एबीपी न्यूज स्पेशल: टेम्स से सीखें, कैसे लाएंगे नदियों में 'रामराज्य'

By: | Last Updated: Saturday, 20 June 2015 4:29 PM
ABP NEWS Special ramrajya

एबीपी न्यूज की प्रसिद्ध सीरीज रामराज्य में हम आपको दुनिया भर से ऐसी व्यवस्थाओं के बारे में बता रहे हैं जिससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. अब देखिए क्यूबा ने क्या किया. हम जैसा विकासशील देश लेकिन वहां के हर नागरिक को मुफ्त इलाज की सुविधा है. फिनलैंड में 99 फिसद से ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं. जबकि वो एक पूंजीवादी देश है. पश्चिमी देश है. डेनमार्क ने अपने देश के करप्शन खत्म कर क्या कमाल किया है?

 

आज रामराज्य में नदी है. आज रामराज्य में लंदन, ग्रेट ब्रिटेन की कहानी पढ़िए. एक ऐसी नदी जो दो बार मर कर जिंदा हुई है. नदी है लंदन जितनी ही मशहूर टेम्स.  

 

टेम्स नदी के किनारे बना ब्रिटिश पार्लियामेंट. नदी के दूसरी तरफ है मशहूर लंदन आई. लंदन आई में बैठ कर आप पूरे शहर को देख सकते हैं. और इसी नदी पर बना है लंदन की पहचान लंदन ब्रिज. आज दुनिया में सबसे ज्यादा टूरिस्ट इसी शहर लंदन में आते हैं. और यहां आने वाले पर्यटकों का पहला ठीकाना होता है. टेम्स नदी का किनारा.    

 

टेम्स नदी के किनारे क्या रौनक है. क्या माहौल है. जहां देखिए वहां टूरिस्ट वहां लोग. वापस आईये दिल्ली में. और सोचिए आज से तकरीबन 100 -150 साल पहले इस दिल्ली शहर की हालत क्या रही होगी. और इस दिल्ली शहर से बहने वाली  अपनी यमुना की क्या हालत रही होगी. स्वच्छ ..निर्मल ..अपनी निर्बाध गति से बहती हुई नदी. 150 साल पहले टेम्स नदी की क्या हालत रही होगी?

 

आज से तकरीबन 150 साल पहले जब हमारे देश की नदियां निर्मल, स्वच्छ और सुंदर हुआ करती थीं तब इस नदी का पानी इतना बदबूदार था कि बदबू की वजह से ब्रिटेन की पार्लियामेंट की कार्रवाई को स्थगित करना पड़ा था. ये फिलहाल दुनिया की सबसे स्वच्छ नदियों में से एक है .

 

जिस टेम्स नदी को साल 2010 में सबसे साफ नदी होने का खिताब मिला. जिस नदी को साफ रखने के लिए ग्रेट ब्रिटेन को अवॉर्ड मिला उसकी हालत 1830 से 1880 के बीच ऐसी थी कि उसे गंदा नाला समझ लिया गया था. पानी इतना जहरीला की कोई पी ले तो मौत हो जाये. और ऐसा हुआ भी. साल था 1878. एक यात्री जहाज princess alice कोयला ढोने वाले जहाज, बाइवेल कासल से टकरा कर डूब गया . मरने वालों की संख्या 700 से उपर थी. इसे ब्रिटेन के इतिहास का सबसे बड़ा नाव हादसा माना जाता था. जब इस हादसे की जांच हुई तो पता चला कि मरने वालों में बहुत ऐसे थे जो डूबने से नहीं बल्कि नदी का जहरिला पानी पीने से मरे. इस बारे में लंदन की मशहूर पत्रिका दी टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा था.

 “…जब Bywell castle और Princess Alice की टक्कर में मरने वालों लोगों से जुड़ी बातें ही लोग सोच रहे थे तब हमने A PHARMACEUTICAL CHEMIST हेडिंग से एक चिट्टी छापी थी. जिसमें ये कहा गया था कि इतनी बड़ी संख्या में मरने की एक वजह जरुर वो जहरीला पानी रहा होगा जिसमें लोगों ने जान बचाने के लिए छलांग लगाई थी. अब जब हादसे से लोग उबर चुके हैं तो ये कारण और पक्का होता जा रहा है. डूबने से नहीं बल्कि जहरीले पानी से मौत की ये बात जांच के दौरान जो सबूत सामने आ रहे है उससे भी पुख्ता हो रही है.   

 

जब नाव डूबी तो बहुत सारे लोग डूबने से नहीं मरे. गंदे पानी को पीने से मर गये. वही टेम्स नदी आज जिंदा है. खूबसूरत है . एक ऐसी नदी जिसमें इतनी बदबू थी कि ब्रिटेन की पार्लियामेंट की बैठक को स्थगित करना पड़ा . आज पूरी दुनिया के लोग उसके आस पास घूम रहे हैं.  साफ पानी साफ नदी साफ वातावरण ये हमारी आपकी जरुरत है. रामराज्य की बुनियाद है. एक गंदे नाले में तब्दील हो चुकी लंदन की टेम्स नदी. आज दुनिया की सबसे स्वच्छ नदियों में से एक है. कैसे हुआ ये काम ? जो हालत टेम्स की आज से लगभग 150 साल पहले थी आज हमारे यमुना की वैसी ही है. क्या दिल्ली से बहने वाली यमुना क्या दोबारा साफ नहीं हो सकती? आखिर टेम्स नदी भी तो साफ हुई है.  

 

टेम्स नदी की आज जो स्थिति है उसकी कल्पना 150 साल पहले नहीं की जा सकती थी. तब ब्रिटेन दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश था. भारत पर भी ब्रिटेन का ही राज था. लंदन उस देश का सबसे महत्वपूर्ण शहर. एक आम कहावत थी कि ब्रिटेन की महारानी का साम्राज्य इतना बड़ा है कि उसमें सूरज कभी डूबता ही नहीं है. इतना ही नहीं ये वो वक्त था जब दुनिया भर से कच्चा माल ब्रिटेन आया करता था और यहां की फैक्ट्रियों से तैयार माल दुनिया भर में भेजा करता था. तब इस टेम्स नदी के रास्ते बड़े जहाज लंदन के शहर के अंदर आया करते थे. इस टेम्स नदी ने लंदन को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण शहर बना दिया था.       

 

दरअसल, लंदन या यूं कहें कि इंग्लैंड ब्रिट्रेन का इतिहास में इतना महत्पूर्ण रोल रहा है. उसके पीछे टेम्स नदी की बड़ी भूमिका है. लंदन से बहने वाली टेम्स नदी को टाइडल टेम्स भी कहते हैं क्योंकि टाइड या ज्वार भाटा की वजह से समुन्द्र का पानी नदी में आता जाता रहता था. और इसी की वजह से दुनिया भर के माल लाने वाले जहाज शहर के अंदर आते थे और बाहर जाते थे.

 

टेम्स सिर्फ 346 किलोमीटर लंबी नदी है लेकिन इसकी खास भौगोलिक और एतिहासिक स्थिति ने उसे दुनिया की सबसे महत्वपूर्णँ नदियों में से एक बना दिया. टेम्स नदी के किनारे किनारे बसा लंदन शहर दुनिया का सबसे वैभवशाली और समृद्द शहर बन गया. लेकिन इसकी बड़ी कीमत टेम्स नदी को चुकानी पड़ी. इंग्लैंड में दुनिया भर की फैक्ट्रियां थी. लंदन की आबादी लगातार बढ़ रही थी. शहर और लोगों का सारा मलवा टेम्स नदी में डाला जा रहा था. डॉक्टर पीटर स्पिलिट्स उन लोगों में से हैं जिन्होंने टेम्स नदी को फिर से जिंदा करने में अपना योगदान दिया था. पीटर स्पिलिट्स के मुताबिक औद्योगिक क्रांति का सबसे ज्यादा खामियाजा टेम्स नदी को ही उठाना पड़ा था. 

 

टेम्स नदी की हालत कैसी थी. इसका अंदाजा तब की मशहूर पत्रिका पंच के कार्टूनों से हो जाता है. इसमें गंदी नदी में मौत को नावं चलाते हुये दिखाया गया है. जैसे भारत में नदियों को मां कहा जाता है ब्रिटेन में फादर टेम्स हैं. 1848 के आस पास टेम्स की क्या हालत थी और फॉदर टेम्स किस बदहाली में थे वो पंच पत्रिका के इस काट्रून में दिखता है. टेम्स नदी मर चुकी थी . इंसान क्या मछली और दूसरे जीव भी इस नदी में जिंदा नहीं रह सकते थे .

 

“ The Illustrated London News ने लिखा “ हम सुदूर देशों पर कब्जा कर रहे हैं , हमने भारत को जीता है ….हमने अपना नाम अपना यश और अपने धन-वैभव को पूरी दुनिया में फैलाया लेकिन हम टेम्स नही को साफ नहीं कर सकते .‘ 26 जून 1858

                                                                   

1858 में एक बड़ी घटना हुई. गर्मियों के दिन थे. ब्रिटेन का पार्लियामेंट चल रहा था. बिट्रेन का पार्लिमेंट बिल्कुल टेम्स नदी के किनारे ही है. उस साल टेम्स नदी से लगातार बदबू आती रही. इस बदबू से सासंदो को बचाने के लिए पार्लिमेंट हाउस को डिसइनफेक्टैन्ट से भर दिया गया. लेकिन हालत सुधरी नहीं. थक हार कर पार्लियामेंट सेशन को ही स्थगित करना पड़ा. लंदन के इस दौर को कहा गया. दी ग्रेट स्टिंक जबरदस्त बदबू का युग .  

 

दी ग्रेट स्टिंक ने संसद और सरकार में बहस छेड़ दी. ब्रिटिश पार्लियामेंट की आर्काइव के मुताबिक संबधित विभाग के मंत्री से सवाल पूछा गया.  “हमारी कुटिल चालाकी की वजह से, एक महान नदी मलकुंड में बदल गई है. मैं ये पूछना चाहता हूं कि क्या महारानी की सरकार इस समस्या से छुटकारा दिलाने के लिए कुछ करने जा रही है.“ इस हालात में ब्रिटेन की सरकार ने नदी की हालत को सुधारने का फैसला किया.

 

जोसेफ बैजलजेड ने पूरे लंदन को सिवर सिस्टम से जोड़ दिया. घरों से निकलने वाले सीवर को गलियों में 3 फीट डॉयमीटर की पाइप से जोड़ा गया. इस तरह से 1800 किलोमीटर लंबी सीवर लाइन डाली गई. इन लाइनों को नदी के दोनों तरफ अंडरग्राउंड 11 फीट  डायमीटर की मुख्य सीवर पाइप लाइन से जोड़ दिया गया. इसकी कुल लंबाई 132 किलोमीटर थी. तकरीबन दस साल में ये काम पूरा हुआ. इससे शहर भर की गंदगी जो पहले सीधे नदी में जाती थी उसे समुन्द्र में छोड़ा जाने लगा.

 

इंजीनियरिंग, तकनीक अपनी जगह लेकिन इसके साथ ही टेम्स नदी को जिंदा रखने के लिए कानून का सहारा लिया गया. एक के बाद एक कानून बनाये गये. सिर्फ कानून ही नहीं बनाय गये बल्कि उसे लागू भी किया गया. कानून भी कैसा कि टेम्स नदी से कितना पानी निकाला जायेगा. कितना पानी वापस छोड़ा जायेगा इस सबके लिए लाइसेंस की जरुरत होती है?

 

कानून बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत हुई 1844 और सबसे महत्वपूर्ण कानून बना 1885 में जिसे दी टेम्स प्रिजरवेशन एक्ट कहा गया. इन कानूनो पर द टाइम्स पत्रिका ने लिखा, ” बदबू का जोर इतना था कि पार्लियामेंट को लंदन की इस बड़ी समस्या के बारे में आखिरकार कानून बनाना पड़ा. “भारत में पहले गंगा नदी को साफ करने की पहली बड़ी योजना गंगा एक्शन प्लान पर काम कर चुके मार्टिन ग्रीफिथ का मानना है कि कानूनों को लागू करने से टेम्स को बचाने में मदद मिली है.

 

तब के कानून और जोसेफ बैज़लजेड की सीवर व्यवस्था आज भी बदलाव के साथ चल रही है. जोसेफ बैज़लजेड के नेतृत्व में जो ने जो सीवर व्यवस्था बनी वो आज भी मिसाल मानी जाती है. सीवर नेटवर्क के मदद से टेम्स में दोबारा जान लौटीं . मछलियां लौटीं. सवाल था कितने दिनों के लिए?

 

50 के दशक में इस नदी की मोड़ के तरह. इसके जीवन में एक बेहद खतरनाक मोड़ आया. 1957 में लंदन शहर से गुजरने वाली टेम्स नदी को बायलॉजिकली डेड घोषित कर दिया गया. इसके अंदर जीवन नामुमकिन हो गया था. ये नदी फिर से जहरिले नाले में तब्दील हो चुकी थी. शहर ने एक बार फिर नदी से मुंह मोड़ना शुरु कर दिया था.

 

उसी दौर में डेव वार्डल कभी कभी लंदन आया करते थे. आज से तकरीबन 55-60 साल पहले. हालात इतने बुरे थे कि तब लंदन शहर के लोग और पर्यटक टेम्स नदी से दूर रहना ही पसंद करते थे.

 

लंदन में 1950 और 1960 के दशक में नदी फिर से वैसी ही हो गई थी जैस जोसेफ बैजलजेड के काम से पहले थी. ऐसा क्यों हुआ? जो टेम्स नदी बिल्कुल साफ हो गई. वो दोबारा लंदन में मृत क्यों हो गई? इसके पीछे की पहली वजह टेम्स नदी खुद है. दरअसल तकरीबन 346 किलोमीटर की यात्रा कर टेम्स. नार्थ सी में जाकर मिल जाती है. नार्थ सी में जब हाई टाइड यानी ज्वार आता है तब सागर का पानी टेम्स में अंदर आ जाता है. इसका मतलब ये है कि जोसेफ बैज़लजेड की सीवर लाइन शहर के जिस मलवे को समुद्र तक छोड़ती थी वो वापस लंदन शहर में आ जाती थी.   

 

सौ साल के भीतर टेम्स नदी दोबारा गंदी हो गई मैली हो गई. समस्या फिर खड़ी हो गई क्योंकि लंदन शहर की आबादी भी बढ़ रही थी. इसलिए मलवा भी बढ़ रहा था. लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि ग्रेट ब्रिटेन की सरकार वहां के लोगों की सेहत जो सीधे नदी की सेहत से जुड़ी हुई थी को अनदेखा नहीं कर रही थी. सोचिए आज से 160-170 साल पहले नदी को साफ करने की चिंता वहां की सरकार और लोगों को थी. और टेम्स नदी साफ हुई भी. ये एक बड़ा फर्क है. भारत और ब्रिटेन में. नदी गंदी हुई तो उसे साफ करने की महत्वाकांक्षी. बडी जिम्मेदारी सरकार ने उठाई और ये आज की बात नहीं है. 1850 के दशक की बात है.

 

1950 के दशक तक यमुना की हालत दिल्ली में इतनी बुरी नहीं थी जितनी टेम्स की थी. लंदन में टेम्स 1960 आते आते  फिर मर चुकी थी. उसे जिंदा करने के लिए फिर एक नई कवायद शुरु हुई. पुराने सीवर लाइन को सीवर ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा गया. और ये फैसला हुआ कि सामान्य परिस्थिति में बीना ट्रीटमेंट के किसी भी तरह का पानी टेम्स में सीधे नहीं जायेगा.  लंदन शहर में 4 बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया गया. पूरी कोशिश ये थी कि दूषित पानी किसी भी हाल में टेम्स में सीधे न जाये.

 

इतना ही नहीं जिस काम को जोसेफ बैज़लजेड ने लंदन में शुरु किया उसे और विस्तार दे दिया गया . पानी को बीना ट्रीटमेंट के समुन्द्र में छोड़ने की बजाये उसे साफ कर के छोड़ा जाने लगा. फिलहाल लंदन शहर तो दूर ग्रेट ब्रिटेन का कोई भी गांव ऐसा नहीं है जो सीवर लाइन से न जुड़ा हो.   

 

बर्कशायर, सोनिंग्स का इलाका है. इसे ब्रिटेन का एक गांव समझ लीजिए. टेम्स की सफाई सिर्फ टेम्स की सफाई नहीं थी. टेम्स से जुड़ने वाली तमाम छोटी बड़ी नदियों की भी सफाई थी. वो उसे सीवर ट्रीटमेंट प्लांट में जाता है.

 

इतना ही नहीं टेम्स नदी में बहुत से हाउस वोट हैं. जिसमें लोग सालों भर रहते हैं. वो हाउस बोट भी अपना कचरा नदी में नहीं डालते. ये भारत और ब्रिटेन का दूसरा बड़ा फर्क है. नदी को साफ रखना है तो शहर और गांव में फर्क नहीं कर सकते.  इंग्लैंड का एक एक गांव. एक एक घर सीवर लाइन और सीवर ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ा है. जबकि यमुना जितनी मैली होती है उसकी लगभग 80 फीसदी से ज्यादा गंदगी घरों से जाती है. इसी दिल्ली शहर में ढेरों ऐसे इलाके हैं जो सीवर लाइन से नहीं जुड़े हैं. सीवर ट्रीटमेंट प्लांट से नहीं जुड़े हैं.  

 

सीवर लाइन डल गये. कानून बन गया. सिवेज ट्रीटमेंट प्लांट तैयार हो गया. कानून का पालन भी होने लगा. इससे टेम्स को फिर से जिंदा करने में मदद मिली. लेकिन टेम्स नदी आज जिस तरह से बह रही है. उससे जुड़ी कहानियां और उससे मिलने वाली सीख बहुत महत्वपूर्ण है.

 

टेम्स को साफ करने में सबसे बड़ी जरुरत ये थी कि सरकार के साथ-साथ समाज भी इस नदी के संरक्षण से जुड़े. सरकार ने समाज को इस नदी के साथ जोड़ने की कोशिशें भी हुई. लोगों के आर्थिक और हेल्थ लाभ को नदी के साथ जोडा गया. यहां इस बात पर गौर कीजिए की लंदन शहर का 60 फीसदी पीने का पानी इसी टेम्स नदी से मिलता है . 

 

लंदन के लोग किस तरह से नदी को साफ रखने की कोशिश में लगे हैं. ये जानने के लिए एलिस हॉल से जानिए. एलिस हॉल पिछले 7 साल से टेम्स को साफ रखने के काम में लगी हैं. इनकी संस्था का नाम है टेम्स 21. आज वो लंदन के कियू ब्रीज इलाके में पहुंची हैं. वहां आसपास से तकरीबन 20 लोग इकट्टा हो गये. जिनमें कुछ बच्चे भी. उनका आज का मिशन है कियू ब्रीज के नीचे तकरीबन 1 किलोमीटर नदी तट की सफाई. लेकिन बच्चे जवान बुजुर्ग नदी साफ करने के काम में जुटे. उससे पहले कुछ खास निर्देष.

 

एलिस हाल की बाते सुनने के बाद वहां इकट्टा हुये सभी लोग चल पड़े नदी को साफ करने . और उसके बाद हुआ बड़ा खुलासा . उपर से साफ दिखने वाली नदी में से ऐसी चीजें मिलने लगी जिसे वहां नहीं होना चाहिये था. मसलन लोहे का सरिया ..फैम… कांच के टुकड़े . इस तरह के कचरे को देख कर साफ अंदाजा हो जाता है कि नदी को साफ करने में आम लोगों को जोड़ने की जरुरत कितनी ज्यादा है.

 

नदी को साफ करने में कीथ मैकटॉश भी मिले. कीथ इस इलाके में रोज जॉगिंग और साइकलिंग के लिए आते हैं. लिहाजा उसे साफ रखने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है.

 

यानी ग्रेट ब्रिटेन में हर किसी का टेम्स पर अधिकार है. और उसी अधिकार से जुड़ा हुआ कर्तव्य भी है. टेम्स पाथ उसी अधिकार का हिस्सा है. दरअसल टेम्स नदी जिस जगह शुरु होती है और जहां खत्म होती है उसके किनारे –किनारे एक फुटपाथ है. तकरीबन 296 किलोनमीटर लंबी. लोग इस रास्ते बेरोकटोक आ जा सकते हैं नदी की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं. टेम्स पाथ यहां के लोगों की जिंदगी का हिस्सा है.

 

ब्रिटेन में पर्यावरण और टेम्स को साफ रखने के लिए जिम्मेदार एलिस्टर ड्राइवर के साथ हम इसी टेम्स पाथ पर चल कर पहुंचे. लंदन के नजदिक रेडिंग के Thames valley Business Park.

 

जिस जगह पर पहले Earley power station था अब एक आधुनिक आफिस कॉम्पलेक्स है. उस पॉवर स्टेशन के लिए टेम्स नदी से पानी जाता था. और नदी के रास्ते ही कोयला आता था. इस पावर स्टेशन की वजह यहां का पर्यावरण और नदी की हालत खराब हो गई थी. चारों तरफ कॉक्रीट था. लेकिन जैसे ही टेम्स वैली बिजनेस बनने की बात आई नदी और उसके आसपास के इलाके को दोबारा ठीक का करने का अभियान भी जोड दिया गया . अब उस जगह की हालत करीब करीब वैसी ही है जैसी Earley power station बनने से पहले हुआ करती थी.

 

गौर कीजिए टेम्स को साफ करने का काम सिर्फ कानून के सहारे नहीं हुआ. ये सिर्फ तकनीक का ही मसला नहीं है. ये नीति और नीयत का मसला है. क्या ऐसे प्रयोग दिल्ली में नहीं हो सकते. लंदन के कीयू ब्रिज के नीचे कैसे लंदन के लोग नदी को साफ करने में लगे थे. वहां मौजूद लोग कह रहें थे नदी का ये हिस्सा हमारा है. टेम्स पाथ के जरिए कैसे नदी को लोगों से जोडा गया. लोग नदी किनारे घूम सके. नदी को नजदिक से पहचान सके. इस इरादे से इसे बढ़ावा दिया गया. वहीं जब जहां मौका मिला नदी को उसके प्राकृतिक उसके वास्तविक रुप में वापस किया गया.

 

टेम्स नदी आज दुनिया में सबसे साफ नदी मानी जाती है. पिछले 6 दशकों में जिस हाल से टेम्स लौटी है उसकी यात्रा का सबसे बड़ा प्रतीक Earley power station नहीं है . टेम्स पाथ भी नहीं है . बल्कि टेम्स की जीत की मिसाल है एक मछली है.  Salmon मछली .

 

सॉलमन मछली को ब्रिटेन में बहुत पसंद किया जाता रहा है. टेम्स नदी में इन मछलियों का घर हुआ करता था. लेकिन प्रदुषण की वजह से 1830 के बाद ये मछली टेम्स से गायब हो गई . 1950 में जब टेम्स की हालत दोबार बिगड़ी. तो इस मछली को नदी में दोबारा लाने का अभियान चलाया गया. पीटर स्पीलिट्स उस अभियान से जुड़े थे.

 

इस मछली को चुनने का मुख्य मकसद लोगों को टेम्स की सफाई से जोड़ना था. लोगों को बताया गया कि अगर ये मछली टेम्स नदी में वापस आयेगी तभी ये माना जायेगा कि टेम्स का पानी साफ हुआ है. 1960 के दशक में जो कोशिश शुरु हुई उसका नतीजा दिखा 23 अगस्त 1983 को. इस दिन एक बड़ी जिंदा सॉलमन मछली लंदन के पास मिली. वो भी तकरीबन 150 साल बाद. इस घटना के कई फायदे हुये. सैलमन, टेम्स में वापस लौट आई. तबतक सैलमन टेम्स की स्वच्छता की प्रतीक बन गई थी.

 

इन बातों का असर ये हुआ कि मरी हुई सॉलमन मछली बड़ी खबर में तब्दील हो जाती. सीवर सिस्टम में खराबी को लोगों ने बर्दाश्त नहीं करते है. उसकी सफाई की जिम्मेदारी भी उठाते हैं.

 

यहां समझने वाली बात ये है कि नदी को बचाने के लिए लोगों को नदी से दूर नहीं किया. उन्हें नदी से जोड़ा गया. चाहे सॉलमन हो या टेम्स पाथ. टेम्स का इस्तेमाल जैसे पहले होता था वैसे ही आज भी कई मायनों में होने दिया जा रहा है. नदी में पहले भी नाव चलते थे और आज भी नदी को इस लायक रखा गया है कि नांव की आवाजाही होती रहे. ये ब्रिटेन में टूरिज्म का बड़ा आकर्षण है.

 

कई पर्यटक तो लंदन में नाव लेते हैं और वो 200 किलोमीटर -300 किलोमीटर आगे तक जाते हैं. इसके लिए नदी के बहाव और नदी के पानी को खास तौर पर नियत्रित किया जाता है. इसे लॉक एन्ड वॉयर सिस्टम कहते हैं. हैमप्टन कोर्ट के पास बना लॉक एन्ड वॉयर सिस्टम इसकी मदद से पानी का स्तर नाव चलाने लायक रखा जाता है.  

 

टेम्स में नाव चले इसके लिए पानी का एक न्यूनतम स्तर बना कर रखा जाता है. लेकिन इसके अलावा नदी को साफ रखने के लिए भी ये जरुरी है कि पानी का स्तर बना रहे. टेम्स से जुड़ी एक खास बात ये है कि इस नदी के पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए नहीं किया जाता है. टेम्स नदी से कितना पानी निकाला जायेगा और वापस कितना पानी आयेगा ये सब पहले से तय होता है.

  

टेम्स में कितना पानी रहना चाहिए पानी की क्वालिटी कैसी है. इस पर नजर रखता है लंदन और आक्सफोर्ड के बीच वेलिंग्फोर्ड नाम की जगह पर बना सेंटर फॉर इकोलॉजी एंड हाइड्रोलॉजी. इस रिसर्च सेंटर का टेम्स को साफ रखने में बड़ा महत्व है. 

 

टेम्स पर ऐसी नजर इसलिए जरुरी है क्योंकि लंदन शहर को मिलने वाला पानी का 60 फिसदी हिस्सा इसी टेम्स नदी से आता है. और लंदन को जो पानी मिलता है वो यहां आने से पहले कम से कम दस बार रिसाइकल हो जाता है. मतलब लंदन के लोग जिस पानी का इस्तेमाल करते हैं वो उनसे पहले दस बार इस्तेमाल हो चुका होता है. इसलिए अगर पानी प्रदुषित हो रहा है तो उसकी वजह जानना जरुरी समझा जाता है.

 

मतलब नदी को अगर साफ करना है तो तकनीक का सहारा लेना होगा. कानून का सहारा लेना होगा. विज्ञान का सहारा लेना होगा. लोगों का साथ लेना होगा. टेम्स नदी की लंदन में लंबाई तकरीबन 100 किलोमीटर है. टेम्स को सुरक्षित रखने की सबसे ज्यादा कोशिश लंदन में होती है. टेम्स लंदन में आज जितनी साफ है उससे ज्यादा पिछले 150 -160 में कभी नहीं थी . यमुना की कुल लंबाई 1376 किलोमीटर है लेकिन दिल्ली में यमुना सिर्फ 22 किलोमीटर ही बहती है. जबकि यमुना जितनी  प्रदुषित है. जितनी मैली है उसका 80 फीसदी इसी दिल्ली शहर में होती है. और सबसे ज्यादा गंदगी, घरों से निकल कर ही नदी में जाती है. इसलिए ये जिम्मेदारी भी दिल्ली और दिल्ली के लोगों को उठाना होगा.

 

दूसरी तरफ लंदन के लोग प्रदुषण के खिलाफ. नदी की गंदगी के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई के तौर पर सुपर सीवर या टेम्स टनल तैयार कर रहे हैं. सुपर सीवर या टेम्स टनल वो सुरंग है जिसे टेम्स नदी के नीचे बनाया जा रहा है. डेव वार्डल उन अधिकारियों में एक थे जिन्होंने टेम्स टनल की वकालत की थी.

 

सुपर सीवर को टेम्स नदी तल से लगभग 50 से 70 मीटर नीचे बनाया जा रहा है. जब भी लंदन में ज्यादा बारिश होती है तो यहां के 150 साल पुराना सीवर सिस्टम भर जाते हैं और उसका गंदा पानी टेम्स में चला जाता है. लेकिन टेम्स टनल बनने के बाद ये गंदगी टेम्स में जाने के बजाय इस सुपर सीवर में चली जाएगी. जब बारिश रुक जाएगी तब सुपर सीवर से पानी को वापस निकाल कर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में भेज दिया जाएगा. इससे टेम्स नदी का पानी दूषित होने से बच जाएगा.

रामराज्य: आज कहानी टेम्स नदी की  

टेम्स सुपर सीवर की जब कल्पना की गई थी जिसके बारे में वैज्ञानिक अभी कुछ जानते ही नहीं है. स्वच्छ रखने के लिए लगातर कोशिशे चल रही है . भविष्य में कहां से समस्या आ सकती है उसके लिए तैयारी चल रही है. नदी को साफ करने का ब्रिटेन का अनुभव 150 साल से ज्यादा का है. अब हम अगर 150 साल लगायेंगे तो न नदी बचेगी और ना ही हम. इसलिए टेम्स के अब तक के अनुभव से सीखना जरुरी है. सीख बहुत ही साफ है. अगर नदियों का रामराज्य लाना है ..गंगा यमुना नर्मदा , ब्रम्हपुत्र जैसी नदियों को सहेज कर रखना है तो पहली सीख लोगों को नदी से जोड़ें. कानून का सख्ती से पालन करें और करवायें. जहां रिडेवलपमेंट के जरीए सुधार हो सकता है वहां सुधार करें. नदी में कचरा डालना बंद करें चाहे वो किसी भी शक्ल में हो उसे बंद करें. क्योंकि नदी हमारी धरोहर है जिसे हमें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है. ये हमारी आपकी जिम्मदारी है .

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