एबीपी न्यूज स्पेशल : सूखे की दिल दहलाने वाली कहानी

By: | Last Updated: Thursday, 12 March 2015 3:57 PM
abp news special

महाराष्ट्र: एक तरफ दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार मुफ्त में 20 हजार लीटर पानी दे रही है, लेकिन दूसरी तरफ महाराष्ट्र के मराठवाडा इलाके में लोग पीने के पानी के लिए जुझ रहे हैं. मराठवाडा में एक बार फिर सूखे ने दस्तक दे दी है. गर्मी के शुरुवाती दिनो में ही इन लोगों की हालत बदतर होती जा रही हैं. इस इलाके में रोजाना करीब दो किसान आत्महत्या कर रहे है.  

 

सुखे के इस दर्द को समझने के लिए किसी भाषा की जरुरत नही है.

 

एबीपी न्यूज की पड़ताल

 

एक तो पीने के पानी की किल्लत और ऊपर से लोडशेडींग का खामियाजा भुगतता है गांव. ये गांव है लातूर जिले का मासुर्डी. कम बारिश की वजह से यहां पिछले साल से पीने का पानी टैंकर से मुहैया किया जा रहा है. रात रातभर जागता है ये गांव. एक तो रातको टैंकर का इंतजार और फिर पानी मिले इस लिए भागदौड.

 

पानी के बगैर तो घर का काम नही चल सकता, इस परेशानी से रुबरु होती है ये महिलाएं, इसलिए इनकी आवाज में दर्द और गुस्सा दोनो झलकता है. जिनको पानी मिला वो सब अंधेरे में इस पानी को घर तक पहूंचाने मे जुट जाते हैं. रात के अंधेरे में भी गांव जाग रहा होता है. ये तो बात हुई रात की अब दिनका हाल जानें.

 

पानी की किल्लत है इसलिए जहां टैंकर से पानी नहीं आता वहां लोग पानी की तलाश मे घुमते हैं. बीड जिले में गहुखेल के पास एक कुंआ है, जहां चार पांच बस्ती के लोग जान जोखिम मे डालकर पानी निकालते है.

 

पानी निकालते निकालते ऐसे ही एक लडकी कुंए मे गिर गई थी. और पानी भी इतना ही है की केवल 15 दिन तक चलेगा. फिर इस गांव को भी टैंकर का ही सहारा होगा. फिलहाल मराठवाडा में अलग अलग गांवो में 800 टैंकर से लोगो को पानी मुहैया किया जा रहा है.

 

लातूर के मानसिंग तांडा की रूक्मिणीबाई बताती हैं कि बिल्कुल पानी नही है, नीचे तंडा है वहां से लाते है पीने के लिए, हमारे सारे बच्चे काम के लिए गए .बस छोटे बच्चे रह गए है.

 

रूक्मिणीबाई करीब चार किलोमीटर दूर से पानी लाती है. रूक्मिणीबाई जैसी हालत कई बस्तियों मे दिखाई देती है, छोटे बच्चे और उनको संभालते बडे बुजुर्ग. इन बस्तियों में आपको जवान लोग नजर नही आएंगे.

 

नांदेड जिले मे कई ऐसी जगह है. हम जहां खडे है वहां आपको बच्चे बुजुर्ग घरों पर ताले नजर आते है..कहां गए है लोग. शहरों मे खुद के लिए ठिकाना नहीं मिलता तो बच्चों को कहां रखेंगे, इसलिए बच्चों को बुजुर्गों के हवाले गांव मे छोड दिया गया है. वैसा ही है धोंडाबाई का परिवार. तीन बेटे रोजगार के लिए गांव छोड़ चुके हैं और उनके चार बच्चों की देखभाल धोंडाबाई और उसका पति करता हैं.

 

अर्जुन तांडा नांदेड के धोंडाबाई राठोड के मुताबिक खेत मे कुछ नहीं हुआ इस साल . इसलिए बेटे पेट भरने चलने गए. धोंडाबाई के बेटे इन छह लोगों के लिए महिना 500 रुपया भेजते हैं, 200 रुपए मे ये परिवार सरकारी स्किम के तहत मिलनेवाला राशन लाता है. इस परिवार के लिए सबसे बडी चिंता है बिजली का बिल.

 

ऐसी कई छोटी बडी बस्तियां है, जहां से लोग सूखे की वजह से रोजगार की तलाश मे गांव छोडकर चले गए है, इन बस्तियों से हर साल गन्ना तोडने के लिए भी लाखों मजदूर जाते हैं, इस साल ये आंकडा बढ गया है. बीड जिले की बात करे तो पिछले साल करीब छह लाख मजदूर गन्ना तोडने के रोजगारी पर पश्चिम महाराष्ट्र गए थे, ये आंकडा इस साल बढकर साढे सात लाख हो गया है.

 

सूखे की वजह से एक तरफ छोटे किसान गांव छोडकर रोजगार की तलाश में शहर की तरफ जा रहे है, तो दूसरी तरफ ये देखिए जंगल. ये सुखाग्रस्त बीड इलाके में मोरो के लिए बनाया गया रिजर्व फॉरेस्ट है, सुख गया है, जंगल में पानी नहीं है इसलिए यहां के मोर अब गांव की तरफ आ रहे हैं.

 

सूखे ने किसी को नही बख्शा चाहे वो गरीब हो या अमीर. जहां एक तरफ गरीब किसान रोजगार के लिए मायग्रेट होने के लिए मजबूर है, वही अमीर किसान भी परेशान हैं, एबीपी न्यूज ने बड़े किसान रणजीत मिरकले से बात की, जिनके खेत मे एक वक्त मे 200 मजदूर काम करते थे.

 

रणजीत मिरकले बताते हैं कि मेरा 50 लाख का टर्नओवर था, मै लंदन मार्केट मे माल भेजता था, अब 5 लाख भी नहीं है. सूखे ने रणजीत जैसे अमीर किसान को भी तबाह कर दिया है.

 

किसानों के मन की बात 

मराठवाडा मे फिर एक बार 2012 के बाद सूखे ने आहट दे दी है, लेकिन 2012 के और इस सूखे में एक बहुत बडा फर्क है. लगातार सूखा और ओले गिरने की वजह से हुए नुकसान ने किसानो की कमर तोड दी है, जिसकी वजह से वो मौत को गले लगा रहे है.

 

ये तुलसीदास मंदवाड की तस्वीर है, इस जवान किसान ने सुखे और कर्ज के चलते आत्महत्या कर ली, ये है उसकी पत्नी और तीन बेटियां. इस किसान की आत्महत्या की कहानी सुनकर आपका दिल दहल जाएगा.

 

कोई किसान इस तरह से आत्महत्या कर सकता है आप सोच भी नही सकते . उसने दो वायर अपने पैरो मे लगाई और स्वीच ऑन कर दिया. तुलसीदास की तरह कई किसान इस तरह से मौत को गले लगा चुके है. महाराष्ट्र के किसानो के लिए सुखा और उससे पहले ओले गिरने से हुआ नुकसान जानलेवा बन गया है.

 

महाराष्ट्र में सरकार तो बदल गई लेकिन किसानो के हालात नहीं बदले,,एक वक्त सरकार को सूखे पर घेरने वाले अब खुद सरकार बन बैठे है. लेकिन इस साल 2015 में पिछले डेढ महिने मे 93 किसान आत्महत्या कर चुके है, यानी एक दिन में 2 किसान. ये आंकडा खुद ही किसानो की हालत बयां करता है.

1 जनवरी 2015 से 13 फरवरी तक

 

औरंगाबाद मे –9

जालना – 3

परभणी-1

हिंगोली- 4

नांदेड- 20

बीड- 26

लातुर- 12

और उस्मानाबाद मे- 18 किसान आत्महत्या कर चुके है.

पिछले पूरे साल में ये आंकडा 580 था.

 

ऐसा नहीं है कि सूखा मराठवाडा के लिए कोई बात है, दो साल पहले पडे भयानक सुखे में भी हमने पानी के लिए टैंकर की राह तकते गांव देखे थे, रोजगार के लिए विस्थापित हुए किसान देखे थे, वहीं तस्वीरें फिर एक बार डरा रही हैं, इस साल गर्मी के शुरुआती दिनों मे ये हाल है, अभी तो गर्मी के पूरे तीन महिने बाकी है.

 

सरकार के मुताबिक 23811 गांवो मे सुखे जैसी स्थिति है. इस साल कम बारिश की वजह से खरीफ की फसल बरबाद होने से करीब 90 लाख किसान सुखे से प्रभावित हूए है. जाहिर सी बात है कि इसका सीधा असर इस साल के कृषि उत्पाद पर होगा. सरकार ने अब तक 2000 करोड़ रुपए सुखे के लिए दिए है, और केंद्र से 4800 करोड़ की मांग की है, जो अब तक नहीं मिली है.

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