एबीपी न्यूज स्पेशल: शांति का 'रामराज्य' लाने के लिए जरूरी है ये

By: | Last Updated: Saturday, 27 June 2015 4:56 PM
ABP NEWS special RAMRAJYA

नई दिल्ली: यहां जिंदगी और मौत के बीच का फासला अक्सर सिर्फ 15 सेकेण्ड का होता है. अगर 15 सेकेण्ड के अंदर आप सुरक्षित जगह तक नहीं पहुंचे तो मुमकिन है कि कोई रॉकेट, गोली या बम आपकी जान ले लेगा. इस देश के नागरिकों पर रॉकेट या बम हमलों के रूप में हर वक्त मौत मंडराती है. इसीलिए जब भी कोई हमला होता है तो एक सायरन बजता है, जिसके बाद इनके पास बचने के लिए सिर्फ 15 सेकेंड होते हैं.

इन 15 सेकेंड में इन्हें महफूज जगह पर पहुंचना होता है. इसके लिए इस देश में चप्पे-चप्पे पर रॉकेट और बम प्रूफ बंकर बने हैं. घर में बंकर, दफ्तर में बंकर, बाजार में बंकर, यहां तक की खेल के मैदान में भी बंकर लेकिन फिर भी कभी-कभी कुछ लोगों की जान जाती है. यहां के लोगों के लिए 15 सेकेंड का मतलब है बचने के लिए छुपना. क्योंकि अगर आप छुपे नहीं तो बचेंगे कैसे और अगर आप बचे नहीं तो आप लड़ेगे कैसे. और अगर आप लड़े नहीं तो ना तो आप बचेंगे और ना ही आपका देश. अगर आप उसे मारेंगे नहीं तो वो आपको मार डालेगा. क्योंकि वो एक आंतकवादी है.

 

ये एक ऐसे देश का फलसफा है. जिसके लिए लड़ना उन लोगों से लड़ना जिसे वो आंतकवादी कहता है वहां की रगों में हैं. दरअसल, न्यूज टेलीविजन इतिहास की सबसे बड़ी सीरीज, रामराज्य में हम ऐसी व्यवस्थाओं के बारे में आपको बता रहे हैं जिसके बारे में हम बचपन से सुनते आ रहे हैं. ऐसी व्यवस्था ऐसी सिस्टम, ऐसी सरकार जो अपने हर नागरिक को बराबर का हक दे. बराबर की सुविधायें दे. जहां न रिश्वत ली जाती हो न मांगी जाती हो. जहां की नदियां स्वच्छ हो, निर्मल हो लेकिन ये सब हो लेकिन आपकी जान सुरक्षित ना हो तो उस राज्य के लोग भयमुक्त कैसे हो पायेंगे. बिना किसी डर के जीना भी तो रामराज्य की बुनियाद में है.

 

वैसे किसी सरकार से हम आखिर किन बातों की उम्मीद रखते हैं. शिक्षा, सेहत और क्या सुरक्षा. सुरक्षित रहना भी हमारा अधिकार है. हमारी जरुरत है. रामराज्य में इस बार खोज एक ऐसे देश की जो हमेशा विवादों में रहा है. लेकिन जिस शिद्दत के साथ वो अपने नागरिकों की रक्षा करता है. उससे सीखना बेहद जरुरी है. उस देश का नाम है इजरायल.

 

इजरायल 14 मई 1948 को अस्तित्व में आया. भारत से तकरीबन, नौ हजार किलोमीटर दूर बसा इजरायल अपने जन्म से ही अस्तित्व की लड़ाई लड रहा है. क्योंकि वहां की बहुसंख्यक यहूदी आबादी जिसे अपना देश मानता है उसे अरब मूल के फिलस्तीनी अपनी मातृभूमि मानते हैं. इजरायल के जितने भी पड़ोसी देश हैं उनसे पिछले 6 दशक में कभी न कभी इजरायल की सीधी लड़ाई हो चुकी है. इजरायल के मुताबिक उसके सभी पड़ोसी देशों ने हमेशा उन लोगों का समर्थन किया है जिसे वो आंतकवादी मानता है. और वो आंतकवाद को खत्म करने के लिए हर तरह के कदम उठाने के लिए तैयार हैं. 

FULL EPISODE: इजरायल में कैसे आया सुरक्षा का रामराज्य? 

कर्नल आमोस गोलान (रिजर्व ), इजरायल की एंटी टेरर यूनिट के पूर्व कमांडर अब तक दो हजार से ज्यादा ऑपरेशन में हिस्सा ले चूकें है. जेरुसलम दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक. इजरायल ने पिछले 60 साल में जो कुछ अनुभव किया है . उसकी जड़ में इस जगह का इतिहास है वर्तमान है और भविष्य़ है.

 

जेरुसलम में यहूदी धर्म को मानने वाले लोगों का पवित्र स्थल टेंपल माउंट है, वेस्टर्न वाल. यहीं मुसलमानों के लिए बेहद पवित्र अल अक्सा मस्जिद भी मौजूद है. अल अक्सा मस्जिद को, क़िबला-ए-अव्वल यानी पहला काबा कहा जाता है और पैगंबर मोहम्मद के बारे में कहा जाता है कि यहीं से वो जन्नत गये थे. और यहीं चर्च आफ होली सेपलर्च भी है. जहां माना जाता है कि जीसस क्राइस्ट को सूली पर चढ़ाया गया था. जब इजरायल बन रहा था तो इसे संयुक्त राष्ट्र प्रशासित इलाका होना था . लेकिन जेरुसलम को इजरायल अपनी राजधानी मानता है. इसकी घोषणा इजरायल ने 1948 में ही कर दी थी लेकिन तब जेरुसलम दो हिस्सों में बंटा था. पश्चिमी जेरुसलम इजरायल के कब्जे में था और पूर्वी जेरुसलम, जार्डन का हिस्सा था. 1967 में इजरायल ने पूर्वी जेरुसलम पर भी कब्जा कर लिया. फिलस्तिन भी जेरुसलम को अपनी राजधानी मानता है. इजरायल के दावे को संयुक्त राष्ट्र, यूनाइटेड नेशन अपनी स्वीकृति नहीं देता है. ज्यादातर देश जेरुसलम को इजरायल की राजधानी नहीं मानते हैं. इजरायल को इस वजह से भी निशाना बनाया जाता रहा है. 

 

इजरायल के इतिहास और उसके वर्तमान की तस्वीर. आज की तस्वीर का बड़ा हिस्सा हिंसा से जुड़ा हुआ है. इजरायल इस हिंसा को आंतकवादी हिंसा मानता है. तकरीबन 66 साल पहले इजरायल अस्तित्व में आया. इजरायल तभी से हिंसा का शिकार होता रहा है. लिहाजा इजरायल ने अस्तित्व में आने के साथ ही एक बड़ा फैसला किया. एलान कर दिया गया कि कोई भी यहूदियों का खून आसानी से नहीं बहा सकेगा. भारत में आतंकवादियों के जिस फिदाइन हमले की बात हम 1990 के दशक से सुनते आ रहे हैं उसे इजरायल 1950 से झेल रहा है. इस साल फिदाइन हमले में 19 इजारायली नागरिक मारे गये थे. 1953 तक आते आते हमलो की संख्या बढ गई थी. अक्टूबर महीना था. इजरायल में फिदाइन हमला हुआ. एक महिला और उसके 2 बच्चे मारे गये. इजरायल को पता चला कि हमलावर जार्डन प्रशासित गांव किबिया से आये थे. तो इस हमले का बदला लेने के लिए इजरायल ने पूरे गांव को बर्बाद करने का फैसला किया और 14 अक्टूबर 1953 को इजरायल के कंमाडो ने किबिया गांव पर हमला कर दिया. इसमें 50 से 70 लोगों के मारे जाने की रिपोर्ट आई. इसकी वजह से इजरायल की घोर निंदा हुई. संयुक्त राष्ट्र, अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट, और यहूदी समाज ने भी इजरायल के इस हमले की बहुत निंदा की.

 

और जब इजरायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन इस आपरेशन के कमांडर, एरियल शेरॉन से मुखातिब हुये तो कहा, “ हमारे लिए एक ही बात अहम है. वो ये कि हम हर हाल में अपने पूर्वजों की धरती पर रह सकें. और जब तक कि हम अरब के लोगों को ये न बता दें कि यहूदियों की हत्या उनके लिए बहुत मंहगी पड़ेगी. हम यहां नहीं रह सकेंगे.”

 

ये इज़रायल है. ये इजरायल के सोचने का तरीका है. कोई भी देश, संगठन, व्यक्ति आसानी से यहूदियों का खून नहीं बहा सकता है. यहुदियों के खून की बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी. ये एक बड़ा फर्क लगता है इजरायल और भारत जैसे देश के बीच . गौर करने वाली बात ये हैं कि जब वहां के नेता ये बातें कर रहे थे तब देश की शक्ल में पहली बार दुनिया के नक्शे पर इजरायल दिखा था. ऐसा क्यों है. इस सवाल का जवाब यहुदियों के इतिहास और इजरायल की विशेष राजनीतिक परिस्थिति में मिलता है.

 

तेल अवीव शहर मेडिटेरेनियन सी, भूमध्य सागर, के किनारे बसा एक खूबसूरत शहर है. वैसे जेरुसलम को इजरायल अपनी राजधानी मानता है लेकिन तेल अवीव यहां का सबसे महत्वपूर्ण व्यवसायिक शहर है. और हमेशा से कथित आंतकवादियों के निशाने पर रहा है. और एक के बाद एक यहां कई हमले भी होते रहे हैं. ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली या मुंबई में आंतकवादी हमले होते रहे हैं.

 

इजराइल की काउंटर टेरेरिस्म स्ट्रैटेजी यानि कि आतंकवाद विरोधी रणनीति का एक मुख्य लक्ष्य एक मुख्य मकसद ये है कि किसी भी हाल मे यहां के लोगों को भयमुक्त रखा जाए क्या इजराइल अपनी इस रणनीति में सफल हुआ है?

 

इस सवाल का जवाब भी हमें इजरायल के इसी तेल अवीव शहर में मिल जाता है. एक के बाद एक आंतकवादी हमलों के बावजूद इस शहर को पुलिस छावनी में नहीं बदला गया है. सड़कों पर पुलिस नहीं दिखाई देती है ना कोई बैरिकेड. ना कोई छानबीन. ना कोई पूछताछ. ना कोई तनाव. ऐसा कैसे संभव है. इस सवाल का जवाब मिलता है तेल अवीव म्यूनिसिपैलिटी बिल्डिंग के कमरे में.

  

तेल अवीव का कमांड एंड कंट्रोल सेंटर. यहां से शहर के हर एक कोने पर नजर रखी जा रही है. हर रोज हर घंटे घर मिनट . सवाल है कैसे.

 

दरअसल, पूरे तेल –अवीव शहर को शक्तिशाली कैमरों से पाट दिया गया है. हर एक गली –हर एक मुहल्ला कैमरे की हद में है . ये कैमरे इतने शक्तिशाली हैं इनकी मदद से कार के नंबर प्लेट को भी पढ़ा जा सकता है. इन कैमरों के जरिये पूरे शहर की लाइव, रियल टाइम तस्वीर यहां बैठे लोग देखते रहते हैं. जैसे अगर शहर के किसी कोने में आग लगी हो तो कैमरे सेकेण्ड भर में उसकी तस्वीर इस कंट्रोल रुम में फ्लैश कर देंगे. और कंट्रोल रुम में बैठे अधिकारी. फायर ब्रिगेड, एम्बूलेंस, पुलिस टीम को सूचित करेंगे.

 

ये इजरायल का सेफ सिटी कॉन्सेप्ट है. हजारों कैमरे की मदद से पूरे शहर पर नजर रखी जा रही है. रेड लाइट तोड़ने वाले से लेकर आंतकवादी हमले तक में ये कारगर है. लेकिन एक सवाल शहर में हजारों कैमरे हैं. हजारों कैमरे की तस्वीरों पर एक साथ कैसे नजर रखी जा सकती है. एक समय में  ..एक दो ..तीन चार कैमरे इससे ज्यादा कैमरे पर नजर रखना नामुमकिन लगता है.  

 

इस सवाल का जवाब है, वीसीए यानी वीडियो कंटेट एनालिसिस. Zvika Ashani की कंपनी ने वीडियो कंटेट एनालिसिस का सिस्टम तेल अवीव कंट्रोल एंड कमांड सेंटर से जोड़ा है. वीडियो कंटेट एनालिसिस से हर उस घटना की तस्वीर खुद व खुद स्क्रीन पर आ जाती है जिसके लिए पहले से निर्देश दिये गये होते हैं . मसलन ..अगर कम्पूटर को निर्देश है कि तेज रफ्तार गाड़ी की तस्वीर को स्क्रीन पर फ्लैश किया जाये तो खुद व खुद वैसी तस्वीर स्क्रीन पर आ जायेगी. 

 

26/11 मुंबइ पर पाकिस्तान से आए आतंकियों ने हमला किया काफी देर तक वहां के अफसरों को राजनेताओं को ये पता ही नहीं चला कि आतंकी है कितने हमलावर कौन है और वो क्या कर रहे हैं. इस परिस्थिती से निपटने के लिए तेल हबीब जैसे शहरों मे एक कंट्रोल एंड कमांड सेंटर है जहां से पूरे शहर पर नजर रखी जाती है पूरे शहर को क्या करना है किस महकमें को क्या करना है. कहां जाना है. कितनी शक्ति से जाना है. कितने लोगों को जाना है सारे फैसले एक जगह बैठकर लिए जा सकते हैं.

 

मुंबई में जिस तरह से 26/11 के हमले हुए थे, इजरायल ने ठीक ऐसी ही परिस्थिति से बचने के लिए तेल अवीव और दूसरे शहरों में कंट्रोल एंड कमांड सेंटर बनाया है. इजरायल के शहरों पर दरअसल आंतकवादी हमलों के साथ–साथ बड़े हमलों की भी आंशका रहती है इसलिए तेल अवीव में कमांड एंड कंट्रोल की जो व्यवस्था 15वें माले पर है वैसा ही सिस्टम जमीन से तकरीबन 50 मीटर नीचे इस रुम में मौजूद हैं. जहां इमरजेंसी होने पर सेना, पुलिस और प्रशासन के तमाम अधिकारी एक साथ बैठ कर फैसले ले सकते हैं. 2014 में जब इजरायल की सेना गाजा पट्टी में दाखिल हुई तो पहली बार इस रुम का इस्तेमाल किया गया.

आंतकवाद से लड़ने की ये तैयारी शहरों की है. इजरायल में आंतकवादी हमला सिर्फ शहरों में नहीं होता है. गांव, कस्बें, सड़क भी हमलों के निशाने पर रहते हैं. जैसे आंतकवादी संगठन फतह ने 1978 में एक बस पर हमला किया इसमें 38 इजरायली नागरिक मारे गये. 1996 में हमास के उग्रवादियों ने जेरुसलम में दो बसों पर हमला किया इसमें 45 इजरायली नागरिक मारे गये. 2004 में बीरशेबा नाम की जगह पर हमास के हमले में 16 नागरिक मारे गये.     

 

इजरायल और उनके नागरिकों पर होने वाले हमलों की बस कुछ मिसाल है. इजरायल के मुताबकि इन जैसे हमलों के पीछे इरादा साफ होता है कि किसी तरह उनके देश का मनोबल तोड़ा जाये. दूसरी तरफ इजरायल की नीतियों का सार यही है कि आंतकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी भी तरह से नागरिकों का मनोबल ना टूटने पाये. इजरायल इस काम को बहुत ही तोल-मोल कर करता है. सूझ बूझ के साथ करता है. लेकिन ये काम आसान नहीं है.

 

इजरायल की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम एक ही दिन में आया-जाया जा सकता है. इस दौराना गजा पट्टी और वेस्ट बैंक इलाके के फिलिस्तिनी प्रशासित इलाकों के बार्डर भी आते रहते हैं. बाड़ के दूसरी तरफ फिलिस्तिनी प्रशासित इलाके हैं. इन इलाकों से फिलिस्तिनी नागरिक इजरायल में काम करने आ सकते हैं लेकिन बॉडर क्रासिंग के लिए तय जगहों से हीं. इजरायल पर होने वाले ज्यादातर हमलों में फिलिस्तिनी प्रशासित इलाकों में सक्रिय उग्रवादियों का हाथ रहा था.

 

वेस्ट बैंक का फिलीस्तीनी प्रशाशित इलाका है. इजराइल का कहना है कि इसी तरह के इलाकों से लगातार घुसपैठिए आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए इजराइल के अंदर इजराइल के शहरों में जैसे तेलहबीब जेरूशलम में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए प्रवेश करते हैं. इनकी आवाजाही पर नजर रखने के लिए इजराइल ने अलग तरह की प्रणाली विकसित की .

 

फिलिस्तिन और इजरायल के बीच का एक बार्डर क्रासिंग हैं Eliyahu check point/ Nordia. यहां इजरायल के अंदर आने वाली हर गाड़ी की जांच होती है. जांच इस बात की कहीं गांड़ी या ट्रक में बैठे लोगों, आंतकवादी संगठन से तो नहीं जुड़े हैं. कहीं वो अपने साथ हथियार तो अंदर नहीं ले जा रहे हैं. ये जांच कौन करता है. और कैसे करता है?

    

 

फिलिस्तिनी प्रशासित इलाके से गाड़ी आती है. कार के ड्राइवर उसे पार्किंग स्लाट में खड़ी करते हैं. गाड़ी में सवार सभी लोग गाड़ी से निकल जाते हैं. इसके बाद गाड़ी के अंदर एक पाइप डाला जाता है. पाइप के दूसरे कोने में फिल्टर लगा दिया जाता  है. इसके बाद मशीन चालू किया जाता है. मशीन के चालू होने पर कार के अंदर हवा पाइप से कुछ देर के लिए खींची जाती है . उसके बाद उस फिल्टर को डब्बे में बंद कर पास एक कमरे में दे दिया जाता है. फिल्टर को कमरे में बने होल्डर में रख दिया जाता है. इसके बाद दूसरे कमरे में बेल्जियन शेफर्ड कुत्ते को कमरे में भेजा जाता है. वो सेकेण्ड भर में वहां रखे सभी फिल्टरों को सूंघ कर आल किल्यर का संकेत अपने हैंडलर को दे देता है. 

 

लेकिन विस्फोटक होने पर क्या होता है. हैंडलर ने जांच के लिए एक विस्फोटक युक्त फिल्टर कमरे में रखा. और जैसे ही विस्फोटक का गंध इन कुत्तों को मिला वो उसके सामने बैठ जायेंगे. असलियत में भी ऐसा ही होता है. इन बेल्जियन शेफर्ड्स को विस्फोटकों को पकड़ने का अब तक का सबसे सफल तरीका माना जा रहा है.

 

बेल्जियन शेफर्ड कुत्तो की ट्रेनिंग और ये तरीका ऐसा है कि गाड़ी के पैसेंजर केबिन के बाहर इंजन या बोनेट में भी किसी तरह का विस्फोटक हो या गाड़ी में बैठे  लोगों ने विस्फोटकों अपने पास रखा होगा तो ये कुत्ते उसे पकड़ लेंगे. लेकिन इजरायल के अंदर हमला करने की नीयत से आने वाले लोग बार्डर क्रॉसिंग से आयें. ये जरुरी नहीं है. फिलिस्तीन प्रशासित इलाके या दूसरे देशों से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा के रास्ते आंतकवादी इजरायल में दाखिल होते रहे हैं.

 

एक फिलस्तीनी गांव है जिसका नाम है बियरब्लू इजराइल का कहना है कि इसी तरह के गांवों से लगातार घुसपैठिए देश के अंदर तेलअबीब जैसे शहर के अंदर आते थे और आत्मघाती हमले किया करते थे आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया करते थे लेकिन जब से ये वॅार्‌ड वाइर कि फैनसिंग यहां खड़ी की गइ है इस तरह का घुसपैठ बिलकुल बंद हो गया है ये एक खास तरीके की फैनसिंग है खास तरीके की व्यवस्था है जो कि किसी भी घुसपैठिए के बारे में तुरंत रीयल टॅाइम इनफॅारमेशन संदेश यहां के मिलिट्री बेस को दे देती है.

 

इजरायल ने अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए ऐसे बाड़ लगाये हैं जिनको पार करना बेहद मुश्किल है. और इससे आतंकवादी हमलों की संख्या काफी घटी है. मगाल नाम की प्राइवेट कंपनी ने ये खास फेनसिंग लगाई है.

 

सीमा पर लगे ये बाड़ या फेनसिंग काम कैसे करती है. दरअसल ये तकनीक का कमाल है. ये फेंनसिंग छोटे –छोटे सेक्शन में बंटे हैं. और हर सेक्शन का एक नंबर है. दरअसल इन कटीले तारों में हर दो से तीन मीटर पर गेंद की शक्ल वाले सेंसर लगे हैं. ये खास तरह के एलेक्ट्रो मैग्नेटिक सेंसर हैं. जैसे ही कोई बाड़ को काटने या दबाने की कोशिश करेगा बॉल के अंदर का सेंसर सक्रिय हो जाता है.     

 

इसके अलावा हर सेक्शन में 25 से 30 मीटर की दूरी पर एक खास पैनल भी लगा है. इस पैनल के अंदर भी काफी संवेदनशील एक्लेट्रोमेकैनिकल सेंसर लगे हैं. जैसे ही कोई इसे काटने या लांघने की कोशिश करेगा. तार हिलेगा, तार के हिलने भर से इसके सेंसर एक्टीवेट हो जायेंगे. और दूर बैठी आर्मी एलर्ट हो जाती है. इस तरह की फेनसिंग के तीन फायदे हैं. बार्डर पर लगातार पेट्रोलिंग की जरुरत नहीं पड़ती. और घुसपैठियों को पकड़े जाने का डर हमेशा बना रहता है. और घुसपैठिये को अंदर आने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है.

 

इजरायल आंतकवाद के खिलाफ कैसे लड़ता इसको लेकर कई कहानियां मशहूर है. लेकिन सच्चाई ये है भी कि इजरायल जिस तकनीक का इस्तेमाल करता है या जिस तरीके का इस्तेमाल करता वो सब उसने अपने उपर हुये आंतकवादी हमलों के बाद ही इजाद किये हैं. क्या आप किसी ऐसी तकनीक की कल्पना कर सकते हैं जहां दीवार के पार क्या हो रहा है वो देखा जा सके.

 

इजयारली आर्मी के कंमाडो का चेहरा नहीं दिखाया जा सकता है. इनके हाथ में है Xaver 400 . इजरायल के नागरिकों को कई बार आंतकवादियों ने अगवा किया है. इजयरायल अगवा करने वाले आंतकियों से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करने की नीति पर काम करता है. ऐसे में इजरायल के पास आंतकवादियों के चंगुल से अगवा लोगों को छुड़ाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं होता है. ऐसे हालात में Xaver सीरीज के उपकरण कैसे काम करते हैं उसे जानिए.   

 

Xaver 800 एंटी टेरर यूनिट के कमांडो इसे मिनटों में खड़ी कर देते हैं. और UWB सिगनलयानी  utra wide band radar signal भेजता है. अगवा करने वालों के बारे में बाहर मौजूद कमांडों को दिन हो रात अंतर की तस्वीर पता चल जायेगी. बंधक कहां है? उग्रवादी कहां हैं? किस दिशा में घूम रहे हैं ?

 

इसी तरह इसका छोटा वर्जन भी, Xaver काम करता है. शहरी इलाकों में अलग –अलग परिस्थितियों में.

 

कटिंग एज तकनीक का इस्तेमाल है अपनी हिफाजत के लिए. अपने लोगों के हिफाजत के लिए. मुंबई पर हमला याद है आपको. 26/11 होटल के अंदर आंतकवादी छिपे थे. किस कमरे में हैं ये अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था. हर कमरे की छानबीन जरुरी थी. इजरायल में भी होटलों में बंधक बनाने की घटना हो चुकी थी. अब ऐसे हालात में इजरायल की एंटी टेरर स्कावड कैसे काम करती है.

 

Xaver 100 इसी हालात में कारगर हैं. इसमें कमरे के अंदर कोई है या नहीं. इसका अंदाजा लग जाता है. कमरे के अंदर कितने लोग हैं. वो दीवार से कितने दूर हैं. इसका साफ अंदाजा लग जाता है.

 

इजराइल एक लेबोरेट्री है प्रयोगशाला है उनके लिए जो लगातार आतंकवाद के खिलाफ रणनीति बनाते है और उनके लिए भी जो लगातार आतंकी हमलों की प्लानिंग करते है अब गौर कीजिए 1967 के बाद पहली बार इजराइली विमान के अपहरण का सिलसिला शुरू हुआ ये समस्या 2001 में अमेरिका ने झेला और 1980 के दशक मे भारत ने अब हेजबुल्ला नामक आतंकी संगठन ने इजराइल के अंदर सबसे पहले फिदायीन हमले की शुरूआत की यानि लगातार आतंकी संगठन नए-नए प्रयोग नई- नई रणनीति के साथ घुसते हैं जबकि इजराइली सेना और इजराइली एडमिनस्ट्रेशन लगातार उन हमलों की काट ढूंढती रहती है.

 

ऐसा ही 1968 में हुआ. दिन था 22 जुलाई 1968. इजरायल की सरकारी एयर लाइन El Al फ्लाइट 426 का अपहरण कर लिया गया. इस घटना को आधुनिक अंतरराष्ट्रीय आंतकवाद की शुरुआत कहा गया.  इजरायल को 10 क्रू मेंबर समेत  22 नागरिकों को छुड़ाने के लिये बड़ी कीमत चुकाने पड़ी थी. इजरायल को 16 उग्रवादियों को रिहा करना पड़ा था. ब्रिगेडियर जेनरल डेविड जूर इजरायल मे आंतरिक इंटेलिजेंस के लिए जिम्मदार संस्था शिन बेट में काम करते थे. डेविड जूर का कहना है कि इजरायल के लिए आंतकियों की रिहाई का फैसला बहुत बड़ा था.

 

इस घटना के बाद इजरायल ने विमान सुरक्षा के तरीके बदल दिये. हाईटेक टेक्नोलाजी के साथ साथ पहली बार यात्रियों की साइकोलॉजिकल प्रोफाइलिंग शुरु की. साइकोलॉजिकल प्रोफाइलिंग के तहत विमान में यात्रा करने वाले हर यात्री से बातचीत की जाती है. और उसके इरादों का अंदाजा लिया जाता है. कैप्टन(रिजर्व) रामी स्किफर एक प्राइवेट कंपनी X test की तरफ से एयरपोर्ट सुरक्षा की ट्रेनिंग देते हैं. इनका कहना है सबसे बड़ा फर्क ट्रेनिंग का ही है. 

 

याद कीजिए Richard Reid को . साल 2001 का था . इसी साल 9/11  की घटना हुई थी. इसी साल दिसंबर महिने में Richard Reid ने अमेरिकन एयरलाइंस की फ्लाइट 63 को उड़ाने की कोशिश की थी. लेकिन यात्रियों ने इसे पकड़ लिया था. अमेरिकन एयरलाइन के 197 यात्री बाल –बाल बचे.

 

ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की वजह से 1968 में फ्लाइट 426 के अपहरण के बाद आज तक El Al एयरलाइंस की कोई और फ्लाइट हाईजैक नहीं हुई है. जबकि 1968 से लगभग 30 साल बाद ऐसी ही स्थिति भारत में पैदा हुई थी. साल 1999 में इंडियन एयरलाइंस का हवाई जहाज 176 यात्रियों के साथ हाईजैक कर लिया गया था. तब भारत सरकार को आतंकियों से ना सिर्फ समझौता करना पड़ा बल्कि 3 खतरनाक आतंकवादियों को छोड़ना भी पड़ा था. वहीं इजरायल में जब आतंकवादियों के लिए El Al विमान का अपहरण मुश्किल हो गया तब उग्रवादी संगठनों ने इजरायली यात्रियों को ले जाने वाले दूसरे विमानों का अपहरण करना शुरु कर दिया.

 

1969 में उग्रवादियों ने लॉस एंजल्स से तेल अवीव आने वाली ट्रांस वर्लड एयरलाइन का अपहरण कर लिया जिसमें दो इजरायली नागरिक सवार थे. 1970 में इजरायल आने वाली स्वीस एयर की फ्लाइट 330 को बम से उड़ाया गया . इससे विमान में आग लग गई. इमरजेंसी लैंडिग के बावजूद 47 लोग मरे जिसमें 15 इजरायली थे . फिलिस्तिनी उग्रवादियों ने इसी साल सितंबर में एक ही दिन में  अलग- अलग एयरलाइंस की के 4 विमानों का अपहरण किया गया. इन विमानों को जार्डन के डॉउसन फिल्ड एयरपोर्ट पर ले जाया गया. यात्रियों को उनसे निकाल कर विमानों को जला दिया गया. विमान दूसरे देश के थे लेकिन निशाना इजरायल था. इन सब हमलों का जवाब इजरायल ने 1976 में दिया. Dov Hoffman तब इजरायल की इंजेलिजेंस एजेंसी शीन बेट में काम कर रहे थे.

 

इजरायल से उड़ने वाली एयर फ्रांस की फ्लाइट को एथेंस में हाइजैक किया गया. और उसे ले जाया गया यूगांडा के एनटेबी एयरपोर्ट पर. तब यूगांडा में इदी आमिन तानाशाह हुआ करते थे . वो अगवा करने वाले आतंकवादियों को समर्थन दे रहे थे . इजरायल ने अपने एयरफोर्स विमान से कमांडो को यूगांडा भेजा. लेकिन भेजने से पहले एनटेबी के चप्पे चप्पे की जानकारी इकठ्ठा कर ली.

 

ऑपरेशन Thunderbolt की सफलता के पीछे इजरायल की दो खुफिया एजेंसियों मोसाद और शीन बेट का हाथ था. ऑपरेशन शुरू करने से पहले इजरायली एजेंसियों ने इस बात की पूरी जानकारी जुटा ली कि एंटेबे एयरपोर्ट पर उसके नागरिकों को किस जगह पर बंधक बनाया गया है. इसके अलावा आतंकियों ने जिन बंधकों को पहले रिहा कर दिया था उनसे आतंकवादियों की सही जगह की जानकारी ले ली गई. इसके बाद 4 जुलाई 1976 की रात 11 बजे इजरायली कमांडो एनटेबे एयरपोर्ट पर उतरे और सीधा उसी हॉल में जा घुसे जहां खुफिया जानकारी के मुताबिक बंधकों को रखा गया था. अपहरणकर्ताओं से सीधी मुठभेड़ के बाद 102 बंधकों को छुड़ा लिया गया.

 

इजरायल ने युगांडा की मर्जी के बगैर उसकी सीमा में घुसकर इस ऑपरेशन को अंजाम दिया. इस बात के लिए कई इस्लामिक देशों और संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल की निंदा की. युगांडा और जॉर्डन की तरह दूसरे देश में घुसकर अपने दुश्मन को मारने के इजरायल के तरीके को गलत ठहराया जाता रहा है. इजरायल के इस तरीके की वजह से ही अरब मूल के 22 में से 18 देश इजरायल को मान्यता नहीं देते हैं. लेकिन इजरायल का तर्क है कि वो कई सालों से आतंकवाद को झेल रहा है और वो ये सब अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कर रहा है.

 

आंतकवाद के खिलाफ लड़ना, सर्तक रहना, इजरायल की जरुरत है. एमस गोलान की फैक्ट्री में अब तरह तरह के हथियार भी बन रहे हैं. इजरायल अब सुरक्षा से निकल कर सुरक्षा के व्यापार में क्षेत्र में कदम रख चुका है. भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण बाजार भी है और साथी भी .

 

इजरायल के विरोधी कहते हैं कि अगर इजरायल के तौर तरीके इतने ही सही थे तो इजरायल अपने खिलाफ हो रहे हमलों को 6 दशक बाद भी क्यों नहीं रोक पाया? समर्थक कहते हैं कि अगर इजरायल ने बाड़ लगाने से लेकर चुनचुन कर मारने का फैसला न करते तो उनका देश बचता ही नहीं. उनके देश के लोग निर्भिक हो कर शांति से जिंदगी नहीं गुजार पाते. सुरक्षित महसूस नहीं करते. सच्चाई इन दोनों छोरों के बीच है. बहरहाल भारत जैसे देश में कइ बार ऐसी चर्चा होती है कि क्यूं ना आंतककवाद से निपटने के लिए इजराइल मॅाडल का इस्तेमाल किया जाए लेकिन हर देश की परिस्थिती अलग अलग होते हैं और कई बार तो ये भी कहा जाता कि इजराइल का इतिहास ही हमे ये बताता है कि कैान सी ऐसी चीज है जिसका इस्तेमाल आंतकवाद से निपटने के लिए कभी नहीं किया जाना चाहिए. बहरहाल लेसन सीख चाहे जो भी कहें इजराइल के अनुभवों को बहुत गंभीरता से देखना, समझना और उसका अधय्यन करना आतंकवाद से निपटने के लिए बेहद जरूरी है. शांति का रामराज्य लाने के लिए जरुरी है.

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Web Title: ABP NEWS special RAMRAJYA
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