ABP न्यूज स्पेशल 'रामराज्य': डेनमार्क है दुनिया का सबसे ईमानदार देश

By: | Last Updated: Saturday, 13 June 2015 2:27 PM
ABP SPECIAL RAMRAJYA:

रामराज्य वही जहां सभी को बराबर का हक मिले. जिसका जो हक है वो मिले. जहां ईमानदारी रगों में हो. न कोई अफसर घूस मांगे. रिश्वत मांगे और ना ही कोई दे. जी ऐसी जगह जहां ईमानदारी रगों में हो. न कोई घूस मांगे और ना कोई रिश्वत दे. ऐसी जगह क्या इस धरती पर है? क्या भारत में कभी ऐसी स्थिति आ सकती है. इसका जवाब आप बाद में दीजिएगा. अभी तो बस एक ऐसी जगह के बारे में सोचिए जहां के लोगों ने घूस, रिश्वत जैसे लफ्ज सुने ही ना हो.  

 

एबीपी न्यूज के पत्रकार संजय नंदन एक व्यस्त चौराहे पर दिन भर खड़े रहते हैं और वहां से गुजरने वाले तमाम लोगों से पूछते हैं क्या कभी आपको रिश्वत देने के लिये फोर्स किया गया है मजबूर किया गया है. और ज्यादातर लोग ये पूछते हैं ब्राइब क्या है?

 

ये सब जानकर आप हैरत में होंगे. ये कैसा देश है? जहां लोगों ने घूस ..रिश्वत ..ब्राइब जैसे शब्दों के बारे में सुना ही नहीं है. ये डेनमार्क के लोग हैं. जिनकी बातों को सुन कर ऐसा लगता है कि रामराज्य कहीं है तो यहीं है. भारत से तकरीबन 7000 किलोमीटर दूर डेनमार्क की गिनती दुनिया के सबसे अमीर देशों में होती है. दुनिया में सबसे कम भ्रष्टाचार डेनमार्क में है. ऐसा क्यों है? ये जानने के लिय़े आपको एक अधिकारी के बारे में बताते हैं. सुजैन प्रस्टेगॉर्ड सरकारी अधिकारी हैं. सुजैन पर डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन शहर में जरुरतमंदों को फ्लैट मुहैया कराने की जिम्मेदारी है . करप्शन से ये देश कैसे बचता है ये जानने के लिये सुजैन के इस अनुभव पर गौर कीजिये.  

 

सुजैन के मुताबिक उन्हें कभी किसी ने घूस देने की कोशिश ही नहीं की है. हां लोग खुश होते हैं तो चॉकलेट या फूल दे देते हैं. एक दिन सुजैन अपने आफिस में थीं. उनके सामने चॉकलेट का डब्बा लेकर एक शक्स खड़ा था. हाथ में फुलों का बुके भी था. जाहिर है खुशी की कोई बात होगी.

रामराज्य: भ्रष्टाचार मुक्त डेनमार्क की कहानी 

कोपेनहेगन में सरकारी फ्लैट मिलना बड़ी बात होती है. लिहाजा जिन्हे फ्लैट मिला था वो धन्यवाद देने गुलदस्ता ले कर सुजैन के पास पहुंचे. बात बड़ी छोटी सी है. जैसे काम हो जाने पर यहां भारत में . मुंह मीठा कराने के नाम पर हम अक्सर मिठाई ले कर आफिसों में पहुंच जाते हैं या कभी कभी तो मुंह मीठा कराने के नाम पर अधिकारी ही मिठाई लाने को कह जाते हैं.  वैसे ही डेनमार्क में वो शक्स सुजैन के लिये गुलदस्ता और चॉकलेट ही तो लाया था. इसमें क्या गलत है.  लेकिन सुजैन परेशान हो गईं क्य़ों ?  

 

उस व्यक्ति के इस हरकत पर सुजैन को शक हो रहा था. उस व्यक्ति पर नहीं खुद पर.  जैसे ही चॉकलेट और गुलदस्ता लाने वाला व्यक्ति कमरे से बाहर निकला. सुजैन ने दोबारा उसकी फाइल निकाली. वो पसीने से लथपथ हो रहीं थीं. परेशान हो रहीं थीं.  फाइल में सुजैन देखना चाहती थीं कि कहीं उनसे फ्लैट देने में कोई गलती तो नहीं हुई.

 

सुजैन और उन जैसे दूसरे अधिकारियों की मुसिबत यहीं खत्म नहीं होती. कई बार तो लोग चॉकलेट और इस तरह के गिफ्ट जबरदस्ती छोड़ कर चले जाते हैं.

 

डेनमार्क की अधिकारी सुजैन ने कहा वो इस ख्याल के साथ जीना नहीं चाहती कि उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसे लोग भ्रष्टाचार कहें . करप्शन कहें. इसीलिए फूलों का गुलदस्ता. चॉकलेट का पैकेट लेना भी उनकी नजर में भ्रष्टाचार है. डेनमार्क में इन छोटी- छोटी बातों पर लोग ध्यान देते है. लिहाजा भ्रष्टाचार की बड़ी घटना नहीं होती. जब आप बतौर गिफ्ट रिश्वत गुलदस्ता भी नहीं लेंगे. पैसे देने की कौन सोचेगा? ये है भारत और डेनमार्क के बीच का पहला बड़ा फर्क. भारत में तो आम आदमी इन बातों को करप्शन मानेगा ही नहीं.

 

सुजैन के कामकाज का तरीका डेनमार्क में रामराज्य की एक झलक देता है. पिछले 7 साल से डेनमार्क में ही रह रहे भारतीय मूल ईशान गुप्ता से एबीपी न्यूज के पत्राकार संजय नंदन से मुलाकात हुई. सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल, ईशान मूलत दिल्ली के रहने वाले हैं. इनकी पढ़ाई लिखाई भी दिल्ली में ही हुई थी. हमने उनसे भारत और डेनमार्क के अनुभवों के बारे में बातचीत की. उन्होंने हमें भारत में ड्राइविंग लाइसेंस लेने के अपने अनुभव के बारे में बताया.

 

इशान टेस्ट पेपर देने जाते हैं तो उनको उत्तर पहले से ही भरा हुआ मिलता है. एक्जामिनर कहता है कि ज्यादा समय खराब न हो इसलिये . पहले से एन्सर भरवा दिया है . चेक करने में भी समय खराब होता है . एक्जामिनर फिर कहता है कि 5 सौ रुपये दे दो अभी . घर पर ही लाइसेंस मिल जायेगा.

 

ये था भारत में इशान का अनुभव . दूसरी तरफ डेनमार्क में ऐसा क्या है कि वहां के अधिकारी जिन बातों का दावा करते हैं . वैसा ही अनुभव भारत से जाने वाला एक व्यक्ति भी बताता है. सड़क पर आने जाने वाले लोग बतातें. क्या डेनमार्क का कानून भारत से बिल्कुल अलग है या लोग ही कुछ अलग तरह के हैं कि करप्शन होता नहीं या पुलिस ऐसी है कि कानून की हद कोई पार नहीं करता.

 

Copenhagen Police के दो अधिकारियों सार्जेंट एन्ड्रीय्ज डेन और सार्जेंट हैन्स क्रिश्चियन के साथ एबीपी न्यूज. एन्ड्रीयूज डेन गाड़ी ड्राइव किए जबकि हैन्स क्रिश्चियन कानून तोड़ने वालों पर नजर रख रहे थे . और हमारी नजर इस बात पर थी कि डेनमार्क की पुलिस, आमलोगों के बीच कैसे काम करती है? और पुलिस को आमलोग किस नजर से देखते हैं? पट्रोलिंग के दौरान हमने पुलिस अधिकारियों से बातचीत शुरु की.

 

पुलिस अधिकारियों से हमारी बातचीत चल ही रही थी कि सार्जेंट हैन्स क्रिश्चियन ने एक कार ड्राइवर को मोबाइल फोन पर बात करते हुये देखा. हैन्स क्रिश्चियन ने कार ड्राइवर को रुकने का इशारा किया गया. ड्राइवर ने गाड़ी रोकी. और चालान की प्रक्रिया शुरु हुई. चालान था एक हजार डैनिश क्रोन यानी लगभग 9000 रुपये के बराबर. चालान की प्रक्रिया खत्म होने के बाद हमने गाड़ी के ड्राइवर, मॉरगन से बातचीत की.

 

वैसे एक बात सोचने वाली है . हममें कितने ऐसे हैं जो ट्रैफिक रुल तोड़ने के बाद पुलिस को दे –ले कर निकलने के बारे में न सोचा हो. पुलिस रिश्वत मांगती है. अफसर रिश्वत मांगते हैं. तो देता कौन है . दुनिया भर में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था  ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल हर साल एक लिस्ट जारी करता है जिससे पता चलता है कि कौन सा देश कम करप्ट है और कौन ज्यादा . 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक ,175 देशों की लिस्ट में भारत 85वें स्थान पर था और डेनमार्क पहले. डेनमार्क में पुलिस को लोग ईमानदारी में न्यायपालिका के समकक्ष माने जाते हैं. जबकि भारत में उन्हें सबसे ज्यादा करप्ट पुलिस को ही मानते हैं.

 

अंतरराष्ट्रीय संगठन ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल 1995 से लगातार हर साल इस तरह की सूची जारी कर रही है . इस सूची में डेनमार्क ईमानदारी के पायदान पर 9 बार नंबर 1 और 8 बार नंबर 2 पर रहा है. Knut Gotfredsen डेनमार्क में ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल के प्रतिनिधि हैं . Knut Gotfredsen के मुताबिक डेनमार्क में जिन बातों को करप्शन की श्रेणी में रखा जाता है वो महज पैसे के लेन देन तक सीमित नहीं है .

 

यानी डेनमार्क ने करप्शन को लेकर अपने लिए एक व्यापक . बड़ा दायर रखा है . जिसमें गुलदस्ता जैसी छोटा तोहफा भी शामिल है और भाई भतीजावाद नेपोटिस्म भी उसी दायरे में है . दूसरी तरफ 2008 में ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल ने भारत में एक खास अध्ययन किया . ये पता लगाने के लिए कि गरीबों पर भारत में करप्शन का ये असर पड़ता है . उन्हें कितनी रिश्वत देनी पड़ती है . तो ये पता चला की 48 फीसद गरीबों को कभी न कभी पुलिसवालों को रिश्वत देनी पडी है . इसी अध्ययन में पता चला कि बुनियादी सुविधाओं के लिए देश भर के गरीबो को. गरीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों को उस साल 883 करोड़ रुपये घूस के तौर पर देने पड़े थे . इसमें से 214 करोड़ रुपये पुलिस वालों की जेबों में गये . ये आलम 2008 का था . 

 

डेनमार्क के लोग दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स देने वालों में से एक हैं. डेनमार्क दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है. यहां के अमीर और गरीब का फर्क दुनिया में सबसे कम है. क्या भ्रष्टाचार न होने की वजह से डेनमार्क को अमीरी गरीबी के फासले को कम करने में मदद मिली है. ये जानने के लिए डेनमार्क की व्यवस्था को करीब से परखना जरुरी है.

 

पूर्व विदेश मंत्री Niels Helveg Petersen साइकिल चलाते हुये पार्लियामेंट के सामने पहुंच गये . अब ये वही शक्स हैं जो 40 साल तक सांसद रहे. देश के वित्त मंत्री थे . विदेश मंत्री थे और तो और उनके पिता भी मंत्री थे और अभी बेटे मंत्री हैं . लेकिन साइकिल का साथ कायम है और एक बात ऐसा करने वाले वो कोई अकेले मंत्री पूर्व मंत्री नहीं हैं.

 

Niels Helveg Petersen के साथ एबीपी न्यूज डेनमार्क की पार्लियामेंट के अंदर दाखिल हुआ . ना कोई रोकटोक ना कोई पाबंदी . सुरक्षा जांच के बाद कोई भी व्यक्ति पार्लियामेंट के अंदर दाखिल हो सकता है. ये बराबरी और खुलेपन की बड़ी मिसाल है . यहां काम करने वाले लोगों ने हमें बताया कि सासंद इस बात का पूरा ख्याल रखते हैं कि वहां आने वाले लोगों को खुद संसद में अच्छी तरह से घुमाये . इससे उन्हें अपने वोटरों से बातचीत करने और जुड़ने का मौका मिलता है .  

 

डेनमार्क में हर 4 साल में चुनाव होते हैं जिसके जरिये 179 सांसदों को चुनकर इसी संसद में भेजा जाता है. वैसे तो डेनमार्क में संवैधानिक राजशाही की व्यवस्था है यानी देश की संवैधानिक प्रमुख यहां की रानी मारग्रेथा 2  हैं. लेकिन लोकतांत्रिक देश होने के कारण शासन की कमान प्रधानमंत्री के हाथ में होती है.   

 

डेनमार्क और भारत की राजनीतिक व्यवस्था में बस इतना ही अंतर है कि वहां पर रानी संवैधानिक प्रमुख है जबकि हमारे यहां राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख होता है. बाकी वहां भी वैसी ही संसदीय प्रणाली है जैसी हमारे यहां. सांसद भारत के भी है. और डेनमार्क के भी. डेनमार्क के सासंद अपना खर्च कैसे निकालते हैं. अपना परिवार कैसे चलाते हैं? यहां सवाल कॉन्फिल्कट आफ इंट्रेस्ट का भी है . किसी मसले पर कानून बनाते समय कहीं ऐसा तो नहीं है कि बड़ी कंपनियों से सांसद प्रभावित होते हैं .

 

राजनीति से जुड़ा जुड़ा एक सवाल राजनीतिक चंदे का है . डेनमार्क में राजनीतिक दलों को 20 हजार क्रोन यानी करीब दो लाख रुपये से ज्यादा के चंदे की पूरी जानकारी देनी होती है लेकिन अगर वही रकम 20 हजार क्रोन से कम है तो इसकी जानकारी देनी जरूरी नही है. यही हाल भारत में हैं जहां राजनीतिक दल को एक बार में 20 हजार या उससे ऊपर के चंदे को, उसे देने वाले के नाम के साथ घोषित करना होता है. भारत और डेनमार्क की तुलना करें तो फर्क सिर्फ इतना है कि डेनमार्क में राजनीतिक पार्टियों को सरकारी बजट से पैसा मिलता है. सरकार से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल पार्टियां अपनी नीतियों के प्रचार प्रसार पर कर सकती है . लेकिन चुनाव लड़ने में नहीं कर सकती.

 

भारत में भ्रष्टाचार के नाम पर न जाने कितने चुनाव लड़े गये . कितने वादे हुये . कानून भी बना लेकिन करप्शन तो वहीं है. लेकिन डेनमार्क जहां दुनिया में सबसे कम करप्शन है वहां इसकी चर्चा ही नहीं होती. ऐसा भी नहीं है कि यहां कभी भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने आता ही न हो. लेकिन इस तरह के मामले इतने कम होते हैं कि डेनमार्क के आम लोग अपने देश में भ्रष्टाचार को एक समस्या के तौर पर नहीं देखते. 

 

सवाल ये है डेनमार्क में ऐसा क्यों संभव है. क्या वहां के राजनीतिज्ञों को पैसे की जरुरत नहीं है . राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में खर्च नहीं करना पड़ता . फिर ऐसा क्यों है कि  L & T Infotech जैसी कंपनी को डेनमार्क में 15 दिन के भीतर लाइसेंस मिल जाता है.  कभी रिश्वसखोरी का सामना नहीं करना पड़ता . 

 

दुनियाभर में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था Transparency International के मुताबिक डेनमार्क में जिन संस्थाओं जिन व्यवस्थाओं पर लोग सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं या जो संस्था जो व्यवस्था सबसे कम भ्रष्ट है उनमें है शिक्षा व्यवस्था, पुलिस, ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका. इन संस्थाओं पर यहां के लोगों इतना भरोसा है कि यहां की सरकार को अब तक भ्रष्टाचार विरोधी रणनीति बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई. कोई खास स्ट्रेटजी तैयार करने की जरूरत महसूस नहीं हुई. वैसे यहां पर कानूनी ढांचा मौजूद जरूर है. लेकिन ये कानूनी ढांचा ऐसा नहीं है कि सिर्फ उसके डर से भ्रष्टाचार ना हो तो फिर भ्रष्टाचार ना होने या बिल्कुल कम होने की असली वजह क्या है.

 

सरबजीत देव के मुताबिक यहां व्यवस्था काम करती है . और उस सिस्टम  उस व्यवस्था से कोई छेड़छाड कोई नहीं कर सकता है . मंत्री भी नहीं . मनु सरीन, डेनमार्क में बराबरी, चर्च और नार्डिक कोऑपरेशन मामलों के मंत्री हैं.  भारतीय मूल के मनु सरीन का कहना है लोगों का भरोसा व्यवस्था पर है . और ये भरोसा खुलेपन की वजह से तैयार हुआ है .     

 

खुलापन, ट्रांसपरेंसी . भारत और डेनमार्क का ये एक बड़ा फर्क . पहला फर्क आपने देखा कि छोटी –छोटी बातों पर ध्यान रखा जाता है . यहां तक कि फूलों का गुलदस्ता लेने देने से भी परहेज हैं. दूसरी बात सरकार . उसके मंत्री और अफसर सूचनाओं को छुपाते नहीं है. भारत में राइट टू इंफॉरमेशन का कानून है लेकिन डेनमार्क में सूचना देने की परम्परा है .

 

डेनमार्क में सरकारी कामकाज बेहद सीधा और पारदर्शी है . प्रशासनिक सुविधा के लिहाज से डेनमार्क को कुल 98 म्यूनिपैलिटी क्षेत्रों में बांटा गया है. आमतौर पर यह म्यूनिसपैलिटी ही प्राइमरी सर्विस प्रोवाइडर की तरह काम करती हैं. सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को लागू कराने की जिम्मेदारी इन्हीं की होती है. जैसे चाइल्ड केयर और एल्डर केयर सेंटर्स चलाना. इसके अलावा प्राइमरी स्कूल, सिटी प्लानिंग और सड़कें बनाने जैसे काम भी म्यूनिसपैलिटी के कार्यक्षेत्र में ही आते हैं.

 

यहीं हमारी मुलाकात सुजैन पैस्टरगाड से हुई थी . हमने देखा था कि सुजैन ने एक गुलदस्ता तक लेने से भी इनकार कर दिया था . लेकिन सवाल सुजैन के ईमानदार होने या ना होने का नहीं बल्कि व्यवस्था का है . वहां की व्यवस्था कैसे काम करती है .

 

सुजैन ने काम करने के जिसे तौर –तरीके का जिक्र किया . ठीक वैसा ही अनुभव ईशान गुप्ता का भी डेनमार्क में रहा था . ईशान जब अपना रेजिडेंट परमिट लेने पहुंचे तो उन्होंने जो देखा उसकी कल्पना वो भारत में रह कर नहीं कर सकते थे.

 

डेनमार्क में काम करने के लिये विदेशियों को रेजिडेन्ट परमिट लेनी पड़ती है . रेजिडेंट परमिट के बगैर वहां नौकरी नहीं की जा सकती है . लिहाजा ईशान रेजिडेंट परमिट आफिस पहुंचे . वहां जरुरी कागजों के अलावा उन्हें किसी भी बात की अहमियत नहीं दिखी . वहां मौजूद तमाम लोगों से डेनमार्क के आफिसरों का बर्ताव एक जैसा था . एक के बाद एक एप्लिकेंट आते जा रहे थे और उनका काम होता जा रहा था .  घूस ..रिश्वत ..ब्राइब जैसी बातों का दूर दूर तक कोई नामों –निशान नहीं था . 

 

सरकारी अधिकारी सुजैन कैसे काम करती हैं. इशान का काम कितनी आसानी से हुआ . ये है तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण फर्क . काम सिस्टम से ही होगा . सिस्टम के तहत ही होगा . ये भरोसा डेनमार्क में हर किसी को है. इसलिए सिस्सटम तोड़ने की जरुरत ही महसूस होती है . डेनमार्क के लोग इसीलिए ईमानदारी के पायदान में सरकारी अधिकारियों को काफी उपर रखते हैं .

 

डेनमार्क आज जिस मुकाम पर खड़ा है उसके पीछे एक लंबा इतिहास है . उस दौर में डेनमार्क, फ्रांस का साथी हुआ करता था. 1814 में जब नेपोलियन की हार हुयी तो डेनमार्क को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. लड़ाई के बाद से कमजोर हो चुके राजा को लगने लगा कि अगर भ्रष्ट अफसरों पर लगाम नहीं लगायी गयी तो जनता का गुस्सा उनकी सत्ता के खिलाफ फूट सकता है.इसलिए भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गयीं.

 

करीब 30 सालों तक लगातार राजा की तरफ से भ्रष्टाचार को रोकने के लिए उठाये गये कदमों का असर दिखने लगा. धीरे धीरे प्रशासनिक व्यवस्था से भ्रष्टाचार लगभग खत्म हो गया. 1849 में डेनमार्क में संवैधानिक व्यवस्था के लागू होने के साथ ही अफसरशाहों के लिए बेतहर तनख्वाह और रिटायरमेंट पेंशन जैसी सुविधायें शुरू की गयीं.

 

तब से लेकर अब तक ये माना जाता है कि डेनमार्क के सरकारी अधिकारियों की सैलरी अच्छी है . कोपेनहेगन की सड़कों पर हम जिन पुलिस अधिकारियों के साथ हम पेट्रोलिंग पर गये उनसे हमने ये सवाल पूछ लिया कि क्या अच्छी सैलरी होने की वजह से वो करप्शन से दूर रहते हैं या कुछ और वजह है.  

 

अच्छी सैलरी और पेंशन ने डेनमार्क के सरकारी अधिकारियों को करप्शन से दूर रखा है . तो क्या भारत में सरकारी अधिकारियों की सैलरी अगर बहुत बढ़ा दी जाये तो करप्शन रुक जायेगा .

 

डेनमार्क में रामराज्य जैसा माहौल है . बिरले ही कोई रिश्वत लेता है और ना कोई रिश्वत देने के लिये मजबूर किया जाता है . लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि निगरानी नहीं रखी जाती है .

 

डेनमार्क के Public prosecutor for serious economic and international crime के दफ्तर के बाहर एबीपी न्यूज पहुंचा. यहां पर इसे Fraud squad के नाम से भी जाना जाता है. दरअसल यही वो प्रमुख एजेंसी है जो डेनमार्क में आर्थिक अपराधों और भ्रष्टाचार के मामलों की छानबीन करती है.

 

यानी यहां पर इसकी वही भूमिका है जो भारत में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन यानी सीबीआई की है. तो बड़ा सवाल यह है कि क्या जैसे हमारे यहां सीबीआई पर सरकार के इशारे पर काम करने के आरोप लगते रहते हैं वैसा ही कुछ इस एजेंसी के साथ भी होता है.

 

Neils Kjaergaard के मुताबिक सन 2000 से 2001 के बीच भ्रष्टाचार के 82 मामलों की जांच फ्रॉड स्वाकड ने की . इसमें 13 मामलों में सजा हुई . पूरे देश में भ्रष्टाचार के सिर्फ 6 से 7 मामले ही फ्रॉड स्वाड के पास आते हैं . जबकि भारत के छोटे से जिले में भी इससे ज्यादा मामले एक दिन उजागर हो जाते हैं . जबकि भारत में कानून ज्यादा कड़े हैं.    

 

कहते हैं भारत और डेनमार्क में बड़ा अंतर सोच का भी है. भारत में रिश्वत लेना या देना इतना आम हो चुका है कि इसे रोकने के लिए कानून और व्यवस्था से ज्यादा सोच बदलने की जरूरत है. ये बात आपने कई बार सुनी होगी . लेकिन सवाल ये है कि .ये सोच बनती कैसे है . आपके हमारे अनुभवों से. बहरहाल अगर कानूनों की बात की जाये तो डेनमार्क में सिर्फ भ्रष्टाचार संबंधी कोई कानून अलग से नहीं है जबकि भारत में बाकायदा भ्रष्टाचार निरोधक कानून बना हुआ है.

 

भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत भारत में किसी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत लेने पर 3 साल से 7 साल तक की सजा का नियम है. लेकिन भारत में सबसे बड़ी समस्या है कि पहले तो कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियां अपने काम में ढिलाई बरतती हैं और फिर एक जटिल और लंबी न्यायिक प्रक्रिया चलती है. इसकी वजह से भ्रष्टाचार के हजारों मामले में अदालतों में चलते रहते हैं और लोगों में इसे लेकर कोई डर नहीं रह गया है. जबकि डेनमार्क में पुलिस और न्यायिक व्यवस्था दोनो को ही बेहद मजबूत माना जाता है. डेनमार्क की अदालतें लोगों की नजरों में सबसे कम करप्ट संस्था है .

 

भारत में 3 साल पहले जब भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ तब मांग उठी लोकपाल की. यानी एक ऐसी संस्था की जो भ्रष्टाचार के मामलों में स्वायत्त तरीके से प्रभावी कार्रवाई कर सके. एक ऐसी संस्था जिसके दायरे में आम आदमी से लेकर सरकारी अफसर और मंत्री भी हों. एक ऐसी संस्था जिसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो. कई दशकों से हो रही कोशिशों के बाद भारत में लोकपाल की नियुक्ति का कानूनी रास्ता साफ हो चुका है. अब भारत को उसके पहले लोकपाल की नियुक्ति का इंतजार है.

 

देश में भ्रष्टाचार को फैलने से रोकना सरकार की जिम्मेदारी होती है लेकिन सरकार पर नजर रखने का काम लोकपाल का होता है. डेनमार्क में लोकपाल व्यवस्था की शुरूआत 1954 से ही हो गयी थी. यहां लोकपाल का चुनाव डेनमार्क की संसद करती है.

 

इसको डेनमार्क में न्यायपालिका से भी ज्यादा सबसे भरोसे मंद संस्था माना जाता है . वही नियम कायदे, वही सरकारी ढांचा लेकिन उस व्यवस्था में मौजूद लोगों की अपनी ईमानदारी, व्यवस्था में पर्याप्त पारदर्शिता और सरल प्रक्रिया. यह वह बातें हैं जो डेनमार्क के सरकारी तंत्र को भारत से अलग करती हैं. इन वजहों से वहां भ्रष्टाचार पर काफी हद तक लगाम लगती है.

 

गौर करने की बात यह है कि वह व्यवस्था हमारे यहां की व्यवस्था से ज्यादा अलग नहीं है. मतलब संसद से लेकर अदालतों तक. संविधान से लेकर कायदे कानूनों तक लगभग हम किसी चीज में में डेनमार्क से कमतर नहीं हैं बल्कि हमारे यहां का कानूनी ढांचा और ज्यादा मजबूत है. तो फिर डेनमार्क में ऐसा क्या है कि भ्रष्टाचार को काबू करने के मामले में वो हमसे कहीं आगे है बल्कि दुनिया में सबसे ऊपर है. यह हैं विश्वास और भरोसा.

 

भरोसा एक दूसरे पर ..भरोसा व्यवस्था पर ..भरोसा सरकार पर…. भरोसा  अदालतों पर … यही भरोसा यही विश्वास है जो लोगों को भ्रष्टाचार से दूर रखता है . डेनमार्क के रामराज्य की बुनियाद है . इसकी मदद से डेनमार्क दुनिया का सबसे ईमानदार देश बना है जबकि भारत 85 . भारत की हालत करप्शन के मामले में सुधर रही है लेकिन अभी भी भारत में  करप्शन बहुत व्यापक है . डेनमार्क ने करप्शन से छुटकारा पा कर अपनी आर्थिक हालात सुढृढ की है . जबकि भारत अरबों रुपये का नुकसान झेल रहा है . डेनमार्क के लोग छोटे –छोटे मामले को लेकर संवेदनशील हैं जबकि भारत में इन्हें नजरअंदाज किया जाता है .

 

कहानी बिल्कुल साफ है जब तक हम और आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे छोटे भ्रष्टाचार को खत्म नहीं करेंगे तब तक इसके खिलाफ लड़ना आसान नहीं होगा. वहीं सरकार के लिए जरूरी है कि वो भ्रष्टाचार को खत्म करने की इच्छा के साथ काम करे. क्योंकि कोई एक कानून या कोई एक व्यवस्था भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं कर सकती.

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