 

विवादों में भी आए

विवादों से भी अब्दुल कलाम का थोड़ा बहुत नाता रहा. अपनी किताब Transcendence: My Spiritual Experiences with Pramukh Maharaj में उन्होंने 2002 में अपने गुजरात दौरे का भी जिक्र किया. उन्होंने लिखा कि ‘बतौर राष्ट्रपति मैं गुजरात जाना चाहता थे. लेकिन प्रधानमंत्री वाजपेयी इस फैसले से थोड़े परेशान थे. उन्होंने पूछा कि क्या आपको इस वक्त गुजरात जाना जरूरी लगता है. इस पर मैंने कहा कि एक राष्ट्रपति होने के नाते मुझे जाकर लोगों से मिलना चाहिए औऱ उनसे बात करनी चाहिए. मैं इसे अपना सबसे पहला काम मानता हूं.’

 

वो लिखते हैं कि उन्हें ऐसी आशंका थी कि उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उनके साथ नहीं जाएंगे. लेकिन मोदी और उनके कैबिनेट के साथी हालांकि उनके साथ गए.

 

जब 2007 में उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्होंने फिर से राष्ट्रपति पद लेने में दिलचस्पी दिखाई लेकिन लेफ्ट पार्टियों और यूपीए ने उनका समर्थन नहीं किया. सर्वसम्मति न होने की वजह से उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया. उनके पद छोड़ने के बाद प्रतिभा पाटिल भारत की राष्ट्रपति बनीं.

 

कैसा रहा पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का राजनीतिक जीवन 

 

2012 में प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल खत्म होने के बाद राष्ट्रपति पद के लिए एक बार फिर से उनका नाम उछला. बीजेपी ने कहा कि अगर तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस अगर उनका समर्थन करती है तो वो भी राष्ट्रपति पद के लिए उनका समर्थन करेंगे. लेकिन काफी रस्साकशी के बाद ममता के अलावा उनका किसी ने समर्थन नहीं किया. आखिरकार कलाम ने ऐलान कर दिया कि वो राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल नहीं होंगे.

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