ABP न्यूज स्पेशल: फिनलैंड में है शिक्षा में 'रामराज्य'

By: | Last Updated: Saturday, 6 June 2015 4:23 PM
ABP NEWS special: ramrajya

नई दिल्ली: सभी लोग शहर के बड़े प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं. लेकिन उसकी फीस के पैसे कहां से आएंगे. ड्रेस के पैसे कहां से आएंगे. किताबों के लिए पैसे कहां से आएंगे. क्या ऐसा रामराज्य आएगा कि गरीब और अमीर के बच्चों को समान अवसर मिले. पढ़ने लिखने का आगे बढ़ने का. जिसकी कहानियां हम बचपन से सुनते आ रहे हैं. कहीं तो होगा वो रामराज्य जहां से सब संभव हो.   

 

एबीपी न्यूज के खास कार्यक्रम रामराज्य में हम एक ऐसी व्यवस्था को खोजेंगे जो हमें बताये आज भारत में राम राज्य कैसे आ सकता है? वही रामराज्य जहां सबको बराबरी की नजर से देखा जाये. सभी को समान शिक्षा समान हेल्थ केयर जैसे अधिकार मिले. भारत में ऐसी स्थिति नहीं है. लेकिन कहीं तो है. न्यूज टेलीविजन इतिहास की सबसे बड़ी सीरीज रामराज्य में हम उसी रामराज्य को ढूढ़ रहे हैं. इस बार खोज एक ऐसी व्यवस्था की जहां हमारे आपके देश के सभी बच्चों को एक जैसी शिक्षा मिल सके. भारत में शिक्षा का ये रामराज्य नहीं है. लेकिन कहीं तो ये सब मुमकिन होगा. 

ABP न्यूज स्पेशल: फिनलैंड में है शिक्षा में ‘रामराज्य’ 

क्या ये मुमकिन है? एक देश हो जहां चाहे जितने भी बच्चे हों उन्हें एक जैसी शिक्षा मिले. ना किसी की गरीबी  ना किसी की अमीरी उन्हें पढने से रोके. देश भर के स्कूल एक जैसे हो. सभी बच्चों को पढ़ाई के लिये एक जैसी सहूलियतें मिलें. क्या  ये हो सकता है कि किसी देश में अफसर बनने की बजाय लोग टीचर बनने में ज्यादा फक्र महसूस करते हों. और टीचर बनना उतना ही मुश्किल हो जितना की डॉक्टर  और टीचर को ये आजादी हो कि वो बच्चों को कैसे पढ़ाये? कितना पढ़ाये..और इन सबके बावजूद दुनिया भर के बच्चों की जब परीक्षा हो तो वो सालों साल अव्वल रहें. क्या ये मुमकिन है ?

 

ये सवाल रामराज्य की सबसे बड़ी कसौटी है. क्या सरकार अपनी धरती पर जन्म लेने वाले सभी बच्चों को बराबरी की नजर से देखती है या नहीं. उसे शिक्षा पढ़ाई लिखाई के माध्यम से फलने फूलने का बराबर का मौका देती है या नहीं. इन सभी सवालों का एक जवाब है. ये सबकुछ संभव कर दिखाया है फिनलैंड ने. दिल्ली से तकरीबन 9 हजार किलोमीटर दूर फिनलैंड में शिक्षा का रामराज्य कायम है.

 

फिनलैंड एक ऐसा देश हैं जिसके एक हिस्से में 51 दिन की रात होती है. सूरज निकल ही नहीं पाता है. उस वक्त इस देश के बारे में कहते हैं कि वहां सिर्फ जंगल है. लेकिन आज फिनलैंड की बात होती है तो मोबाइल बनाने वाली कंपनी नोकिया की बात होती है. कम्पूटर आपरेटिंग सिस्टम Linux की बात होती है. अब हर किसी के हाथ में एनड्राएड फोन हैं. एनड्राएड के पीछे लाइनेक्स है. दुनिया के बेहतरीन सुपरकम्पूटर के पीछे भी लाइनेक्स है. एंग्री बर्ड के बारे में सुना है आपने. बच्चे तो दिवाने हैं इसके. इसे बनाने वाली कंपनी रोवियो भी फिनलैंड की है. फिनलैंड दुनिया में आज सबसे विकसित देशों में से एक है. और आज कहा जाता है फिनलैंड की तीन बातें गौर करने लायक है. जंगल, सउना बाथ और शिक्षा.

 

फिनलैंड के इस छोटे से शहर फिसकारी के इस स्कूल में है. यूरोप के सातवें बड़े देश फिनलैंड में हैं. फिनलैंड भारत के मुकावले छोटा देश हैं लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में इस देश ने पिछले 40 साल में जो कुछ अचिव किया है वैसी मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिलती.

 

फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था को दुनिया की सबसे बेहतरीन व्यवस्था मानी जाती है. ऐसा क्यों है. ये जानने के लिये फिस्कारी गांव में आना बेहद जरुर था. फिनलैंड की राजधानी,  हेलिसिंकी से तकरीबन 125 किलोमीटर दूर फिस्कारी गांव है. इस गांव की आबादी है तकरीबन 600.

 

फिसकारी एक छोटी सी जगह है. भारत के ही गांव जैसा. फिनलैंड में यहां के लोग अपनी कारीगरी के लिये जाने जाते हैं. और फिसकारी का स्कूल. फिस्कारी के इस स्कूल में तकरीबन 70 बच्चे पढ़ते हैं. यहां पहली से छठी क्लास तक की पढ़ाई होती है. इस स्कूल में,  पास के दो और गांव से बच्चे पढ़ने आते हैं.  अब यहां बच्चे पढते कैसे हैं. इस पर गौर करते हैं.   

 

क्लास में बच्चे बांसुरी, फ्लूट बजाने की प्रैक्टिस कर रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि टीचर ना हो और बच्चों की मस्ती चल रही हो. बच्चों पर किसी की नजर ही ना हो. जल्दी ही पता चला ऐसा नहीं है. क्लास टीचर भी वहीं मौजूद थे.

 

दरअसल जब हम स्कूल की इस तीसरी क्लास में दाखिल हुये तब म्यूजिक क्लास चल रही थी. बच्चे अंग्रेजी का मशहूर गाना डॉन्ट वरी बी हैपी गाने को म्यूजिक में ढाल रहे थे. क्लास में ड्रम गिटार सिंथेसाइजर मौजूद है. पूरा का पूरा म्यूजिक बैंड गांव के इस स्कूल के इस क्लास में तैयार हो सकता है. लेकिन फिलहाल बच्चे बांसुरी बजाने और गाने की प्रैक्टिस में लगे हैं. इसके पीछे दो मकसद हैं.

 

बच्चे अंग्रेजी गाना गा तो रहे थे लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि अंग्रेजी इनकी मातृभाषा नहीं है.  फिनलैंड में फिनिश और स्वीडिश भाषा बोली जाती है. इसलिये क्लास टीचर इंग्लिश गाने जरीये अंग्रेजी भाषा सिखाने की कोशिश भी कर रहे हैं. साथ-साथ गाना बजाना सीख रहे हैं वो अलग.

 

भारत के गांवों के स्कूल को देखा है आपने..कहीं टपकती हुई छत..खचाखच भरा हुआ क्लास रुम… और ये फिनलैंड के एक गांव का सरकारी स्कूल है जहां संगीत की ट्रैनिंग के लिये साजो-सामान..म्यूजिकल इंन्सट्रूमेंट हैं..पढ़ाई के लिये प्रोजेक्टर है..और क्लास टीचर है. और गानों के जरिए अंग्रेजी सिखाने की कोशिश हो रही है. अब यही क्लास टीचर इन बच्चों के साथ पहली से छठी क्लास तक रहेंगे. फिनलैंड में एक ही टीचर पहली 6ठी कक्षा तक क्लास टीचर रहते हैं. ये बहुत ही अहम बात है. ऐसा क्यों है ये हम आपको जरुर बतायेंगे लेकिन फिलहाल ये जान लीजिये कि इंग्लिश गाने के साथ भाषा सिखाने का फैसला क्लास टीचर का अपना था. किसी ने थोपा नहीं है.

 

ठीक ऐसा ही कुछ आलम फिनलैंड के सरकारी स्कूल की प्रिसिंपल मिस कॉटरी पॅलॉस की क्लास का था. जहां दूसरी कक्षा के बच्चे भूगोल पढ़ रहे थे.  मिस कॉटरी घर से संतरा लाई थी. उन्होंने बच्चों को संतरा दिया..खाने के लिये नहीं बल्कि ये बताने के लिये धरती का आकार कुछ संतरा जैसा ही है क्यों न इस पर अलग- अलग देश का नक्शा उकेरा जाये.  

 

एक बात गौर कीजिये टीचर, लेक्चर देते हुए कम ही दिखते हैं. बच्चे खुद से ज्यादा से ज्यादा काम करने की कोशिश करते हैं. इतना ही नहीं टीचर को बच्चों को डांटते डपटते नहीं दिखते हैं.

 

फिनलैंड में बच्चे 3 साल नहीं..4 साल नहीं..पांच साल नहीं..6 साल नहीं..सातवे साल में जाकर..स्कूल में दाखिल होते हैं और ऐसा इसलिये होता है क्योंकि टीचर बनकर नहीं. बल्कि दोस्त बनकर सहपाठी बनकर क्लास में आते हैं.

 

सात साल से फार्मल स्कूल शुरु होता है फिनलैंड में. जबकि भारत में तो कानून होने के बावजूद नर्सरी..प्री नर्सरी..केजी 1 केजी 2..अलग –अलग नाम से दो –ढाई साल से स्कूल भेजे जाने लगते हैं.

 

सात साल में स्कूल में दाखिला. ये उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि क्लासरुम के माहौल का दोस्ताना होना. और ऐसा ही माहौल दिखता है खाने की मेज पर. लंच हुआ नहीं कि सभी बच्चे और टीचर डाइनिंग रुम में हाजिर हो जाते हैं..यहां बच्चों की शारीरिक जरुरतों को ध्यान में रख कर मुफ्त खाना मुहैया कराया जाता है. फिनलैंड दुनिया का पहला ऐसा देश था जिसने आज से तकरीबन 71 साल पहले 1943 में मिडडे मिल मुहैया कराने के लिये बाकायदा कानून पास कर दिया. 1948 में इस कानून को लागू कर दिया गया. तब से लेकर अब तक फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था का इसे बेहद अहम हिस्सा माना जाता है. फिनलैंड के सभी स्कूल में सभी बच्चों के लिये गर्म खाना मुहैया कराया जाता है. इसीलिये जो दृश्य हमने फिसकारी गांव में देखा वही नजारा राजधानी हेलसिकी के स्कूल, विकि टिर्चस ट्रेनिंग स्कूल  में भी मौजूद था.

 

Viiki Teachers Training School यहां भी बच्चे उसी चाव और अनुशासन से खाना खा रहे थे. फिसकारी गांव और राजधानी हेलिसिंकी शहर के स्कूल में फर्क सिर्फ बच्चों की संख्या का था. बाकि सुविधाये एक जैसी..शिक्षक एक जैसे.

 

वाइस प्रिसिंपल,  Marja k Martikainen, का कहना है कि बच्चों की इन एक्टिविज्म खेलकूद से उनमें टीम बिल्डिंग, आपसी सूझ बूझ और विश्वास पैदा होता है. ऐसा कैसे मुमकिन है. बच्चे कभी भाग कर दूसरे छोर पर जाते तो कभी सीढ़ी पर चढ़ते हैं. दो-दो के जोड़े में बच्चे इन सीढ़ियों के पास आते हैं. पहले एक बच्चा सीढ़ियों पर चढ़ता है..फिर दूसरा. एक ऊंचाई पर पहुंच कर दोनों बच्चे रुक जाते हैं. फिर उन दो बच्चों में से एक कुछ पायदान नीचे उतरता  है और दूसरे बच्चे के नीचे से गुजर कर दूसरी तरफ आ जाता है. अब ऐसा तो तभी मुमकिन है जब दोनों बच्चे के बीच तालमेल हो. एक दूसरे पर भरोसा हो. भरोसा इस बात का कि जोड़े का दूसरा बच्चा जब तक गुजर ना जाये उसका साथी नीचे नहीं आयेगा. नीचे आने पर दोनों को चोट लग सकती है. 

 

फिनलैंड और भारत की शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी फर्क पर गौर कीजिए. फिनलैंड में रामराज्य इसलिए है क्योंकि वहां में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्कूल किसी दूरदराज गांव में है या शहर में. और दोनों ही जगह पढ़ाई एक जैसी. और  वो भी बिल्कुल मुफ्त. बिल्कुल फ्री. आप कह सकते हैं कि भारत में भी सरकारी स्कूल में पढ़ाई बिल्कुल फ्री है. ये बात सही है. लेकिन क्या सरकारी स्कूल और प्राइवेट स्कूल की पढ़ाई एक जैसी है. क्या गांव के सरकारी स्कूल और शहर के सरकारी स्कूल की पढ़ाई एक जैसी है. नहीं ना. यही फर्क है.

 

फिनलैंड ना सिर्फ अपने देश के सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहा है..बल्कि  समान शिक्षा दे रहा है. इसे कहते है free and equal education to all सभी के लिये मुफ्त और एक जैसी शिक्षा . 

 

फिनलैंड की free and equal education to all   सभी के लिये मुफ्त और एक जैसी शिक्षा व्यवस्था का नतीजा है यहां के 99 फिसद से ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढते हैं. लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है. सवाल ये कि एक जैसे स्कूल. एक जैसी सुविधायें दे देने से क्या बच्चे दुनिया भर में अव्वल हो जाते हैं. अगर ऐसा नहीं है तो एक जैसे स्कूल..एक सुविधाओं के अलावा वो कौन सी बातें हैं जो फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था को दुनिया में बेहतरीन बना देती है. 

 

यहां के टीचर , स्कूल के फोकस में वो बच्चे नहीं होते जो तेज और मेधावी होते हैं. फोकस उन पर होता है जिनको पढ़ाई में मन नहीं लगता. गणित..मैथेमेटिक्स से डर लगता है….पूरी कोशिश ये होती है कि सभी बच्चों को जानकारी , कुशलता और कंप्टीशन के समान स्तर पर ले आया जाता है.

 

ये भारत और फिनलैंड की पढ़ाई का तीसरा बड़ा फर्क है. भारत में तेज बच्चों पर पूरा ध्यान दिया जाता है जबकि फिनलैंड में सारा जोर पढ़ाई में कमजोर बच्चो पर होता है. और इसके लिए तयशुदा तरीका पहले से तय है.

 

दरअसल जैसे ही क्लास टीचर को पता चलता है कि बच्चे को किसी विषय में परेशानी है तो उस पर ज्यादा समय दिया जाने लगता है. अगर इससे भी सुधार नहीं हुआ तो उस बच्चे के लिये अलग से टीचर बुलाये जाते हैं. जो सिर्फ उस विषय में कमजोर बच्चे पर ध्यान देते हैं.

 

फिनलैंड में इस काम के लिए शिक्षकों को बहुत आजादी दी जाती है. अब इस हेलेसिंकी अपर सेकेण्डरी स्कूल आफ लैग्जवेजेज की 9वीं क्लास को देखिये. यहां अंग्रेजी भाषा की क्लास चल रही है और उसकी शुरुआत हो रही है पॉप म्यूजिक से. 

 

पूरा जोर इस बात पर है कि बच्चों को खेल खेल में गीत –गाने के जरिए एक भाषा सिखाया जाये. ये ही तो रामराज्य की पहचान है.  और यही मायने हैं फ्री एंड इक्वल एडुकेशन के. समान शिक्षा का मतलब सिर्फ एक जैसी सुविधायें और सिलेबस नहीं है. सुविधा दे देने से बच्चे पढ़ाई में अच्छे नहीं हो जाते हैं..फिनलैंड में किसी विषय में बच्चा अगर पिछड़ता  है तो ये स्कूल की ये जिम्मेदारी होती है कि उसे पढ़ा कर…समझा कर योग्यता के एक ही स्तर पर लाया जाये. वहां अलग से ट्यूशन में भेजने की जरुरत नहीं पड़ती.

 

भारतीय मूल की सुखजगत बरार फिलहाल 12वीं क्लास में हैं. और मैट्रिकुलेशन की तैयारी कर रहीं है. सुखजगत उनकी दोस्त मिलिया और जैसमिन को सबसे ज्यादा भरोसा अपनी टीचर्स पर रहा है.

 

सुखजगत बरार जल्द ही मनोवैज्ञानिक बनने की पढ़ाई करने के लिये यूनिवर्सिटी में दाखिला लेंगी जबकि उनकी दोस्त मिलिया टीचर और जैसमिन डॉक्टर. इससे पहले तीनों ने ही 12 साल स्कूल में पढ़ाई की है. फिनलैंड में 7 साल की उम्र में बच्चे स्कूल में दाखिल होते हैं.  और इसी के साथ शुरु हो जाती है 9 साल की अनिवार्य पढ़ाई. फिनलैंड में मौजूद सभी बच्चों को  कानूनन 7 साल से 16 साल तक स्कूल में पढाई करनी होती है. इसके बाद अगर कोई बच्चा चाहे तो एक साल और स्कूल में बीता सकता है. और यहीं  बच्चे अपनी रुचि के मुताबकि एक बड़ा फैसला करते हैं.

 

जब बच्चे नौ साल की स्कूलिंग पूरी कर लेते हैं तब उनके पास विकल्प होता है. अपर सेकेण्डरी स्कूल में जाने का या वोकेशनल स्कूल में जाने करा.  अपर सेकेण्डरी स्कूल भी अलग –अलग तरह के होते हैं.

 

स्कूल में साइंस , मैथ्स जैसे विषय तो पढ़ाये जाते ही है लेकिन यूरोप –एशिया  की अलग-अलग भाषाओं को भी पढ़ाने की सुविधा यहां मौजूद हैं. 18 साल के ओलिवर बेंटंले पॉप गायक बनना चाहते हैं. इन्हें अलग –अलग भाषा सिखने का शौक है. ओलिवर ने यहां मैथ्स , साइंस के साथ –साथ इंग्लिश, फ्रेंच, इंटालियन और जर्मन भाषा की पढ़ाई की  है.और वो अपने बैंड के साथ अलग-अलग देशों में जाने को तैयार हैं.

 

ओलिवर बेंटले म्यूजिक बैंड बनाना चाहता है. गिटार बजाता है. और ये सब कुछ वो स्कूल में रह कर सकता है. वो अपनी मातृभाषा, फिनिश और स्वीडिश के अलावा इंग्लिश, फ्रेंच, इंटालियन और जर्मन भाषा सीख रहा है. सब अपनी मर्जी से.  क्योंकि उसकी रुचि भाषाओं में है लैग्वेजेज में हैं. क्या इस तरह के विकल्प की कल्पना हम भारत में कर सकते हैं. इस तरह के विकल्प फिनलैंड के हर छात्र के पास मौजूद रहता है.

 

बहरहाल, अब तक आपने देखा कि फिनलैंड में सात साल की उम्र से  मुफ्त पढ़ाई  होती है. दूसरी बात – पूरे देश में पढ़ाई का स्तर एक जैसा है.चाहे स्कूल कहीं भी हो..शहर में हो गांव में हो. पढ़ाई लिखाई की क्वालिटी बिगड़ती नहीं है. तीसरी बात यहां किसी बच्चे को पीछे नहीं रहने दिया जाता है. चौथी बात पढ़ाई में बच्चों के लिए हमेशा विकल्प मौजूद रहता है. इसी तरह से 9 साल की पढ़ाई के बाद एक  विकल्प होता है वोकेश्नल स्कूल में जाने का.

 

 

वान्टा वोकेशनल कॉलेज . 9 साल की अनिवार्य पढ़ाई करने के बाद छात्रों ने हेयर ड्रेसर बनने का फैसला किया. यहां एक कुशल हेयर डिजाइनर बनने की दो से चार साल तक की ट्रेनिंग दी जाती है. 

 

इसी तरह से जिन बच्चों ने मैसोन यानी राजमिस्त्री बनने का सोचा उन्हें भी ट्रेनिंग दी जा रही है. राजमिस्त्री बनना..हेयर ड्रेसर बनने का  ये फैसला  इन बच्चों का अपना था. ये वोकेशनल स्कूल यहां कितना लोकप्रिय हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि  9 साल की अनिवार्य शिक्षा के बाद 40 फिसद लड़कियां और तकरीबन 58 फीसद लड़के वोकेशनल स्कूल में दाखिला लेते हैं. वोकेशनल स्कूल में पढ़ाई के बाद छात्र आमतौर पर नौकरी करते हैं लेकिन अगर इरादा बदल जाये तो कोई भी छात्र जरुरी परीक्षा देकर आगे की पढ़ाई कर सकता है.

 

छात्रों के लिये फिनलैंड की पढ़ाई लिखाई की व्यवस्था कितना लचीली है इसका एक मिसाल वान्टा वोकेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल हैं. जिन्होंने वोकेशनल कॉलेज से पढ़ाई कर के 5 साल तक जंगल काटने वाली मशीन चलाने का काम किया था.

 

वोकेशनल स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे आमतौर पर आगे की पढ़ाई के लिये पॉलिटेक्निक में जाकर बैचलर डिग्री ले सकते हैं. इस दौरान वो विषय भी बदल सकते हैं. और वो चाहे तो बीच में ही अपर सेकेण्डरी स्कूल में भी जा सकते हैं. अपर सेकेंड्री के बच्चे भी वोकेशनल स्कूल में जा सकते हैं. और फिर आगे की पढ़ाई के लिये किसी यूनिवर्सिटी या पॉलिटेक्निक में एडमिशन ले सकते हैं. और ये सब बिल्कुल मुफ्त होता है. आप चाहें जितना पढ़ना चाहें. जब भी पढना चाहे पढ़ाई आपके लिये बिल्कुल मुफ्त है.

 

फिनलैंड में छात्र अपनी गति से पढ़ते हैं. अपनी सहूलियत से पढ़ते हैं..उन पर कभी दवाब नहीं डाला जाता. पूरा का पूरा शिक्षा तंत्र सरकारी है. फिर भी जब दुनिया भर के 15 साल के युवकों की परीक्षा हुई तब यहां के छात्र कई पैमानों पर सबसे उपर रहे हैं. इस टेस्ट को प्रोग्राम फॉर इंटरनैशनल स्टूडेंट एसेसमेंट यानी पीसा कहते हैं. पीसा 15 साल के छात्र को मैथ्स, साइंस और रिडिंग लिटरेसी के पैमानों पर जांचती है. साल 2000 से ये टेस्ट हर तीन साल पर होता है और हर बार यहां के स्टूडेंट ज्यादार पैमानों पर सबसे उपर रहे हैं. सबसे बड़ी बात की बहुत ज्यादा मार्क्स लाने वाले फिनलैंड छात्र और कम मार्क्स लाने वाले छात्रों के बीच का फासला फिनलैंड में बहुत कम का रहा है. पीसा टेस्ट में भारत के छात्रों का प्रदर्शन काफी बुरा रहा है. भारत के दो राज्य, तमिलनाडु और हिमाचल ने 2009 में  पीसा टेस्ट में हिस्सा लिया था.  दोनों राज्य काफी नीचे 72 और 73 स्थान पर रहे. हाल के वर्षों में चीन का शंघाई शहर, साउथ कोरिया और हांग कांग ने फिनलैंड को पीछे ढकेला है. लेकिन इन देशों के बारे में कहा जाता है कि वहां बच्चों पर पढ़ाई लिखाई के लिए बहुत दवाब होता है. और क्वालिटी एडुकेशन सभी लोगों के लिए मौजूद नहीं है.

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस स्किल्ड इंडिया की बात लगातार कर रहे हैं. उसका मॉडल फिनलैंड में 1970 के दशक से काम कर रहा है. फिनलैंड ने बहुत पहले समझ लिया था कि उस जैसे  देश को जहां नैचुरल रिसोर्स नहीं है अगर आगे बढ़ना है तो स्किल्ड लोग. हर तरह के काम में निपुण लोगों की फौज खड़ी करनी होगी. फिनलैंड के वोकेशनल स्कूल वही काम कर रहे हैं. इसमें बड़ी भूमिका टीचरों की रही है. शिक्षकों की रही है.  

 

टीचरों के हवाले बच्चों का भविष्य है और फिनलैंड में ये भरोसा है कि वो बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करेंगे. इस भरोसे की कई अहम वजह हैं. पहली वजह है टीचर ट्रेनिंग. फिनलैंड में चाहे आप पहली क्लास में पढ़ातें हो या 12वीं. टीचर्स ट्रेनिंग में मास्टर्स डिग्री होना जरुरी है. 

 

टीचर ट्रेनिंग. ये है एक बड़ा फर्क. भारत और फिनलैंड में. वहां टीचर बनना है तो पहले 5 साल की पढ़ाई कीजिये. मास्टर्स डिग्री लीजिये. जबकि भारत के सरकारी स्कूलों में मीडिल स्कूल पास शिक्षक भी पढ़ा रहे हैं. ट्रेनिंग तो बहुत दूर की बात है. वहीं फिनलैंड में टीचर्स ट्रेनिंग की पढ़ाई भी अलग-अलग तरह की होती है. पहली से 6 क्लास तक के क्लास टीचर की ट्रेनिंग बिल्कुल अलग होती है. क्योंकि इन क्लास टीचरों को छोटे बच्चों को पढ़ाना होता है. और वो आमतौर पर सभी विषय पढ़ाते हैं. दौर करने वाली बात ये हैं कि 6ठी क्लास तक, साल दर साल क्लास बदलता है लेकिन क्लास टीचर नहीं बदलते. इसके पीछे का  मकसद समझे पाये आप पहली क्लास से 6ठी क्लास तक टीचर और बच्चों के बीच एक गहरा रिश्ता बनता है. अपनापन का. टीचर बच्चों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं. 

 

6ठीं क्लास के बाद अलग-अलग विषयों के टीचर बच्चों को पढ़ाते हैं. इन्हें सब्जेक्ट टीचर कहा जाता है. अगर आपको सब्जेक्ट टीचर बनना है तो उस विषय में मास्टर्स डिग्री की जरुरत होती है साथ में एडुकेशनल साइंस की पढ़ाई भी जरुरी है. लेकिन पहला पड़ाव, यानी यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेना ही काफी मुश्किल है.

 

फिनलैंड में नयी चुनौतियों के लिए टीचर ट्रेनिंग का तरीका भी लगातार बदल रहा है. इसीलिए फिनलैंड में  सोशल मीडिया पर काफी जोर है. फिनलैंड में टीचर बनना मुश्किल तो है लेकिन इस पेशे से काफी मान-सम्मान जुड़ा हुआ है. टीचर को फिनलैंड में काफी आदर के भाव से देखा जाता है.

 

डॉक्टर..पुलिस..टीचर…. 2104 में 1600 स्टूंडेंट टीचर बनने आये..इनमें से 160 बच्चों का एडमिशन हुआ.  टीचर बनने के इच्छुक छात्रों की यूनिवर्सिटी में दाखिले के बाद ट्रेनिंग की लंबी प्रक्रिया चलती है. इसमें पढ़ाई लिखाई से जुड़े सिद्दांतों के अलावा क्लास रुम में  ट्रेनिंग की लंबी प्रक्रिया चलती है.

 

अब टीचर बनना इतना मुश्किल हैं तो नतीजे बेहतर होंगे ही.टीचरों का इतना सम्मान है तो इस सम्मान की लाज भी रखी जाती है. इमानदारी से काम कर के पढ़ा कर ये मान सम्मान फिनलैंड के शिक्षकों ने अर्जित किया है.

 

फिनलैंड, शिक्षा के फिल्ड में आज जहां है उसके पीछे यहां के टीचर हैं. और यहां की नीतियां भी. अब फिनलैंड की बुनियादी बातों पर गौर कीजिए. यहां सभी बच्चों के लिए शिक्षा ना सिर्फ मुफ्त है बल्कि एक जैसी है. चाहे राजधानी हेलसिंकी हो या गांव का कोई स्कूल हर जगह एक जैसी सुविधायें हैं. योग्य टीचर मौजूद हैं. भारत में ऐसा नहीं है. फिनलैंड में बच्चे 7 साल से स्कूल जाना शुरु करते हैं. भारत में 6 साल से अनिवार्य शिक्षा की शुरुआत होती है लेकिन ढाई साल से ही बच्चे स्कूल जाने लगते हैं. पढाई के दौरान बच्चों को काफी विकल्प दिया जाता है. 9 साल की अनिवार्य पढ़ाई के बाद बच्चे वोकेशनल स्कूल में जा सकते हैं. जहां हेयरड्रेसर बनने से लेकर म्यूजिशयन बनने तक की ट्रेनिंग दी जाती है.  

 

फिनलैंड में हर 14 बच्चे पर एक टीचर हैं. भारत में 35. वहां का हर टीचर कम से कम ग्रैजुएट है. भारत में 8वीं पास शिक्षक भी हैं. बीना टीचर ट्रैनिंग के फिनलैंड में बच्चों को कोई पढ़ा नहीं सकता. भारत में सरकारी स्कूलों में भी बिना टीचर्स ट्रेनिंग के शिक्षक मौजूद हैं. फिनलैंड में 99वें फिसद बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं. भारत में चलन प्राइवेट स्कूलों का है.. अब शिक्षा के क्षेत्र में रामराज्य लाना है. गरीब बच्चों को बराबरी का अधिकार देना है. आगे बढ़ने का मौका देना है तो फिनलैंड से सीखना जरुरी है.

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